बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
अनुक्रमणिका । ( १५ )
सखि सोहत ... ... ८ | सहनसु ... ... ५१६
सखी सिखावत ... ... ७११ | सहज मुचिकान ... ... ४५०
संगतिदोष... ... ... ६२६ | सहित सनेह ... ... २४०
संगति सुमति ... ... ६११ | सही रंगी ... ... ८७
सघनकुञ्ज ... ... १५९ | सामासिन ... ... ७०५
सपनकुअछाया ... ... ४११ | सायकसम ... ... ४५९
सतसैया ... ... ... ७२५ | सारी डारी ... ... ४६४
सटपटा ... ... ६६ | सालतहै ... ... ४८१
सतरभौंह ... ... ९८ | सीरे जतनन ... ... ३८०
सदन सदन ... ... १९५ | सुखसों बीती ... ... ३४५
सममूरूयो ... ... ९७ | सुघर सौतिवश ... ... ११३
सनि काजळ ... ... ३२८ | सुदुतिदुराय ... ... ९१
समरस ... ... ३२ | सुनत पथिक ... ... ४३५
सबि मोहन ... ... २६५ | सुनि पगनुत ... ... २६९
सम्पति केश ... ... ५९८ | सुभरभरचो ... ... १९६
समैपलट ... ... ६९४ | सुरति न लाल ... ... ३११
समै समै ... ... ६२४ | सुरँग महावर ... ... १७१
सबै सुहायेई ... ... ४४७ | सूर उदितहू ... ... ४८८
सब अंगकरि ... ... ३८ | स्वेदसलिल ... ... १५
सबै हँसत . ... ... ६१२ | सैभिसहासा ... ... २१४
सम्बन यह ... ... ७०७ | सोनजुहीसी ... ... ५०१
सबही तन ... ... ५६ | सोवन जागत ... ... ४१३
सरगनु ... ... ४३९ | सोवत सपने ... ... ४०९
सरसकुसुम ... ... ६३२ | सो विथुरी जनु ... ... ४०*
रूप सुमिट ... ... २१२ | सोवन लगिं ... ... ४०
( १६ ) बिहारीसतसयीकी-
सौहत धोती ... ... ३३ | हठ न हठीली ... ... ५७४
सोहत अंगुठा ... ... ५११ | हठि हित करि .... ... १२०
सोहत संग ... ... ६१३ | हम हारी कै ... ... ६५७
सोहत ओढे ... ... ५ | हरषि नवीली ... ... ४९
सोहैहू ... ... ३६६ | हरि कीजत ... ... ६१९
स्वारथ सुकृत ... ... ६३५ | हरि छवि ... ... २५८
| हरि हरि ... .... २९९
श. | हाहावदन ... ... ३७२
शशिवदनी ... ... ७१३ | हित करि ... ... ३०३
सीतळता ... ... ६२० | हिये और ... ... १२६
शीश मुकुट ... ... २ | हुकम पाय ... ... ७०६
श्याम सुरति ... ... ६५५ | हेरि हिंडोरे ... .... २४९
| है हिय रहति ... .... २७४
ह. | होमत मुख ... ... ३०५
हँसि उतार ... ... ३०४ | हौं रीझी ... ... ३३५
हँसि ओठन .... ... १९४ | हौं हीबौरी ... ... ४१६
हँसि हँसाय ... ... ३६३ | ह्याँते ह्यां ... ... ४१७
हँसि हँसि हेरत ... ... २१७ | द्वै कपूर ... ... ५२३
इति अनुक्रमणिका समाप्त ।
श्रीः ।
बिहारी सतसई-सटीक ।
प्रथम शतकः ।
टीकाकारका मंगलाचरण ।
दोहा-वृंदाविपिनविहाररत, सकलसुमंगलमूल ।
बुध ज्वालाप्रसादपर, सदा रहो अनुकूल ॥ १॥
नँदनंदन शोभासदन, नटवर मदनगुपाल ।
मुरलीधर गिरिवर द्रवह, कुंजविहारीलाल ॥ २॥
अथ ग्रंथारम्भः ।
