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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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इस्लाम और भारत ६६
( ४ ) हमें यह याद रखना चाहिए कि इसके बाद महमूद ग़ज़नवी के
समय तक यानी तीन सौ साल तक फिर न कोई और हमला मुसलमानों
का भारत पर हुआ और न सिन्ध या मुलतान से आगे उनका राज बढ़ा ।
प्राचीन अरब और भारत का सम्बन्ध
अब हम उस समय के अरबों और भारतवासियों के परस्पर सम्बन्ध
को थोड़े विस्तार के साथ बयान कर देना चाहते हैं । अरबों और भारत-
वासियों का सम्बन्ध अरबों के मुसलमान होने से बहुत पहले से यानी
हज़रत मोहम्मद के जन्म से कम से कम पाँच सौ साल पहले से चला
आता था । हज़रत ईसा के जन्म के समय से ही सैकड़ों बल्कि हज़ारों
अरब सौदागर भारत के पश्चिमी और पूर्वी बन्दरगाहों पर आकर उतरते
थे। ख़ासकर पच्छिम में चाल, कल्याण, सुपारा, और मलबार तट पर
अरबों की अनेक बड़ी बड़ी बस्तियों का उस समय के इतिहास में ज़िक्र
आता है । हज़रत ईसा के जन्म से पहले ही लंका और दक्खिन भारत में अरबों
और ईरानियों की अनेक बस्तियाँ मौजूद थीं । ईरान, अरब, अफ़रीका और
यूरोप के विविध देशों के साथ भारत का उस समय जितना व्यापार था,
अधिकतर अरब और ईरानी सौदागरों ही के हाथों में था । रोमन इतिहास
लेखक लिखते हैं कि रोम और यूनान के जो जहाज़ उन दिनों भारत आते
जाते थे उनके भी नाविक अधिकतर अरब ही होते थे । भारत और चीन के
बीच की तिजारत का भी एक ख़ासा हिस्सा अरबों ही के हाथों में था,
जिसके सबब भारत के पूर्वी तट से भी ये लोग पूरी तरह परिचित थे, और
वहाँ भी स्थान स्थान पर इनकी अनेक बस्तियाँ आबाद थीं ।
उस समय के अरबों का मज़हब एक प्राचीन ढङ्ग का सीधा सा मज़हब