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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

इस्लाम और भारत ६७
बाज़ाब्ता हमने, उसके कारणों और उसके नतीजों को बयान कर देना
चाहते हैं ।
भारत पर पहला हमला
ईसा की आठवीं सदी के शुरू में कुछ अरब सौदागरों की सिंहलद्वीप
( लंका ) में मृत्यु हुई । ये अरब सौदागर इराक़ के रहने वाले थे । सिंहल-
द्वीप के राजा ने इन अरबों की कुछ अनाथ लड़कियों को एक जहाज़ में बैठा
कर इराक़ के मुसलमान गवर्नर हज्जाज के पास भेजा । मार्ग में कच्छ के
कुछ डाकुओं ने, जिन्हें बावरिज कहते थे, जहाज़ पर हमला करके अरब
लड़कियों को छीन लिया । हज्जाज ने काठियावाड़ के हिन्दू राजा दाहिर से
लड़कियाँ तलब कीं । दाहिर हजाज की माँग पूरी न कर सका । इस पर
हजाज ने बलूचिस्तान के रास्ते ख़ुश्की से मोहम्मद बिन क़ासिम के नेतृत्व
में एक सेना सन् ७१२ ईसवी के क़रीब भारत पर हमला करने के लिए
भेजी ।* यही भारत के ऊपर मुसलमानों का सब से पहला हमला था ।
भारत की राजनैतिक हालत उस समय कुछ निर्बल थी जिसका अधिक हाल
हम आगे चल कर देंगे । मोहम्मद बिन क़ासिम ने सिन्ध और मुलतान को
विजय करके उन पर अपनी हुकूमत क़ायम कर ली ।
सिन्ध पर मुस्लिम हुकूमत
इस हमले के सम्बन्ध में हमें चार बातें ध्यान में रखनी चाहिएँ :—
( १ ) यह कि भारत पर मुसलमानों का पहला हमला उस समय
हुआ जब कि पूरब में तातार तक और पश्चिम में स्पेन तक मुसलमानों की
हुकूमत क़ायम हो चुकी थी ।

  • Elliot's History of India, vol. i, p. 118.

६८ पुस्तक प्रवेश
(२) यह कि इतिहास लेखक विल्क्स के अनुसार इराक़ का गवर्नर
हज्जाज अपने देश में तेज़ मिज़ाज मशहूर था और इराक़ के अनेक
मुसलमानों ने उसकी सख्तियों से भाग कर भारत के दक्खिन में कोकण
और रासकुमारी आदि स्थानों में आश्रय लिया था।
(३) यह कि इतिहास से पता चलता है कि मोहम्मद बिन क़ासिम
सिन्ध के अन्दर अपनी हिन्दू और मुसलमान प्रजा के साथ एक समान
निष्पक्ष व्यवहार करता था।
सिन्ध विजय के बाद उसने हज्जाज से लिख कर पूछा कि यहाँ के
लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जावे। हज्जाज ने उत्तर दिया—
“जब कि उन लोगों ने आत्मसमर्पण कर दिया है और ख़लीफ़ा
को टैक्स देना मंज़ूर कर लिया है तो उनसे और कुछ भी चाहना जायज़
नहीं है। हमने उन्हें अपनी हिफ़ाज़त में ले लिया है, और हम किसी तरह
भी उनके जान या माल पर हाथ नहीं उठा सकते। उन्हें अपने देवताओं
की पूजा करने की इजाज़त दी जाती है। हरगिज़ किसी शख़्स को भी न
अपने धर्म का पालन करने से मना करना चाहिये और न रोकना चाहिये।
अपने घरों में वे जिस तरह चाहें रहें।”*
डॉक्टर बेनीप्रसाद ने अपनी पुस्तक 'जहांगीर के इतिहास' में लिखा
है कि—“८ वीं सदी में मोहम्मद बिन क़ासिम की सिन्ध पर हुकूमत नरमी
और धार्मिक उदारता की एक जीती जागती मिसाल थी।”†

  • "The History of Medieval India." by Ishwari Prasad, p. 52, 53.
    † "Mohammad Bin Qasim's administration of Sindh in the 8th century
    was a shining example of moderation and tolerance "--History of Jehangir,
    by Dr. Beniprasad, p. 89.

इस्लाम और भारत ६६
( ४ ) हमें यह याद रखना चाहिए कि इसके बाद महमूद ग़ज़नवी के
समय तक यानी तीन सौ साल तक फिर न कोई और हमला मुसलमानों
का भारत पर हुआ और न सिन्ध या मुलतान से आगे उनका राज बढ़ा ।
प्राचीन अरब और भारत का सम्बन्ध
अब हम उस समय के अरबों और भारतवासियों के परस्पर सम्बन्ध
को थोड़े विस्तार के साथ बयान कर देना चाहते हैं । अरबों और भारत-
वासियों का सम्बन्ध अरबों के मुसलमान होने से बहुत पहले से यानी
हज़रत मोहम्मद के जन्म से कम से कम पाँच सौ साल पहले से चला
आता था । हज़रत ईसा के जन्म के समय से ही सैकड़ों बल्कि हज़ारों
अरब सौदागर भारत के पश्चिमी और पूर्वी बन्दरगाहों पर आकर उतरते
थे। ख़ासकर पच्छिम में चाल, कल्याण, सुपारा, और मलबार तट पर
अरबों की अनेक बड़ी बड़ी बस्तियों का उस समय के इतिहास में ज़िक्र
आता है । हज़रत ईसा के जन्म से पहले ही लंका और दक्खिन भारत में अरबों
और ईरानियों की अनेक बस्तियाँ मौजूद थीं । ईरान, अरब, अफ़रीका और
यूरोप के विविध देशों के साथ भारत का उस समय जितना व्यापार था,
अधिकतर अरब और ईरानी सौदागरों ही के हाथों में था । रोमन इतिहास
लेखक लिखते हैं कि रोम और यूनान के जो जहाज़ उन दिनों भारत आते
जाते थे उनके भी नाविक अधिकतर अरब ही होते थे । भारत और चीन के
बीच की तिजारत का भी एक ख़ासा हिस्सा अरबों ही के हाथों में था,
जिसके सबब भारत के पूर्वी तट से भी ये लोग पूरी तरह परिचित थे, और
वहाँ भी स्थान स्थान पर इनकी अनेक बस्तियाँ आबाद थीं ।
उस समय के अरबों का मज़हब एक प्राचीन ढङ्ग का सीधा सा मज़हब