दोहा-मेरी भवबाधा हरो, राधा नागरि सोइ ।
जातनुकी झाँई परे, श्याम हरित द्युति होइ १
सोई नागरि ( चतुर ) राधिका मेरे जन्म मरणकी बाधा
( दुःख ) हरणकरो, जिन राधिकाके शरीरकी झाँईमात्र
पड़नेसे श्रीकृष्णकी ( हरित ) प्रफुल्लकांति होजाती है अर्थात्
जिनकी झाँईमात्रसें श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं, काव्यालिंग
अलंकारहै [ दोहा-हेतुसमर्थन युक्तिसों, काव्यालिंगको अंग,
ह्यां भवबाधा हरनको, श्रीराधिका प्रसंग ] अथवा जिन
राधिकाके शरीरकी पीत झाँई पड़नेसे कृष्णके शरीरकी
( २ ) सतसई-सटीक ।
कांति हरित होजाती है, प्रत्यक्षहै कि, नीलमें पीला मिल-
नेसे हरा रंग होता है, यहां हेतुकअलंकार जानना [दोहा-हेतु
सहित कारज जहां, कहैं हेतु कविराज । प्रिय प्रीतम रंग
इयाम पिय, हेतु हरित रंग काज ] अथवा जिन राधिकाके
शरीरकी झांईंसे श्रीकृष्ण हरे होजाते हैं । झांईंका अर्थ
झलक अथवा छाया है ॥
अत्युक्ति (राधा) सोंठ (नागरि) नागरमोथा (सोय)
सोया यह तीनों मेरी भवबाधाको दूरकरो अर्थात् जिसके
तनुपर झांईं पड़नेसे इयाम वर्ण पिटिका पड़गई हैं, यह तीनों
पीसकर लगावे तो उसके शरीरकी (हरित) डहडही कान्ति
होजाती है ॥ १ ॥
शीश मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल ।
यहि बानिक मो मन बसो, सदा विहारीलाल॥२॥
शिरपर मुकुट कमरमें कछनी हाथमें मुरली हृदयमें
मालावाले हे विहारीलाल ! तुम सदा इस बनावसे मेरे हृदयमें
निवासकरो, जैसे उपरोक्त अलंकार अपने स्थानको छोड़कर
अन्यत्र नहीं रहते, इसीप्रकार आप मेरे हृदयके विना अन्यत्र
न रहो । विहारीलालका अर्थ रहस्यलीलाके रसिक । जाति-
अलंकार [ दोहा-जातिसु जैसो जासुको, रूप कहैं तिहि
साज। जो ह्यां प्रभु बानिक जुहो, कह्यो सु त्यों कविराज]॥२॥
प्रथमशतक १. ( ३ )
मोर मुकुट की चंद्रिका, यों राजत नँदनंद ।
मनु शशिशेखरको अकस, किय शेखर शतचंद ३
मोरपंखके मुकुट धारण किये उस मोरपंखकी चन्द्रा-
कार रेखासे नँदसुवन इसप्रकार शोभायमान होते हैं, मानों
( शशिशेखर ) शिवजीके मनकी ( अकस ) वैमनस्यता
विचारकर कृष्णने अपने शिरपर सौ चन्द्रमा धारण किये हैं,
तात्पर्य यह शिवने कामको दग्ध किया, कृष्णने उसका
उत्तर दिया कि, जैसे तुमने जलाया वैसे हमने काम उपजाया
चंद्र कामका सहायक है, इसकारण सौ चन्द्रमा धारण
करके मानों सौगुणा काम उत्पन्न करेंगे ॥
असिद्धास्पदहेतूत्प्रेक्षाअलंकार [ दोहा-जहां कछू कछु
सो लगे, समुझत देखत उक्त। उत्प्रेक्षा तासों कहें, पोन मनो
विष युक्त ॥ तर्क मोरचंद्रिकानमें, शशि उत्प्रेक्षा जान । हेतु
अकस असिद्धास्पद, अकस असिद्ध पद मान ] ॥ ३ ॥
मकराकृत गोपालके, कुंडल सोहत कान ।
धस्यो मनो हिय घर समर, ड्योढ़ी लसत निशान ४
