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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 55

( २ ) सतसई-सटीक ।
कांति हरित होजाती है, प्रत्यक्षहै कि, नीलमें पीला मिल-
नेसे हरा रंग होता है, यहां हेतुकअलंकार जानना [दोहा-हेतु
सहित कारज जहां, कहैं हेतु कविराज । प्रिय प्रीतम रंग
इयाम पिय, हेतु हरित रंग काज ] अथवा जिन राधिकाके
शरीरकी झांईंसे श्रीकृष्ण हरे होजाते हैं । झांईंका अर्थ
झलक अथवा छाया है ॥
अत्युक्ति (राधा) सोंठ (नागरि) नागरमोथा (सोय)
सोया यह तीनों मेरी भवबाधाको दूरकरो अर्थात् जिसके
तनुपर झांईं पड़नेसे इयाम वर्ण पिटिका पड़गई हैं, यह तीनों
पीसकर लगावे तो उसके शरीरकी (हरित) डहडही कान्ति
होजाती है ॥ १ ॥
शीश मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल ।
यहि बानिक मो मन बसो, सदा विहारीलाल॥२॥
शिरपर मुकुट कमरमें कछनी हाथमें मुरली हृदयमें
मालावाले हे विहारीलाल ! तुम सदा इस बनावसे मेरे हृदयमें
निवासकरो, जैसे उपरोक्त अलंकार अपने स्थानको छोड़कर
अन्यत्र नहीं रहते, इसीप्रकार आप मेरे हृदयके विना अन्यत्र
न रहो । विहारीलालका अर्थ रहस्यलीलाके रसिक । जाति-
अलंकार [ दोहा-जातिसु जैसो जासुको, रूप कहैं तिहि
साज। जो ह्यां प्रभु बानिक जुहो, कह्यो सु त्यों कविराज]॥२॥