७० पुस्तक प्रवेश
था । वे अपने अलग अलग क़बीलों के अनेक देवी देवताओं को मानते थे
और उनकी मूर्तियों की पूजा करते थे । उस समय के अनेक यात्रा वृत्तान्तों
से साबित है कि ये अरब अत्यन्त सरल स्वभाव और उदार चित्त होते थे,
भारतवासियों से उनका मेल जोल और प्रेम ख़ूब बढ़ा हुआ था और
भारत में उनकी बस्तियाँ ख़ूब ख़ुशहाल थीं ।
इसके बाद मोहम्मद साहब के जन्म और इसलाम के प्रचार का समय
आया । अरबों और ख़ासकर अरब व्यापारियों का भारत आना जाना पहले
की तरह जारी रहा । फ़रक़ केवल यह हो गया कि पुराने मूर्तिपूजक अरबों
की जगह अब निराकार के उपासक नए मुसलमान अरब भारत आने लगे ।
या वही अरब अब मुसलमान हो गए, उनके साथ साथ अब एक नए
मज़हब और इसलाम के नए विचारों और नए आदर्शों ने भी भारत में
प्रवेश किया । हमें याद रखना चाहिए कि अरब मुसलमानों और उनके साथ
इसलाम के इस तरह भारत में प्रवेश करने का किसी सैन्य यात्रा या फ़ौजी
हमले से कोई सम्बन्ध न था ।
आठवीं सदी का भारत
इस स्थान पर आगे बढ़ने से पहले उस समय के भारत की हालत को
संक्षेप में बयान कर देना भी आवश्यक है । ईसा की सातवीं सदी के मध्य
में सम्राट हर्षवर्धन की सत्ता का अन्त हुआ । उत्तर भारत टुकड़े टुकड़े होकर
अनेक छोटी छोटी रियासतों में बँट गया । राजपूतों ने पश्चिम से चल कर
उत्तर पूरब में और मध्य भारत में अनेक छोटी छोटी रियासतें क़ायम कर
लीं । अनेक नई जातियाँ अपने को राजपूत कहने लगीं । यहाँ तक कि
मुसलमानों के आने से ठीक पहले पञ्जाब से दक्खिन तक और बङ्गाल से

इस्लाम और भारत ७१
अरब सागर तक क़रीब क़रीब सारा देश राजपूतों के शासन में आगया ।
कोई प्रधान केन्द्रीय शक्ति इन सब छोटी बड़ी रियासतों को वश में रखने
वाली न थी, और आए दिन इन तमाम रियासतों के बीच अपना अपना
राज बढ़ाने के लिए एक दूसरे से संग्राम होते रहते थे । यानी एक प्रधान
और प्रबल भारतीय साम्राज्य की जगह एक दूसरे की प्रतिस्पर्धी और एक
दूसरे से स्वतन्त्र अनेक छोटे बड़े राजा भारत पर शासन करते थे, और
राजनैतिक या राष्ट्रीय एकता केवल स्वप्नमात्र थी। पुराने साम्राज्यों के केन्द्र
मगध, पाटलीपुत्र, गया इत्यादि खण्डहर दिखाई दे रहे थे। वैशाली,
कुशीनगर, केड़िया, रामग्राम, कपिलवस्तु और श्रावस्ती, जिनके नाम बौद्ध
इतिहास में मशहूर हो चुके थे, अब बरबाद दिखाई देते थे और देश के
राजनैतिक और आर्थिक जीवन के दूसरे केन्द्रों ने उनकी जगह ले ली थी ।
धर्म के क्षेत्र में भी भारत का वह समय एक बहुत बड़े परिवर्तन और
अवनति का समय था । बुद्ध की मृत्यु से ढाई सौ साल के अन्दर, यानी
हज़रत ईसा के जन्म से क़रीब ढाई सौ साल पहले, उस समय के बिगड़े
हुए हिन्दू धर्म को भारत से निकाल कर बौद्ध धर्म उसका स्थान ले चुका
था । किन्तु जिन ब्राह्मण पुरोहितों और उच्च जातियों के विशेषाधिकारों पर
बौद्ध धर्म ने हमला किया था उनकी ओर से विद्रोह की आग बराबर
सुलगती रही । धीरे धीरे प्रतिमापूजा ने और अन्य प्राचीन हिन्दू कर्मकाण्ड
ने बौद्ध धर्म में भी प्रवेश करना शुरू किया। उत्तर भारत में महायान
सम्प्रदाय की नींव रक्खी गई, जिसमें बुद्ध भगवान के अलावा अनेक
बोधिसत्वों की और ख़ासकर 'अमिताभ' की पूजा होने लगी। बौद्ध मन्दिरों
का समस्त कर्मकाण्ड हिन्दू मन्दिरों के ढङ्ग पर ढल गया । शुरू के बौद्ध मत