मकरके आकारके कुंडल श्रीकृष्णके कानमें इसप्रकार
शोभित होते हैं, मानों इनके हृदयरूपी भवनमें काम (समर)
प्रवेश कर गया है, निशानरूपी द्वारपाल बाहर ड्योढ़ीपर
शोभा देते हैं, यदि कहो मनसे कामकी उत्पत्ति प्रवेश नहीं
( ४ ) सतसई-सटीक ।
बनता तो उत्तर यह है कि, मनसे उत्पन्न कामको आल-
म्बनके विना स्थिति नहीं होती, सो आलम्बन नायिका अन्य
स्थलमें होनेसे जब मन उसकी ओर जाकर सकाम होकर
आया, तब प्रवेश कहा, यहां उक्तास्पदवस्तूत्प्रेक्षाअलंकार
है । कुंडल वस्तु उक्त और निशानमें तर्क अर्थात्
उत्प्रेक्षाकी है ॥ ४ ॥
सोहत ओढ़े पीतपट, श्याम सलोने गात ।
मनो नीलमणि शैलपर, आतप पर्यो प्रभात ५॥
पीतवस्त्र धारण किये श्रीकृष्णके सलोनें ( नमकीन )
अंग ऐसे शोभित होते हैं, मानों नीलरत्नके पर्वतपर प्रातः-
कालमें ( आतप ) धूप पड़ीहो, उक्तास्पदवस्तूत्प्रेक्षा अलं-
कार है । श्याम गात पट वस्तुमें नीलगिरि धूपकी उत्प्रेक्षा
की है ॥ ५ ॥
अधर धरत हरिके परत, ओठ दीठ पट ज्योति।
हरित बाँसकी बाँसुरी,इन्द्रधनुष रँग होति ॥६ ॥
जिससमय श्रीकृष्ण ( अधर ) होठोंपर धारण करते हैं
उस समय होठ आंख और पीतपटकी लाल काली पीली
ज्योति पडती है उससमय हरे बाँस की बांसुरी इन्द्रधनुषके
समान होजाती है। बांसुरी हरी ओठ लाल इत्यादि कईरंग
मिलनेसे इन्द्रधनुषसी होती है। तद्गुण अलंकार है [ दोहा-
प्रथमशतक १. ( ५ )
अलंकार तद्गुण कहौं, औरे गुण गहिलेत । इन्द्रधनुष भइ
बाँसुरी, तजि निज गुणसों हेत ॥ ६ ॥
कितीनगोकुलकुलवधू, काहि न केहि सिखदीन।
कौने तजी न कुलगली, ह्वै मुरली सुरलीन ॥७॥
हे सखि! कितनीही गोकुलमें कुलवधूंहैं, किसने किसे शिक्षा
नहीं दी, मुरलीके सुरमें लीन होकर किसने अपने कुलकी
कान न त्यागदी । लीन-तन्मय । विशेषोक्तिअलंकार ।
[ दो०-विशेषोक्ति कारज नहीं, कारणकी अधिकाय । सो
ह्याँ शिक्षा कुलगली, रीति न रहत सुभाय ॥ ७ ॥
सखि सोहत गोपालके, उर गुंजनकी माल ।
बाहर लसत पियै मनो, दावानलकी ज्वाल॥८॥
हेसखि ! कृष्णके हृदयमें चौंटलियोंकी माला ऐसे शोभा
देतीहै, मानो पीनेपर दावानलकी लपट बाहर निकलकर शोभा
देतीहै, श्रीकृष्णका दावानल पान करना दशमस्कंधमें प्रसि-
द्धहै, कोई कहै कि, अमंगलवस्तुकी उपमा क्यों दी तो यह
उत्तर है कि, सौतके हाथकी गुथी मालाको देख डाहसे सखी
ने ऐसा कहा, उक्तास्पदवस्तूत्प्रेक्षाअलंकार[दोहा-उत्प्रेक्षामें
अरु जहाँ, संभावन जहँ होय । वस्तु हेतु फलमय त्रिविध,
मनु जनु पद तहँ जाय ॥ १ ॥ तहाँ वस्तु, उक्तास्पद अनु-
( ६ ) सतसई-सटीक ।
क्तास्पद जान । हेतु सफल सिद्धास्पद, असिद्धास्पद मान
॥ २ ॥ गुंजमाल यहि वस्तुमें, करि संभावन ज्वाल । माल-
उक्त उक्तास्पद, मनु पद प्रगट रसाल ॥ ३ ॥ ] ॥ ८ ॥
नितप्रति एक तहीं रहत, वैसवरण मन एक ।
