बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमशतक १. (७)
मोहिं करत कत बावरी, किये दुरावदुरैन ।
कहेदेत रँग रातके, रँगनिचुरतसेनैन ॥ ११ ॥
पति अन्य कहीं रमण करके आये, और अपनी प्रियासे
छिपाव किया, तब उसने कहा भला मुझे क्यों बावरी बनाते हो,
यह छिपाव कियेसे न छिपेगा, लालरंग निचुरतेसे नेत्रही
रातका रंग कहेदेते हैं, अर्थात् रातके जागनेकी लाली वि-
द्यमान है, काव्यलिंग । रंग निचुरते नेत्रने रातका रंग दृढ
किया ॥ ११ ॥
बाल कहा लाली भई, लोयन कोयन माँहि ।
लाल तिहारे दृगनकी, परी दृगनमें छाँहि ॥ १२ ॥
प्रश्नोत्तर । कृष्ण बोले हेबाला ! तुम्हारे नेत्रोंके कोयों में
लाली कैसी होरही है, सखी बोली प्यारे और कुछ नहीं तुम्हारे
नेत्रोंकी लालीकी परछाहीं मेरे नेत्रोंमें पड़ीहै, उत्तरालंकार
छेकानुप्रास प्रत्युत्तरसे प्रसिद्धही है ॥ १२ ॥
दुरै न निघर घटौदिये, यह रावरी कुचाल ।
विषसी लागतहै बुरी, हँसी खिसानी लाल ॥ १३ ॥
(निघर घटौदिये) ढुलखनेमें, वा ढिठाई करनेमें यह आप
की कुचाल नहीं छिपती, हेलाल! (कृष्ण) खिसियानेकी हँसी
विषके समान बुरी लगती है, पूर्णोपमा । [दोहा-समता