७२ पुस्तक प्रवेश
ने जो स्थान संस्कृत से छीन कर देश की भाषा प्राकृत या पाली को दिया
था, वह अब महायान सम्प्रदाय में फिर से संस्कृत को प्रदान किया गया ।
ज्ञान मार्ग की जगह बहुत दरजे तक कर्मकाण्ड और भक्ति ने ले ली ।
धीरे धीरे आजकल के वैष्णव मत, शैवमत और तान्त्रिक सम्प्रदाय ने
मिलकर बौद्ध मत को भारत से निकाल बाहर कर दिया और प्राचीन हिन्दू
धर्म को फिर से उसका स्थान प्रदान कर दिया । निस्सन्देह उच्च श्रेणी के
थोड़े से लोगों के लिए उपनिषद और दर्शनशास्त्र के सूक्ष्म उपदेश उस
समय भी मौजूद थे, किन्तु सर्वसाधारण के लिए धर्म का पथ खासा
अन्धकारमय और गन्दा हो चला था । जिस जातिभेद को बौद्ध धर्म ने नष्ट
कर स्त्रियों और शूद्रों को मनुष्यत्व के अधिकार प्रदान करना चाहा था, वह
जातिभेद फिर अपने पूरे ज़ोर के साथ क़ायम हो चुका था । ब्राह्मणों की
श्रेष्ठता और अन्य वर्णों, ख़ासकर शूद्रों की हीनता ने फिर से भारतीय
समाज को जकड़ कर उसके विकास को असम्भव कर दिया था । पण्डों और
पुरोहितों के विशेषाधिकार फिर से क़ायम हो गए थे । और अधिकांश आम
जनता के लिए सिवाय जात पाँत और ऊँच नीच के नियमों का पालन
करने, असंख्य देवी देवताओं, भयङ्कर 'रुद्र' और प्रचण्ड 'शक्ति' की मूर्तियों
को पूजने, जप, तप, यज्ञ, हवन, पूजा, पाठ, ब्राह्मणों को दान, तीर्थयात्रा,
मन्तर, जन्तर और जटिल कर्मकाण्ड के और कोई धर्म न रह गया था । ज्ञान
का सन्तोष केवल ऊपर के इने गिने लोगों के लिए था । शेष जन समुदाय
के लिए कर्मकाण्ड और अन्धविश्वास । उस समय के भारतीय साहित्य,
चीनी और अरब यात्रियों के वृत्तान्तों, सिक्कों और शिलालेखों, सबसे इसी
शोचनीय हालत का पता चलता है ।

इस्लाम और भारत ७३
चीनी यात्री फ़ाहियान के समय यानी पाँचवीं सदी में उत्तर पश्चिमी
भारत के अन्दर काबुल से मथुरा तक बौद्धमत की हीनयान सम्प्रदाय
का प्रचार अभी बाक़ी था, किन्तु शेष भारत से बौद्धधर्म मिटता जा
रहा था। दो सौ साल बाद जब प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्यूनत्साँग
भारत पहुँचा तो उसने देखा कि उत्तर में हीनयान की जगह महायान
ने ले ली थी। ह्यूनत्साँग के बयान से मालूम होता है कि ख़ासकर
शिव की पूजा उस समय समस्त भारत में ज़ोरों के साथ फैलती जा रही
थी। अयोध्या के पास उसे इस तरह के मनुष्य मिले जो हर साल दुर्गा
की मूर्ति के सामने मनुष्य की बलि चढ़ाया करते थे। बंगाल के शैव राजा
सशङ्क ने अनेक बौद्ध मन्दिरों को तोड़ कर उनमें बुद्ध की मूर्तियों की जगह
शिव की मूर्ति क़ायम करना और बौद्ध धर्म के मानने वालों को तकलीफ़ें
दे देकर अपने राज से निकालना शुरू कर दिया था। अन्य स्थानो पर नर
मुण्डों की मालाएँ पहिने कापालिकों से ह्यूनत्साँग की भेंट हुई, इत्यादि ।
ह्यूनत्साँग लिखता है कि अफ़गानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया तक उस
समय बौद्ध मत के माननेवाले और शैव मत के मानने वाले दोनों पाए जाते
थे। इसके बाद के अरब यात्रियों, मोहम्मद इब्न इसहाक़ अन्नदीम,
अल्शहरस्तानी इत्यादि की पुस्तकों से भी इन्हीं बातों का समर्थन
होता है और पता चलता है कि मुसलमानों के आने के समय तक
भारत से बौद्धमत क़रीब क़रीब लोप हो चुका था और शैवमत इत्यादि
ने उसकी जगह ले ली थी। अलबेरूनी लिखता है कि शैव और वैष्णव
सम्प्रदायों के अलावा, शक्ति, सूर्य, चन्द्र, ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, स्कन्ध, गणेश
यम और कुबेर की मूर्तियों की पूजा भी भारत में शुरू हो गई थी और इन