चहियत युगलकिशोरलखि, लोचनयुगलअनेक ९
सदा एकही वयस वर्ण मनके द्वारा नितप्रति दोनों एकत्र ही
रहतेहैं इस युगल तरुण ( राधाकृष्ण ) की जोडी देखनेको तो
अनेक नेत्रोंके जोड़े चाहिये, कारण कि, दो नेत्रोंसे यह शोभा
नहीं देखीजाती, अथवा सखी कहती है आँखें मेरी दो हैं, अनेक
चाहियें, समालंकार । [ दोहा-उचित बात ठहराइये, सम
भूषण तिहि नाम । ह्वां सबविधि सम जानिये, कविवर श्यामा
श्याम ॥ १ ॥ ] ॥ ९ ॥
गोपिन सँग निशि शरदकी, रमत रसिक रसरास।
लहा छेह अति गतिनकी, सबन लखे सब पास १०
गोपियोंके साथ शरदऋतुकी रात्रिमें (रसिक) रसिया कृष्ण
सरस अनुरागसे रासमें क्रीडा करते रहे (लहाछेह) शीघ्रताके
कारण अनेक गतियोंके सेवनसे सबने श्रीकृष्णको सबके पास
देखा। विशेषालंकार[दोहा-एक वस्तु बहुतौरमें, जहँ वर्णनकी
होय। सो विशेष भूषण कहैं, जानतहैं सब कोय ॥१॥]॥१०॥
प्रथमशतक १. (७)
मोहिं करत कत बावरी, किये दुरावदुरैन ।
कहेदेत रँग रातके, रँगनिचुरतसेनैन ॥ ११ ॥
पति अन्य कहीं रमण करके आये, और अपनी प्रियासे
छिपाव किया, तब उसने कहा भला मुझे क्यों बावरी बनाते हो,
यह छिपाव कियेसे न छिपेगा, लालरंग निचुरतेसे नेत्रही
रातका रंग कहेदेते हैं, अर्थात् रातके जागनेकी लाली वि-
द्यमान है, काव्यलिंग । रंग निचुरते नेत्रने रातका रंग दृढ
किया ॥ ११ ॥
बाल कहा लाली भई, लोयन कोयन माँहि ।
लाल तिहारे दृगनकी, परी दृगनमें छाँहि ॥ १२ ॥
प्रश्नोत्तर । कृष्ण बोले हेबाला ! तुम्हारे नेत्रोंके कोयों में
लाली कैसी होरही है, सखी बोली प्यारे और कुछ नहीं तुम्हारे
नेत्रोंकी लालीकी परछाहीं मेरे नेत्रोंमें पड़ीहै, उत्तरालंकार
छेकानुप्रास प्रत्युत्तरसे प्रसिद्धही है ॥ १२ ॥
दुरै न निघर घटौदिये, यह रावरी कुचाल ।
विषसी लागतहै बुरी, हँसी खिसानी लाल ॥ १३ ॥
(निघर घटौदिये) ढुलखनेमें, वा ढिठाई करनेमें यह आप
की कुचाल नहीं छिपती, हेलाल! (कृष्ण) खिसियानेकी हँसी
विषके समान बुरी लगती है, पूर्णोपमा । [दोहा-समता
( ८ ) सतसई-सटीक ।
समवाचक धरम, वर्ण चारि इक ठौर । शशिसों निर्मल मुख
यथा, पूरण उपमा गौर ॥ ] हँसी उपमेय, विष उपमान, बुरा
लगना धर्म ॥ १३ ॥
स्वेदसलिल रोमांच कुश, गहि दुलहिन असनाथ।
दियो हियो सँग नाथके, हाथलियेही हाथ ॥१४॥
गंधर्वविवाह सात्त्विकभाव हे सखि! विवाहके समय दूलह
और दुलहीने ( स्वेद ) पसीनारूपी जल और रोमांचरूपी
कुश ग्रहण कर हाथमें हाथ लियेही अपना हिया स्वामीके
संग कर दिया। विवाहमें पाणिग्रहण होतेही दोनोंने मन दि-
या [ आसीद्धरः कंटकितः प्रकोष्ठे स्विन्नाङ्गुलिः संववृते
कुमारी ] रूपक अलंकार ॥ १४ ॥
कहत न देवरकी कुवत, कुलतिय कलह डराति ॥
पंजरगत मंजार ढिग, शुकलौं सूखति जाति १५
