सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

प्रथमशतक १. ( ३ )
मोर मुकुट की चंद्रिका, यों राजत नँदनंद ।
मनु शशिशेखरको अकस, किय शेखर शतचंद ३
मोरपंखके मुकुट धारण किये उस मोरपंखकी चन्द्रा-
कार रेखासे नँदसुवन इसप्रकार शोभायमान होते हैं, मानों
( शशिशेखर ) शिवजीके मनकी ( अकस ) वैमनस्यता
विचारकर कृष्णने अपने शिरपर सौ चन्द्रमा धारण किये हैं,
तात्पर्य यह शिवने कामको दग्ध किया, कृष्णने उसका
उत्तर दिया कि, जैसे तुमने जलाया वैसे हमने काम उपजाया
चंद्र कामका सहायक है, इसकारण सौ चन्द्रमा धारण
करके मानों सौगुणा काम उत्पन्न करेंगे ॥
असिद्धास्पदहेतूत्प्रेक्षाअलंकार [ दोहा-जहां कछू कछु
सो लगे, समुझत देखत उक्त। उत्प्रेक्षा तासों कहें, पोन मनो
विष युक्त ॥ तर्क मोरचंद्रिकानमें, शशि उत्प्रेक्षा जान । हेतु
अकस असिद्धास्पद, अकस असिद्ध पद मान ] ॥ ३ ॥
मकराकृत गोपालके, कुंडल सोहत कान ।
धस्यो मनो हिय घर समर, ड्योढ़ी लसत निशान ४
मकरके आकारके कुंडल श्रीकृष्णके कानमें इसप्रकार
शोभित होते हैं, मानों इनके हृदयरूपी भवनमें काम (समर)
प्रवेश कर गया है, निशानरूपी द्वारपाल बाहर ड्योढ़ीपर
शोभा देते हैं, यदि कहो मनसे कामकी उत्पत्ति प्रवेश नहीं