७२ पुस्तक प्रवेश
सब की अलग अलग सम्प्रदाएँ थीं। बौद्ध और जैन मतों ने मांस और
मदिरा का उपयोग एक बार बिलकुल बन्द कर दिया था, किन्तु कापालिकों
और शाक्तों दोनों के ज़रिये इन दोनों चीज़ों का उपयोग स्थान स्थान पर
फिर से धर्म का एक अङ्ग बन गया था। सारांश यह कि राजनैतिक, धार्मिक
और सामाजिक, तीनों दृष्टि से भारत उस समय अन्धकार और अराजकता
की हालत में था,—असंख्य छोटी बड़ी रियासतें, एक दूसरे की दुश्मन,
सैकड़ो मत मतान्तर, और अगणित सदाचार-विरुद्ध कुरीतियाँ और अन्ध
विश्वास !
भारत में इसलाम धर्म
ठीक उस समय, जब कि देश की यह हालत थी, इसलाम का भारत
में पदार्पण हुआ। हम लिख चुके हैं कि इसलाम के जन्म से पहले अरबों
की इस देश में ख़ासकर दक्खिन भारत में अनेक बस्तियाँ थीं। उस समय
के समस्त इतिहास से यह भी साबित है कि अरबों और भारतवासियों में
बड़ा प्रेम था, और अरब सौदागर इस देश के अन्दर आदर की दृष्टि से देखे
जाते थे। मुसलमानों के सैनिक हमले से बहुत पहले, ईसा की सातवीं सदी
से ही अरब सौदागरों के साथ साथ नए इसलाम धर्म ने भी दक्खिन की
ओर से भारत के अन्दर प्रवेश किया। इतिहास से पता चलता है कि इस
नए धर्म का भी भारतवासियों ने उसी प्रेम के साथ स्वागत किया, जिस
प्रेम के साथ वे सैकड़ों साल पहले से अरब सौदागरों का स्वागत करते रहे
थे। एक बार भारतवर्ष की सीमाओं के अन्दर प्रवेश करते ही इसलाम भी
भारत की असंख्य सम्प्रदायों में से एक गिना जाने लगा। इतिहास लेखक
रॉलैण्डसन लिखता है कि सातवीं सदी के अन्त में मुसलमान अरब

इस्लाम और भारत ७५
मलबार तट पर आकर बसने लगे थे। इतिहास लेखक स्टररॉक लिखता है
कि—"सातवीं सदी से लेकर ईरानी और अरब सौदागर भारत के पश्चिमी
तट पर अलग अलग बन्दरगाहों में बड़ी बड़ी तादाद में आकर बसने लगे।
ये लोग इसी देश की स्त्रियों के साथ शादियाँ कर लेते थे। इनकी बस्तियाँ
मलबार में ख़ास तौर पर बड़ी और महत्वपूर्ण थीं, क्योंकि वहाँ पर बहुत
शुरू ज़माने से मालूम होता है राज की यह एक नीति चली आती थी कि
बन्दरगाहों में व्यापारियों को हर तरह की सुविधाएँ दी जावें।"*
धीरे धीरे दक्खिन में मुसल्मानों का प्रभाव बढ़ता गया। राज की
ओर से उन्हें तिजारत करने और ज़मीन ख़रीदने के साथ साथ अपने
नए धर्म का प्रचार करने की भी पूरी सुविधाएँ दी जाने लगीं। नवीं सदी
तक ये लोग समस्त पश्चिमी तट पर फैल गए। हम लिख चुके हैं कि भारत
में उस समय बौद्ध मत और जैन मत का हिन्दू मत और उसकी
नई सम्प्रदायों के साथ संग्राम जारी था। इन अनेक नई हिन्दू सम्प्रदायों के
मुक़ाबले में, जिनका हम ऊपर ज़िक्र कर आए हैं और जिनका ज़ोर उस
समय बढ़ता जा रहा था, इस्लाम के सीधे सादे और सरल सिद्धान्तों
और उसके अन्दर मनुष्यमात्र की समता के विचार की ओर लोगों का ध्यान
ज़ोरों के साथ आकर्षित हुआ। इस्लाम के विरुद्ध पक्षपात या उसकी ओर
द्वेष का कोई सबब उस समय तक मौजूद न था। नवीं सदी के शुरू
में ही मलबार के हिन्दू राजा चेरामन पेरूमल ने, जिसकी राजधानी
कोडङ्गलूर थी, इस्लाम मत स्वीकार कर लिया।† राजा का नाम अब्दुर-

  • Sturrock: S. Kanara, Madras District Manuals; p. 180.
    † Logan: Malabar, vol. i, p. 245.

७६ पुस्तक प्रवेश
रहमान सानीनी रक्खा गया । इस्लाम मत स्वीकार करने के बाद अब्दुर-
रहमान अरब गया । चार साल बाद अरब में ही उसकी मृत्यु हुई । अरब
से उसने कई मुसलमान विद्वानों और प्रचारकों को भारत भेजा, उनकी
मारफ़त अपने उत्तराधिकारियों को शासन प्रबन्ध के लिए हिदायतें दीं,और
यह भी हिदायत दी,कि देश के अन्दर नए मत के प्रचार में अरब विद्वानों
को पूरी सहायता दी जाय । राजा चेरामन पेरूमल के उत्तराधिकारियों
ने बड़े हर्ष के साथ अरब विद्वानों का स्वागत किया और उनके आदेशानुसार
मलबार तट पर निराकार की उपासना के लिए ११ नई मसजिद बनवाईं ।
कालीकट के राजा का मुसलमान होना
कालीकट के सामुरी राजा और त्रिवानकुर के महाराजा उसी चेरामन
पेरूमल के वंशज और उत्तराधिकारी हैं । इन दोनों स्थानों पर उस १,१००
साल पहले की घटना की याद में हाल तक ( सन् १६१२ ई० ) यह रिवाज
चला आता था कि जिस समय नया सामुरी अपनी गद्दी पर बैठता था तो
मुसलमानों की तरह उसका मुण्डन किया जाता था, मुसलमानों के से उसे
कपड़े पहनाए जाते थे, एक मोपल्ला उसके सिर पर ताज रखता था,* राज-
तिलक के बाद से उसे जातिच्युत की तरह समझा जाता था, अपने घर के
लोगों के साथ भी फिर वह सहभोज नहीं कर सकता और कोई नय्यर उसे
स्पर्श नहीं करता । समझा यह जाता है कि प्रत्येक सामुरी चेरामन पेरूमल
के अरब से लौटने के इन्तज़ार में केवल उसके एक प्रतिनिधि की हैसियत से
तख़्त पर बैठता है । त्रिवानकुर के महाराजाओं को गद्दी पर बैठते समय जब
खड्ग हाथ में दी जाती है, तब आज पर्यन्त उन्हें यह कहना पड़ता है—

  • Quadir Husain Khan : South Indian Mussalmans, Madras Christian
    College Magazine ( 1912-13 ), p. 241.