( कुलतिय ) कुलवधू देवरकी कुटिल बातें नहीं कहती
क्लेशसे डरती है बिलावके ढिग बैठेहुए पींजरेमें पड़े तोतेके
समान सूखती जातीहै, दृष्टान्तालंकार [ दोहा-सम बिम्बनि
प्रतिबिम्ब गति, है दृष्टान्त सुढंग । पंजरगत मंजारढिग, शुक
वर्णन कविरंग ] ॥ १५ ॥
पारयो शोर सुहागको, इन बिनही पिय नेह ॥
उन दोही अँखियाँकि कै, कै अलसोंही देह॥१६॥
प्रथमशतक १. ( ९ )
हे सखी! इसने पियाके स्नेह विनाही सुहागका शोर डाला,
अर्थात् प्रीति प्रसिद्ध की, उनींदी आँखों अथवा अलसानी
देहसे यह बात जानी जातीहै। यदि कहो कि प्रीतमके नेह
बिन सुहाग प्रसिद्ध नहीं होता, तो उत्तर यह कि, यह नाय-
काकी निज सखीकी वचन सौतकी सखीसे, है कि इसकी प्री-
तिको किसी सौतकी कुदृष्टि न लगे। पर्यायोक्ति। [ दोहा-
पर्यायोक्ति जहां नई, रचनासों कछु बात । साधै इष्ट
बनायकै, निज छल नहीं लखात ॥ ] ॥ १६ ॥
छुटी न शिशुताकी झलक, झलक्यो यौवन अंग।
दीपति देह दुहूँन मिलि, दिपति ताफता रंग १७
बालकपनकी झलक नहीं छुटी, कि अंगमें यौवन
छलका, दोनोंके मिलनेसे देहकी दीति ताफतारंगके
समान चमकतीहै, वयसन्धि वर्णन. ताफता-धूपछांहको
कहतेहैं जैसे इसमें ताने बानेके दोनों रंग चमकतेहैं इसप्रकार
उसके अंगमें बालपन और यौवन झलकताहै। वाचकलु-
प्तोपमा [दोहा-उपमे यरु उपमा धरमा, वाचक कह तहँ पाठ।
इकबिन द्वैबिन तीनबिन, सो लुप्तोपम पाठ ] ॥ यह जयपुरी
दृश्यहै ॥ १७ ॥
तिय तिथि तरणि किशोर वय, पुण्यकालसमदौन।
काहू पुण्यनि पाइयत, वय संधि संक्रॉन ॥१८॥
( १० ) सतसई-सटीक ।
सखीका कृष्णसे अन्य सखीका रूप कहना, वह सखी
तिथिहै तरुण अवस्था सूर्य है, पुण्यकाल समान दोनों अव-
स्था हैं, कोई किसी पुण्यसेही अवस्था और संक्रांतिकी संधि
पाताहै, अर्थात् ऐसे समय तियाका मिलना भाग्यसे होताहै
जब कि, बाल अवस्था छूटकर तरुणाई आती हो, सूर्य राशि
छोडकर दूसरीमें जाताहै यह संक्रान्तिका पुण्यकालहै सवि-
षय सावयव रूपकालंकार। [दोहा-रूपक सविषय सावयव,
सकल वस्तु जुवखाना रूप कीजिये ह्यां वयहि, अंग संक्रमण
जान ॥] ॥ १८ ॥
लालअलौकिक लरिकईं, लखिलाखिसखीसिहाँति
आज कालमें देखियत, उर उकसौहीं भांति १९
हे कृष्ण! उस सखीकी अलौकिक लोकोत्तर लरिकाई देखकर
सखी प्रसन्न होतीहै, कारण कि आज कलमेंही उरोज उकसे
से दीखनेवालेहैं। लोकोक्ति अलंकार [दोहा-लोक कहन वर्ण-
न जहां, लोकोक्ति कहि ताहि । आजकाल यह लोककी
कहन प्रसिद्ध चितचाहि॥] ॥ १९॥
अपने अंगके जानिक, यौवन नृपति प्रवीन ॥
स्तन नयन नितम्बको, बडो इजाफा कीन ॥२०॥
चतुर यौवन राजाने अपने (अंगके) सहायक जानकर
प्रथमशतक १. ( ११ )
कुच, मन, नेत्र (नितम्ब) कटिपश्चाद्भाग इनकी अधिक-
तर वृद्धि की। हेतूत्प्रेक्षालंकार ॥ २० ॥
नवनागरि तनु मुलक लहि, यौवन आमिल जोर।
