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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

( ६ ) सतसई-सटीक ।
क्तास्पद जान । हेतु सफल सिद्धास्पद, असिद्धास्पद मान
॥ २ ॥ गुंजमाल यहि वस्तुमें, करि संभावन ज्वाल । माल-
उक्त उक्तास्पद, मनु पद प्रगट रसाल ॥ ३ ॥ ] ॥ ८ ॥
नितप्रति एक तहीं रहत, वैसवरण मन एक ।
चहियत युगलकिशोरलखि, लोचनयुगलअनेक ९
सदा एकही वयस वर्ण मनके द्वारा नितप्रति दोनों एकत्र ही
रहतेहैं इस युगल तरुण ( राधाकृष्ण ) की जोडी देखनेको तो
अनेक नेत्रोंके जोड़े चाहिये, कारण कि, दो नेत्रोंसे यह शोभा
नहीं देखीजाती, अथवा सखी कहती है आँखें मेरी दो हैं, अनेक
चाहियें, समालंकार । [ दोहा-उचित बात ठहराइये, सम
भूषण तिहि नाम । ह्वां सबविधि सम जानिये, कविवर श्यामा
श्याम ॥ १ ॥ ] ॥ ९ ॥
गोपिन सँग निशि शरदकी, रमत रसिक रसरास।
लहा छेह अति गतिनकी, सबन लखे सब पास १०
गोपियोंके साथ शरदऋतुकी रात्रिमें (रसिक) रसिया कृष्ण
सरस अनुरागसे रासमें क्रीडा करते रहे (लहाछेह) शीघ्रताके
कारण अनेक गतियोंके सेवनसे सबने श्रीकृष्णको सबके पास
देखा। विशेषालंकार[दोहा-एक वस्तु बहुतौरमें, जहँ वर्णनकी
होय। सो विशेष भूषण कहैं, जानतहैं सब कोय ॥१॥]॥१०॥