इस्लाम और भारत ७७
"मैं इस खड्ग को उस समय तक रक्खूँगा, जब तक कि मेरा वह चचा,
जो मक्का गया है, लौट न आए।"*
सामुरी ने अपने राज में मुसलमानों को हर तरह की सहायता दी।
कोई नय्यर किसी नम्बूंतरी ब्राह्मण के बराबर में न बैठ सकता था, किन्तु
कोई भी मुसलमान बैठ सकता था। मुसलमानों का धर्मगुरु थङ्गल सामुरी
के साथ साथ पालकी में निकलता था। अरबों और मुसलमानों की मदद
से सामुरी ने अपने राज की सीमाओं को खूब बढ़ाया, और राज की समृद्धि
में बहुत बड़ी उन्नति हुई। वर्त्तमान कालीकट का नगर उस समय के एक
मुसलमान क़ाज़ी ही का बसाया हुआ है। मलबार के राजाओं की जल
सेना के सेनापति अधिकतर मुसलमान ही होते थे, जो 'अलीराजा' कहलाते
थे। इसलाम धर्म के प्रचार में भी सामुरी ने खूब सहायता दी। यहाँ तक
कि उसने आज्ञा दे दी कि हर हिन्दू मल्लाह के घर के कम से कम एक लड़के
को बचपन से मुसलमानों की तरह शिक्षा दी जाय। यही आजकल के
मोपलों की उत्पत्ति है। मोपला शब्द का अर्थ महापिल्ला यानी ज्येष्ठ
पुत्र है।†
मुसलमान फ़क़ीर और प्रचारक
इसी बीच समय समय पर असंख्य मुसलमान फ़क़ीर और विद्वान कुछ
समुद्र के रास्ते और कुछ अफ़गानिस्तान के रास्ते अरब और ईरान से आ
आकर भारत के अनेक भागों में बसते गए। हर जगह उनका खूब आदर
सत्कार होता था।

  • Logan : Malabar, vol. i, p. 231.
    † Innes : Malabar and Anjengo District Gazetter, p. 190.

७८ पुस्तक प्रवेश
भारत के पूर्वी तट पर भी मुसलमानों की बस्तियाँ और उनका
महत्व बढ़ता चला गया । इन बस्तियों के अलग अलग नाम, हवाले और
मुसलमानों की बढ़ती हुई तादाद को बयान करने की आवश्यकता नहीं
है । एक मुसलमान फ़क़ीर नज़द वली (Nathad Vali) के प्रभाव से
ग्यारहवीं सदी में मदुरा और त्रिचन्नपल्ली के इलाक़ों में अनेक लोगों ने
इसलाम मत स्वीकार किया । यह नज़द वली टर्की का एक शहज़ादा था,
जो फ़क़ीर हो गया था, और अरब, ईरान और उत्तर भारत से होता हुआ
त्रिचन्नपल्ली पहुँचा था, जिसे उस समय त्रिसूर कहते थे । बारहवीं सदी में
एक दूसरे फ़क़ीर सय्यद इब्राहीम शहीद के प्रभाव से अनेक लोगों ने इसलाम
मत स्वीकार किया । इसी तरह बाबा फ़ख़रुद्दीन इत्यादि अनेक अन्य इस-
लाम धर्म प्रचारकों के नाम उस समय के इतिहास में मिलते हैं । बाबा
फ़ख़रुद्दीन के प्रभाव से पेन्नुकोण्डा के हिन्दू राजा ने इसलाम मत स्वीकार
किया । यह भी साफ़ पता चलता है कि इन अरबों और मुसलमानों की
कोशिश से भारत और ख़ास कर दक्खिन भारत की तिजारत और खुशहाली
में बहुत बड़ी तरक्क़ी हुई । दक्खिन के हिन्दू राजाओं की ओर से चीन जैसे
दूर दूर के देशों में मुसलमान एलची और राजदूत भेजे जाते थे । अनेक
हिन्दू दरबारों में मुसलमान मन्त्री और प्रधान मन्त्री थे । अनेक प्रान्तों के
शासक मुसलमान नियुक्त किए जाते थे । हिन्दू राजाओं के अधीन बड़ी बड़ी
मुसलमान सेनाएँ थीं ।
इसी तरह गुजरात के वल्लभी राजा वलहार ने अपने राज के अन्दर
मुसलमानों का बड़े हर्ष और आदर के साथ स्वागत किया । काठियावाड़,
कोकण और मध्यभारत के अन्य हिन्दू राजाओं ने भी मुसलमान