घटि बढिते बढिघटि रकम, करी औरकी और २१
- यौवनरूपी (आमिल) हाकिमने नवनागरीका शरीररूपी
देश पाकर, अपने बलसे घटी बढी वस्तुकी बढा घटाकर और
की और ही करडाली, अर्थात् लरिकाईंको निकालदिया,
कमरको घटादिया, आंखें, केश, स्तन, नितम्ब, चतुराईको
बढादिया, स्वाभाविक चेष्टा चाल चलनको औरका और ही
करादिया। सविषयसावयवरूपकालंकार ॥ २१ ॥
ज्यों २ यौवन जेठदिन,कुचमितअतिअधिकाति
त्यों २ क्षण२ कटिक्षपा,क्षीण परत नित जाति २२
जैसे जेठके महीनेमें दिनका प्रमाण चढता है तैसे यौवनके
आनेसे कुचोंका प्रमाण बढताहै, जैसे २ जेठके महीनेकी रात
घटतीहै त्यों त्यों उसकी कमर घटती जातीहै, अति
अधिकात का भाव यह कि, यौवनसे स्तन बढे और
स्तनसे शोभा बढी। तद्रूपरूपकालंकार ॥ २२ ॥
बाढत तो उर उरज भर, भर तरुणईं बिकाम ॥
बोझनि सौंतनिके हिये, आवत रुंध उमाग २३
( १२ ) सतसई-सटीक ।
तेरा हृदय कुचोंके बोझ और युवावस्थाके खिलनेकी चम-
कसे बढताहै. इन बोझोंसे सौतोंके हियेमें घुटकर श्वास
आताहै । असंगतिअलंकार ॥ २३ ॥
भावक उभरोहों भयो,कछुक पन्यो भरु आय॥
सीपहराके मिस हियो, निशदिन हेरतजाय २४
हृदय थोडासा एक ऊँचासा हुआ और कुछेक बोझ आ-
कर पड़ा, सीपके हारके बहानेसे छाती रात दिन देखते जा-
यहै, भरु-बोझ । पर्यायोक्ति । [ दोहा-छलकर साधिय इष्ट
जहँ, पर्यायोक्ति विशिष्ट । सीपहराके मिस हियो, लखति
सुसाधति इष्ट ] ज्ञातयौवनामुग्धाहै ॥ २४ ॥
देह दुल्हैयाकी बढै; ज्यों ज्यों यौवनज्योति ॥
त्योंत्यों लखि सौतैं सबै,वदन मलिनद्युतिहोति २५
ज्यों ज्यों दुलहिनकी देह बढतीहै, त्यों२ यौवनकी ज्योति
बढती है, तैसे तैसेही देखकर सौतोंके मुखकी कांति मलीन
होतीहै । नवोढा मुग्धा । उल्लासालंकार [ दोहा-इकके गुणसे
होय जहँ, औरहि दोष उलास । दुलहीके गणते बढ्यो, सौ-
तिन दोष प्रकास ॥ ] ॥ २५ ॥
मानो मुख दिखरावनो, दुलहिन करि अनुराग ॥
साससदन मन ललनहूं, सौतिन दियो सुहाग २६
प्रथमशतक १. (१३)
मानो मुख दिखानेके बहानेसे प्रेमकरके दुलहीको सासने
घर, पतिने मन, और सौतोंने सुहाग अर्थात् पतिका प्यार
दियाहै, प्रसिद्धहै कि, नई बहूको मुख दिखरावनी दीजातीहै।
हेतूत्प्रेक्षालंकार ॥ २६ ॥
निरखि नवोढा नारि तनु,छुटत लरकईं लेस ॥
भो प्यारो प्रीतम तियन,मानहुँ चलत विदेस॥२७
नवोढा स्त्रीका शरीर देखकर लरिकाईंका लगाव छूटने
लगा तब प्रियतम स्त्रियोंको इसप्रकार प्यारा लगने लगा
मानो परदेशको चलताहै,परदेश जातेसमय पुरुष बहुत प्रिय
लगताहै । हेतूत्प्रेक्षा ॥ २७ ॥
ढीठो दै बोलति हँसति,प्रौढ विलास अप्रौढ ॥
त्योंत्योंचलतनपियनयन, छकयेछकीनवौढ २८
यह सखी ढिठाई देकर बोलती और हँसती है इसकी
लीला प्रौढाकीसीहै, औरयह प्रौढा नहीं है, जैसेयह लीला क-
रतीहै तैसे २ प्रीतमके नयन इसकी ओर लगनेसे चलायमान
