भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस्लाम और भारत ७१
अरब सागर तक क़रीब क़रीब सारा देश राजपूतों के शासन में आगया ।
कोई प्रधान केन्द्रीय शक्ति इन सब छोटी बड़ी रियासतों को वश में रखने
वाली न थी, और आए दिन इन तमाम रियासतों के बीच अपना अपना
राज बढ़ाने के लिए एक दूसरे से संग्राम होते रहते थे । यानी एक प्रधान
और प्रबल भारतीय साम्राज्य की जगह एक दूसरे की प्रतिस्पर्धी और एक
दूसरे से स्वतन्त्र अनेक छोटे बड़े राजा भारत पर शासन करते थे, और
राजनैतिक या राष्ट्रीय एकता केवल स्वप्नमात्र थी। पुराने साम्राज्यों के केन्द्र
मगध, पाटलीपुत्र, गया इत्यादि खण्डहर दिखाई दे रहे थे। वैशाली,
कुशीनगर, केड़िया, रामग्राम, कपिलवस्तु और श्रावस्ती, जिनके नाम बौद्ध
इतिहास में मशहूर हो चुके थे, अब बरबाद दिखाई देते थे और देश के
राजनैतिक और आर्थिक जीवन के दूसरे केन्द्रों ने उनकी जगह ले ली थी ।
धर्म के क्षेत्र में भी भारत का वह समय एक बहुत बड़े परिवर्तन और
अवनति का समय था । बुद्ध की मृत्यु से ढाई सौ साल के अन्दर, यानी
हज़रत ईसा के जन्म से क़रीब ढाई सौ साल पहले, उस समय के बिगड़े
हुए हिन्दू धर्म को भारत से निकाल कर बौद्ध धर्म उसका स्थान ले चुका
था । किन्तु जिन ब्राह्मण पुरोहितों और उच्च जातियों के विशेषाधिकारों पर
बौद्ध धर्म ने हमला किया था उनकी ओर से विद्रोह की आग बराबर
सुलगती रही । धीरे धीरे प्रतिमापूजा ने और अन्य प्राचीन हिन्दू कर्मकाण्ड
ने बौद्ध धर्म में भी प्रवेश करना शुरू किया। उत्तर भारत में महायान
सम्प्रदाय की नींव रक्खी गई, जिसमें बुद्ध भगवान के अलावा अनेक
बोधिसत्वों की और ख़ासकर 'अमिताभ' की पूजा होने लगी। बौद्ध मन्दिरों
का समस्त कर्मकाण्ड हिन्दू मन्दिरों के ढङ्ग पर ढल गया । शुरू के बौद्ध मत