इस्लाम और भारत ७३
फ़क़ीरों और प्रचारकों का बड़े प्रेम के साथ स्वागत किया और
उन्हें अपनी अपनी रियासत में इसलाम प्रचार के लिए हर तरह की
सहायता दी।
ग्यारहवीं सदी के क़रीब खम्भात में कुछ हिन्दुओं ने मुसलमानों की
एक मसजिद पर हमला करके उसे गिरा दिया। राजा सिद्धराज ने तहक़ी-
क़ात करके अपराधियों को दण्ड दिया और मुसलमानों को अपने धन से
एक नई मसजिद बनवा दी। सोमनाथ के हिन्दू राजा के अधीन मुसलमान
सेना और अनेक मुसलमान अफ़सर थे। ग्यारहवीं सदी में गुजराती बोहरों
के शिया धर्माचार्य ने यमन ( अरब) से आकर गुजरात में रहना शुरू
किया। उसी समय के निकट नूरुद्दीन ने गुजरात के कुनबियों, खेरवाओं और
काडियों को इसलाम धर्म में शामिल किया। उन असंख्य मुसलमान सन्तों
और फ़क़ीरों के नाम गिनाने की आवश्यकता नहीं है, जो आठवीं सदी से
लेकर पन्द्रहवीं सदी तक बराबर उत्तर से लेकर दखिन तक और पूरब से
लेकर पच्छिम तक भारत के विविध भागों में आकर बसते रहे और जिनके
उच्च चरित्र और इसलाम के सरल धार्मिक सिद्धान्तों के सबब उस धार्मिक
अव्यवस्था के युग में स्थान स्थान पर हज़ारों और लाखों भारतवासियों ने
इसलाम धर्म स्वीकार करना शुरू कर दिया। अभी तक यदि उत्तर भारत के
उन ग्रामों में घूमा जाय, जिनकी अधिकांश आबादी मुसलमान है, तो
दरयाफ़्त करने पर मालूम होगा कि वहाँ के लोगों के इसलाम मत स्वीकार
करने का सबब किसी न किसी समय किसी न किसी त्यागी और संयमी
मुसलमान फ़क़ीर का उनके अन्दर सहवास ही था। हमें फिर यह याद रखना
चाहिए कि यह कहानी अधिकतर उस ज़माने की है, जब कि अधिकांश

८० पुस्तक प्रवेश
भारत के ऊपर मुसलमानों का राजनैतिक प्रभुत्व या तो शुरू ही न हुआ
था और या कम से कम अभी जमने न पाया था ।
भारत में इसलाम का प्रचार
हमारा हरगिज़ यह मतलब नहीं कि मुसलमानों की राजसत्ता का इस
देश के अन्दर इसलाम के फैलने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा । निस्सन्देह हर
युग और हर देश में प्रजा के ऊपर राजा या शासकों के धार्मिक विचारों
का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक और अनिवार्य है । यदि सम्राट अशोक न होता
तो बौद्ध धर्म का भारत के एककोने से दूसरे कोने तक इस तरह फैल सकना
शायद इतना आसान न होता । इसी तरह यदि सम्राट समुद्रगुप्त और
चन्द्रगुप्त (दूसरा) वैष्णव मत के पोषक और सम्राट यशोधर्म देव ( विक्रमा-
दित्य ) शैव मत के पोषक न होते तो हिन्दू मत का बौद्ध मत को भारत से
निकाल बाहर कर सकना इतना सरल न होता । हम यह भी नहीं कहते
कि भारतवासियों से इसलाम मत के स्वीकार कराने में कहीं पर किसी
तरह की भी ज़बरदस्ती का उपयोग नहीं किया गया । दुर्भाग्यवश धार्मिक
मामलों में थोड़ी बहुत ज़बरदस्ती संसार के हर देश के इतिहास में पाई
जाती है । हिन्दू मतों के साथ बौद्ध मत और जैन मत के सङ्घर्ष के दिनों
में भी इस तरह की ज़बरदस्तियों की अनेक मिसालें भरी पड़ी हैं । किन्तु
इतिहास से बिलकुल साफ़ पता चलता है कि इस देश के अन्दर मुसल-
मानों के हमलों से बहुत पहले इसलाम मत प्रवेश कर चुका था, इसलाम
इस देश में महमूद ग़ज़नवी के हमले से भी पहले काफ़ी उन्नति कर चुका
था, और इसलाम के भारत में फैलने का ख़ास सबब उस समय के इसलाम
के प्रचारकों का त्याग, उनकी सच्चरित्रता, और इसलाम मत के वे स्पष्ट और

इसलाम और भारत ८१
सीधे सादे सिद्धान्त थे, जो कम से कम उस समय के भारत की अनेक हिन्दू
सम्प्रदायों के मुक़ाबले में मामूली जन सामान्य के लिए अधिक सरल,
हितकर और सुसाध्य थे । भारत के जिन लोगों ने उस समय इसलाम
मत स्वीकार किया, उनमें अधिकांश संख्या उन छोटी जाति के लोगों की
थी जो उस समय की भारतीय वर्ण व्यवस्था को अपने लिए अन्याय अनुभव
करते थे, और भारतवासियों की किसी संख्या का इसलाम मत स्वीकार
करना ठीक वैसा ही था जैसा उनका वैदिक मत को छोड़ कर बौद्ध मत
स्वीकार करना या बौद्ध मत को छोड़ कर वैष्णव मत या शैव मत स्वीकार
करना, या चीनियों या बरमियों का अपने अपने मतों को छोड़ कर भारतीय
बौद्ध मत को स्वीकार करना, इत्यादि ।
भारतवासियों और भारतीय नरेशों का अरब सौदागरों के साथ सुन्दर
व्यवहार, उनका अपने अपने राज में इसलाम मत को पूरी स्वतन्त्रता देना,
और उस शुरू ज़माने के भारतवर्ष में हिन्दुओं और मुसलमानों का
परस्पर प्रेम सम्बन्ध ही वह बात थी जिसके सबब ख़लीफ़ा उमर ने अरब
सेना को हिदायत की थी कि भारत पर सैनिक हमला न किया जाय, और
जिसके सबब से एशिया, अफ़रीका और यूरोप में अरब साम्राज्य के
पूरा विस्तार पा जाने के वर्षों बाद तक भी मुसलमानों की ओर से भारत
पर हमला नहीं किया गया ।
भारत की क़रीब एक चौथाई आबादी के धीरे धीरे इसलाम मत
स्वीकार करने में राजनैतिक दबाव या ज़बरदस्ती का हिस्सा कहाँ तक था, इसके
सुबूत में हम केवल दो एक इतिहास लेखकों की सम्मतियाँ नीचे देते हैं ।
भारतीय मुसलमानों का ज़िक्र करते हुए इतिहास लेखक आरनॉल्ड लिखता है—
६