नहीं होते, यौवन रूपकी मतवाली नवोढाने मतवाला कि-
याहै।स्वभावोक्ति[दोहा-सुधी सुधी बातसे, स्वभावोक्ति पहि-
चान। लीला बोलन हँसनकी, तिय स्वभावमें मान॥ २८ ॥
चालकी बातें चलीं, सुनत सखिनके टोल ॥
( १४ ) सतसई-सटीक ।
गोयेहू लोचन हँसति, विहँसत जात कपोल २९॥
सखियोंके समूहमें गौनेकी बातें सुनकर आंखें छिपाकर
भी हँसती है, और गाल हँसीसे मानों मुसकुराते जातेहैं। स्व-
भावोक्ति । छलिता कामामुग्धाहै ॥ २९ ॥
लखि दौरत पियकर कटक, वास छुडावनकाज॥
वरुनी वन दृगगढनिमैं, रही पैठिकरि लाज ३०
देखकर प्रीतमका हाथरूपी कटक जो वस्त्र और ठौर छु-
टानेके कामको दौडताहै, उस समय वरौनियोंके वन और
नेत्ररूपी दुर्गमें मानो भाजकर लाजने वास कियाहै। सुरतके
समय लाज मानों पलकोंके बालोंमें छिपी । सविषय सावयव
रूपक ॥ ३० ॥
दीप उजेरेहू पतिहि, हरत वसन रतिकाज ॥
रही लपटि छबिकी छटानि, नेकौ छूटी न लाज ३१
दीप उजेरेहीमें जब पतिने रतिके निमित्त वस्त्र हरणकिये,
तबभी वह छबिकी छटाकी ज्योतिसे लिपटीही रही नेकभी
लाज न छूटी इसकारण पतिका यत्न न पूरा हुआ । विशे-
षोक्ति [ दोहा-विशेषोक्ति कारज नहीं, कारणकी अधिकाय ।
निलज करनको यत्न किय, लाज न छूटन पाय ] ॥ ३१ ॥
समरस समर संकोचवश, विवसन ठिकुठहराय।
प्रथमशतक १. ( १५ )
फिरिफिरिउझकतिफिरिदुरति, दुरिडरिउझकतिजाय
समान गुणवाले काम और संकोच (लाज) के वड़ासे
अवश हो ठीक नहीं ठहरती, फिर फिरकर झाँकतीहै, फिर
छिपतीहै फिर आके छिप २ कर झाँकतीहै, आशय यह कि,
प्रीतम मुझे न देखें न प्रीतमके देखतेमें कोई मुझे देखे। य-
मकालंकार लाटानुप्रास[दोहा-वहै शब्द फिरि फिरि परै, अर्थ
और ही और। सो यमकानुप्रासै, भेद अनेकन ठौर॥ १॥ एक
शब्द बहुवार जो, सो लाटानुप्रास। तात्पर्यते होत है, और
अर्थ प्रकास २॥ ] ॥ ३२ ॥
करे चाहसों चुटिकिकै, खरे उडौहैं मैन ॥
लाज नवाये तरफरत, करत खूंदसी नैन ॥३३॥
मैन अर्थात् कामदेवने चाहसे चुटकाकर उड़ते वा उठतेहु
येसे खडे किये, लज्जाके नवाये पर खुदीसी करतेहुए नेत्र
तडफडाते हैं । इसमें नेत्रोंको घोडेके समान निरूपित
कियाहै उन्हें कामरूपी चाबुककी चाहसे चाबुक मार उडौ हैं
परन्तु लाज झुकादेतीहै चुटकीके चाबुकका चटाका करके
खुदी खूँदनीहुई चाल अथवा पैरमें नख गढजानेकी चाल,
उपमान लुप्तालंकार [दोहा-नैन यहां उपमेय हैं, सो वाचक
परमान । खुंदधर्म हय ना कह्यो, लुप्ता यह उपमान] ॥ ३३ ॥
( १६ ) सतसई-सटीक ।
छुटी न लाजन लालचौ, प्यौलखि नैहर गेह ॥
सटपटात लोचन खरे, भरे सकोच सनेह ॥ ३४ ॥
नैहरके घरमें पियाको देखकर न तो लाजही छुटी; और
न लालचही छूटा, संकोच और सनेहसे भरेहुए नेत्र आगे
सटपटाते रहे, पर्यायोक्तिअलंकार ॥ ३४ ॥
पिय बिछुरनको दुसह दुख, हरषजात प्यौसार ॥
