बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीः ।
बिहारी सतसई-सटीक ।
प्रथम शतकः ।
टीकाकारका मंगलाचरण ।
दोहा-वृंदाविपिनविहाररत, सकलसुमंगलमूल ।
बुध ज्वालाप्रसादपर, सदा रहो अनुकूल ॥ १॥
नँदनंदन शोभासदन, नटवर मदनगुपाल ।
मुरलीधर गिरिवर द्रवह, कुंजविहारीलाल ॥ २॥
अथ ग्रंथारम्भः ।
दोहा-मेरी भवबाधा हरो, राधा नागरि सोइ ।
जातनुकी झाँई परे, श्याम हरित द्युति होइ १
सोई नागरि ( चतुर ) राधिका मेरे जन्म मरणकी बाधा
( दुःख ) हरणकरो, जिन राधिकाके शरीरकी झाँईमात्र
पड़नेसे श्रीकृष्णकी ( हरित ) प्रफुल्लकांति होजाती है अर्थात्
जिनकी झाँईमात्रसें श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं, काव्यालिंग
अलंकारहै [ दोहा-हेतुसमर्थन युक्तिसों, काव्यालिंगको अंग,
ह्यां भवबाधा हरनको, श्रीराधिका प्रसंग ] अथवा जिन
राधिकाके शरीरकी पीत झाँई पड़नेसे कृष्णके शरीरकी