८२ पुस्तक प्रवेश
"इनमें से एक बहुत बड़ा अधिकांश भाग ऐसे लोगों का है,
जिन्होंने अपनी स्वतन्त्र इच्छा से इसलाम मत स्वीकार किया।"*
एक दूसरा इतिहास लेखक टाउन्सएड लिखता है—
"इस मत के यहाँ पर फैलने का ख़ास सबब ज़बरदस्ती
नहीं है।"†
एक दूसरे स्थान पर यही लेखक भारतीय मुसलमानों के विषय में
लिखता है—
"इन तमाम मुसलमानों में से ६० फ़ीसदी में भारतीय रक्त
है, वे इस देश के वैसे ही बच्चे हैं जैसे हिन्दू। उनमें बहुत से
पुराने हिन्दू अन्धविश्वास भी अभी तक मौजूद हैं। वे केवल इस
लिए मुसलमान हैं, क्योंकि उनके पूर्वजों ने अरब के उस महा-
पुरुष का मत स्वीकार किया था।"‡
और आगे चल कर यही विद्वान लिखता है कि भारत में मुसलमानों
का राज क़ायम हो जाने के बाद भी प्रजा को ज़बरदस्ती मुसलमान करना
अधिकांश नए मुसलमान शासकों के स्वार्थ और उनकी रुचि दोनों के
विरुद्ध था। वह लिखता है—

  • "By far the majority of them entered the pale of Islam of their own
    free will."—The Preaching of Islam, by T. W. Arnold, 1913, p 255.
    † "Its spread as a faith is not due mainly to compulsion."—Asia and
    Europe, London, 1911. by M. Townsend, p. 44.
    ‡ "Ninety per cent of the whole body of the Muslims are Indians by
    blood, as much children of the soil as the Hindoos, retaining many of the
    old pagan superstitions, and only Mussalmans because their ancestors em-
    braced the faith of the Great Arabian."—Ibid, p. 43.

इस्लाम और भारत ८३
“इस्लाम का प्रचारक बलप्रयोग न कर सकता था और × ×
जिन हमला करने वालों ने यहाँ पर विजय प्राप्त की और जो
यहाँ बस गए, उन्होंने भी प्रायः कभी भी बलप्रयोग करना
नहीं चाहा । इसकी वजह भी काफ़ी थी और वह वजह यह थी
कि बलप्रयोग करने में उनका हित न था। वे राज, बादशाहतें या
साम्राज्य क़ायम करना चाहते थे; न कि अपनी ही टैक्स देने
वाली प्रजा के साथ घरेलू युद्ध छेड़ना या इस विशाल द्वीपप्राय
की युद्धप्रेमी जातियों की अदम्य शत्रुता को अपने विरुद्ध भड़का
लेना; ये जातियाँ हिन्दू थीं और हिन्दू रहीं।”*
तेरहवीं सदी के अन्त से सोलहवीं सदी के प्रारम्भ तक जब कि भारत में
अपना साम्राज्य क़ायम करने के लिए मुसलमानों के प्रयत्न जारी थे, उस
समय के विषय में सर अलफ़्रेड लॉयल लिखता है कि मुसलमान नरेश—
“आम तौर पर लड़ाई में इतने मशगूल रहते थे कि वे धर्म
प्रचार की ओर अधिक ध्यान न दे सकते थे या यह कि उन्हें
लोगों को मुसलमान बनाने की अपेक्षा उनसे टैक्स वसूल करने
की अधिक चिन्ता रहती थी।”†

  • “The missionary of Islam could not use force and . . ., as to
    the invaders who conquered and remained, they seldom or never wished to
    use it, for the sufficient reason that it was not their interest. They wanted
    to found principalities, or kingdoms, or an empire, not to wage an internecine
    war with their own taxpaying subjects or to arouse against themselves the
    unconquerable hostility of the warrior races of the gigantic peninsula, who
    were and who remain Hindoos.”—Ibid, p. 45.
    † “. . . generally too busily engaged in fighting to pay much
    regard to the interests of religion, or else thought more of the exaction of

८४ पुस्तक प्रवेश
निस्सन्देह कहीं कहीं इस तरह की मिसालें भी मिलती हैं जिनमें
राजनैतिक या अन्य बातों से प्रेरित होकर भारत के किसी किसी मुसलमान
नरेश ने इसलाम मत के प्रचार के हित में अपने अधिकारों का अनुचित
प्रयोग किया, किन्तु इसके विपरीत केवल बाबर और अकबर ही नहीं, बल्कि
अधिकांश और असंख्य अन्य मुसलमान शासकों के लेख और उनकी
आज्ञाएँ इस विषय की नक़ल की जा सकती हैं, जिनसे मालूम होता है कि
वे अपनी हिन्दू और मुसलमान प्रजा को एक दृष्टि से देखते थे और राज-
शासन में किसी तरह का धार्मिक पक्षपात अपने लिए हितकर न समझते
थे । इतिहास से यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि वर्त्तमान भारतीय मुसल-
मानों में से ८० नहीं, ९९ फ़ीसदी के इसलाम मत स्वीकार करने का सबब
केवल उस समय के असंख्य मुसलमान फ़क़ीरों, पीरों और दरवेशों की
सच्चरित्रता और इसलाम की आन्तरिक सामाजिक और अन्य विशेषताएँ थीं ।
जिज्ञासु अरब
अरबों के अन्दर नई धार्मिक लहरें
भारत के ऊपर अरब के इस नए मत का प्रभाव केवल उन लाखों या
करोड़ों भारतवासियों तक ही परिमित न था, जिन्होंने इस नए मत को
स्वीकार कर लिया । उस सामाजिक अराजकता के दिनों में, जिसका चित्र हम
tribute than of the work of conversion."—Asiatic Studies, by Sir Alfred
Lyall, London, 1882, p. 288.