दुर्योधनलौं देखियत, तजत प्राण इहिवार ॥३५॥
पियाके बिछुरनेका महादुःख है; और प्यौसार माके जानेका
महासुखहै, इस समय दुर्योधनके प्राण छूटनेकीसी दशा
होरहीहै दुर्योधनका मरण हर्ष शोकके मध्यमें था । अथवा
इहिवार नाम यह बाला दुर्योधनके समानहै, पहलेमें उपमेय
लुप्ता और दूसरेमें पूर्णोपमा ॥ ३५ ॥
पति रतिकी बतियां कहीं, सखी लखी मुसकाय॥
करिकै सबै टलाटली, अलींचलीं सुख पाय॥ ३६॥
पतिने जो रतिकी बातें कहीं, सो प्यारीने सखीको मुसका-
कर देखा, तब सब आली टालाटाली करके सुखपाय घर
चलीं पर्यायोक्ति ॥ ३६ ॥
सकुच सुरत आरंभही, बिछुरी लाज लजाय ।
ठरकि ढार ढुरि ढिगभई, ढीठ ढिठाई आय॥३७॥
प्रथमशतक १. ( १७ )
संकोच कामकेलिके आरंभहीमें बिछुरगई जातीरही लाज
से लजित होके लुढ़कनेकी भाँति प्रसन्न होकर निर्लज्ज ढिठाई
मानो प्रियाके निकट आकर स्थितहुई, वृत्ति अनुप्रास
[ दोहा-कहूँ सरि वर्ण अनेककी, परै अनेकन बार। एकहिकी
आवृत्ति कहुं, वृत्ती दोइप्रकार ] ॥ ३७ ॥
सब अँग करि राखी सुघर, नायक नेह सिखाय ।
रसयुत लेति अनन्त गति, पुतरी पातुरराय॥३८॥
नायक (संगीतादि सब भेदके ज्ञाता) नेहने सिखाकर उसे
सब अंगसे चतुरकर रक्खी है अनुरागके साथ अनन्तगति
लेती है वह नृत्य करनेवालीयोंकी सरदारहै सविषय सावयव
रूपक ॥ ३८ ॥
विहँसि बुलाय विलोकउत, प्रौढतिया रसघूमि ।
पुलकि पसीजति पूतको, पियचूम्यो मुखचूमि ३९
सौतके बेटेका मुख पतिने चूमा तब प्रौढतिया रसमें घूमि
मत्त होकर उसे देख हँसकर बुलाय उस पियके चूमे पूतके
मुखको चूमकर पुलकितहो पसीजी सात्विकभाव असंगति
अलंकार [ दोहा-हियमें काम प्रकाशरो, चाहिये पियमुख
चूमि । संगति तज प्रौढा सुवन, मुख चूम्यो रसघूमि ] ॥३९॥
सोवत लखि मनमान धर, ढिग सोयो प्यों आय।
( १८ ) सतसई-सटीक ।
रहीसुपनकीमिलनमिलि,पियहियसोंलिपटाय ४०
प्यारीको सोया देखकर पतिमानसे उसके निकट आ सोया
उससमय स्वामीको हृदयसे लगाकर प्यारी नींदकी मिलनसे
मिलरही पर्यायोक्ति ॥ ४० ॥
त्रिवलीनाभि दिखायके,शिरढकिसकुचिसमाहि।
गलीअलीकी ओटह्वै,चलीभलीविधि चाहि॥४१॥
उदरकी त्रिवली और नाभि दिखाके शिरढक सकुचमें
आके गलीमें आलीकी ओटमें प्यारी पियाको भलीप्रकार
देखकर चली स्वभावोक्ति अलंकार ॥ ४१ ॥
देखत कछु कौतुक इतै, देखो नेक निहारि ॥
कबकी इकटक डटिरही,टटियाअँगुरिनिफारि४२
सखी बोली प्यारे देखतेहो कुछ कौतुक तनक इधर
निहारके तो देखो तुम्हारी प्यारी अँगुरीसे टट्टीको फारकर
कबसे टकटकी लगाये अटकरही है स्वभावोक्ति ॥ ४२ ॥
भौंहनि त्रासति मुख नटति,आँखिनसोंलपटाति ।
ऐंच छुरावत कर इची, आगे आवति जाति॥४३॥
भौंहसे डरती है,मुखसे नाहीं करती है,अँखियासे लिपटती
है, खैंचकर छुडावती है परन्तु खिंचीहुई स्वामीके पास आती
जाती है, स्वभावोक्ति ॥ ४३ ॥