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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

प्रथमशतक १. ( ५ )
अलंकार तद्गुण कहौं, औरे गुण गहिलेत । इन्द्रधनुष भइ
बाँसुरी, तजि निज गुणसों हेत ॥ ६ ॥
कितीनगोकुलकुलवधू, काहि न केहि सिखदीन।
कौने तजी न कुलगली, ह्वै मुरली सुरलीन ॥७॥
हे सखि! कितनीही गोकुलमें कुलवधूंहैं, किसने किसे शिक्षा
नहीं दी, मुरलीके सुरमें लीन होकर किसने अपने कुलकी
कान न त्यागदी । लीन-तन्मय । विशेषोक्तिअलंकार ।
[ दो०-विशेषोक्ति कारज नहीं, कारणकी अधिकाय । सो
ह्याँ शिक्षा कुलगली, रीति न रहत सुभाय ॥ ७ ॥
सखि सोहत गोपालके, उर गुंजनकी माल ।
बाहर लसत पियै मनो, दावानलकी ज्वाल॥८॥
हेसखि ! कृष्णके हृदयमें चौंटलियोंकी माला ऐसे शोभा
देतीहै, मानो पीनेपर दावानलकी लपट बाहर निकलकर शोभा
देतीहै, श्रीकृष्णका दावानल पान करना दशमस्कंधमें प्रसि-
द्धहै, कोई कहै कि, अमंगलवस्तुकी उपमा क्यों दी तो यह
उत्तर है कि, सौतके हाथकी गुथी मालाको देख डाहसे सखी
ने ऐसा कहा, उक्तास्पदवस्तूत्प्रेक्षाअलंकार[दोहा-उत्प्रेक्षामें
अरु जहाँ, संभावन जहँ होय । वस्तु हेतु फलमय त्रिविध,
मनु जनु पद तहँ जाय ॥ १ ॥ तहाँ वस्तु, उक्तास्पद अनु-