जिज्ञासु अरब ८५
ऊपर खींच चुके हैं, शेष भारतवासियों के विचारों, उनके धर्म, उनके साहित्य,
उनकी चित्रकारी, उनके विज्ञान, उनकी निर्माण कला, सारांश यह कि
समस्त भारतीय सभ्यता पर इस्लाम के नए विचारों का गहरा और अमिट
प्रभाव पड़ा। किन्तु इस प्रभाव को बयान करने से पहले यह आवश्यक है
कि हम मोहम्मद साहब के बाद की अरबों के अन्दर की नई धार्मिक लहरों
और उनकी सभ्यता के अन्य पहलुओं पर भी एक नज़र डाल लें ।
इस्लाम आरम्भ से ही एक ईश्वर का मानने वाला था। उसके सिद्धान्त
अत्यन्त सरल थे और पूजा विधि अत्यन्त सुसाध्य । फिर भी मोहम्मद साहब
की मृत्यु के थोड़े दिनों बाद से ही इस्लाम के अन्दर नई नई शाखें फूटने
लगीं। जिस तरह अरब नीतिज्ञों ने पूरब और पश्चिम में अपने साम्राज्य
को बढ़ाना शुरू किया, उसी तरह अरब विद्वानों और जिज्ञासुओं ने संसार
के चारों कोनों से दर्शन, विज्ञान और अनेक विद्याओं की खोज कर अपने
भण्डार को बढ़ाना शुरू किया ।
बौद्ध और हिन्दू ग्रन्थ अरबी में
ईसाई धर्म ग्रन्थों के अरबी में अनुवाद किए गए। सुक़रात, अफ़लातून
और अरस्तू जैसों के गूढ़ दर्शनशास्त्रों, और विज्ञान, वैद्यक, ज्योतिष
इत्यादि पर यूनानी ग्रन्थों के अरबी में अनुवाद किए गए। भारत के साथ
अरबों का घनिष्ठ सम्बन्ध पहले से था ही। भारतीय माल के साथ साथ
भारतीय संस्कृति और भारतीय विद्याओं का लेन देन भी शीघ्र ही शुरू हो
गया। शुरू के ख़लीफ़ाओं के दिनों में अनेक हिन्दू बसरा में ऊँचे ऊँचे पदों
पर नियुक्त थे ।* शाम, काशगर इत्यादि में हिन्दुओं की अनेक बस्तियाँ

  • Jean Perier : Vie d'al Hadjdjadg Ibn Yusuf, p. 249-52.

८६ पुस्तक प्रवेश
थीं। खुरासान, अफ़गानिस्तान, सीसतान और बलूचिस्तान इसलाम मत
स्वीकार करने से पहले बौद्ध थे या हिन्दू। बलख़ में एक बहुत बड़ा बौद्ध
विहार था, जिसके बौद्ध मठाधीश अब्बासी ख़लीफ़ाओं के वज़ीर हुआ
करते थे।* बौद्धधर्म की सब मुख्य मुख्य पुस्तकों के अरबी में अनुवाद
किए गए। "किताबुल बुद्ध" और "बिल बहर वा बुदसिफ़" उन्हीं दिनों
की लिखी हुई अरबी भाषा में बौद्धधर्म की प्रामाणिक पुस्तकें हैं। इसी तरह
सुश्रुत, चरक, पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, चाणक्य इत्यादि अगणित संस्कृत
ग्रन्थों के अरबी में अनुवाद किए गए। विशेषकर बुद्ध के जीवन और उसके
सिद्धान्तों का अरब के मुसलमानों पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। धीरे धीरे
जिज्ञासु अरबों में तरह तरह के स्वतन्त्र विचार, नए नए दार्शनिक, और
नई नई सम्प्रदाएँ पैदा होनी शुरू हुईं। इसी परिस्थिति के अन्दर इसलाम
में अद्वैतवाद और सुप्रसिद्ध सूफ़ी विचारों का जन्म हुआ।
इसलाम में अद्वैतवाद
उन्हीं दिनों शिया मुसलमानों की 'गुलात' सम्प्रदाय के आचार्यों ने
अवतारवाद (हुलूल, तशबीह), आवागमन (तनास्रुख़) इत्यादि को
अपने सिद्धान्तों में स्थान दिया और यह प्रतिपादन किया कि मनुष्य की
आत्मा भी बढ़ते बढ़ते ख़ुदा के रुतबे तक पहुँच सकती है। 'अली इलाही'
सम्प्रदाय के लोगों ने एक से अधिक स्त्री के साथ विवाह और तलाक़ की
प्रथा दोनों को नाजायज़ क़रार दिया। मसजिद में जाना और शारीरिक
'शरई' पवित्रता को भी उन्होंने अनावश्यक बताया। अनेक सम्प्रदायों ने
क़ुरान के ज़ाहिरा अर्थों को न मान कर उसे अलङ्कार के रूप में मानना शुरू

  • Nicholson : A Literary History of the Arabs, p. 259