भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस्लाम और भारत ७३
चीनी यात्री फ़ाहियान के समय यानी पाँचवीं सदी में उत्तर पश्चिमी
भारत के अन्दर काबुल से मथुरा तक बौद्धमत की हीनयान सम्प्रदाय
का प्रचार अभी बाक़ी था, किन्तु शेष भारत से बौद्धधर्म मिटता जा
रहा था। दो सौ साल बाद जब प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्यूनत्साँग
भारत पहुँचा तो उसने देखा कि उत्तर में हीनयान की जगह महायान
ने ले ली थी। ह्यूनत्साँग के बयान से मालूम होता है कि ख़ासकर
शिव की पूजा उस समय समस्त भारत में ज़ोरों के साथ फैलती जा रही
थी। अयोध्या के पास उसे इस तरह के मनुष्य मिले जो हर साल दुर्गा
की मूर्ति के सामने मनुष्य की बलि चढ़ाया करते थे। बंगाल के शैव राजा
सशङ्क ने अनेक बौद्ध मन्दिरों को तोड़ कर उनमें बुद्ध की मूर्तियों की जगह
शिव की मूर्ति क़ायम करना और बौद्ध धर्म के मानने वालों को तकलीफ़ें
दे देकर अपने राज से निकालना शुरू कर दिया था। अन्य स्थानो पर नर
मुण्डों की मालाएँ पहिने कापालिकों से ह्यूनत्साँग की भेंट हुई, इत्यादि ।
ह्यूनत्साँग लिखता है कि अफ़गानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया तक उस
समय बौद्ध मत के माननेवाले और शैव मत के मानने वाले दोनों पाए जाते
थे। इसके बाद के अरब यात्रियों, मोहम्मद इब्न इसहाक़ अन्नदीम,
अल्शहरस्तानी इत्यादि की पुस्तकों से भी इन्हीं बातों का समर्थन
होता है और पता चलता है कि मुसलमानों के आने के समय तक
भारत से बौद्धमत क़रीब क़रीब लोप हो चुका था और शैवमत इत्यादि
ने उसकी जगह ले ली थी। अलबेरूनी लिखता है कि शैव और वैष्णव
सम्प्रदायों के अलावा, शक्ति, सूर्य, चन्द्र, ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, स्कन्ध, गणेश
यम और कुबेर की मूर्तियों की पूजा भी भारत में शुरू हो गई थी और इन