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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

( ४ ) सतसई-सटीक ।
बनता तो उत्तर यह है कि, मनसे उत्पन्न कामको आल-
म्बनके विना स्थिति नहीं होती, सो आलम्बन नायिका अन्य
स्थलमें होनेसे जब मन उसकी ओर जाकर सकाम होकर
आया, तब प्रवेश कहा, यहां उक्तास्पदवस्तूत्प्रेक्षाअलंकार
है । कुंडल वस्तु उक्त और निशानमें तर्क अर्थात्
उत्प्रेक्षाकी है ॥ ४ ॥
सोहत ओढ़े पीतपट, श्याम सलोने गात ।
मनो नीलमणि शैलपर, आतप पर्यो प्रभात ५॥
पीतवस्त्र धारण किये श्रीकृष्णके सलोनें ( नमकीन )
अंग ऐसे शोभित होते हैं, मानों नीलरत्नके पर्वतपर प्रातः-
कालमें ( आतप ) धूप पड़ीहो, उक्तास्पदवस्तूत्प्रेक्षा अलं-
कार है । श्याम गात पट वस्तुमें नीलगिरि धूपकी उत्प्रेक्षा
की है ॥ ५ ॥
अधर धरत हरिके परत, ओठ दीठ पट ज्योति।
हरित बाँसकी बाँसुरी,इन्द्रधनुष रँग होति ॥६ ॥
जिससमय श्रीकृष्ण ( अधर ) होठोंपर धारण करते हैं
उस समय होठ आंख और पीतपटकी लाल काली पीली
ज्योति पडती है उससमय हरे बाँस की बांसुरी इन्द्रधनुषके
समान होजाती है। बांसुरी हरी ओठ लाल इत्यादि कईरंग
मिलनेसे इन्द्रधनुषसी होती है। तद्गुण अलंकार है [ दोहा-