भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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लॉर्ड कॉर्नवालिस ३८३
उस समय एक मोटी क़िस्म के कपड़े को कहते थे जो ख़ेमे बनाने
के काम में आता था।
अगले साल यानी सन् १७६३ ईसवी में कॉर्नवालिस ने
फ़्रांसीसियों के तमाम भारतीय इलाक़ों पर हमला करके उन्हें
अंगरेज़ कम्पनी के अधीन कर लिया।
इसके बाद भारत के अन्य नरेशों के साथ कॉर्नवालिस के
कॉर्नवालिस और व्यवहार को बयान करना बाक़ी है। दिल्ली का
दिल्ली सम्राट सम्राट अभी तक कहने के लिए समस्त भारत
का अधिराज था। अंगरेज़ क़ायदे के अनुसार
उसकी प्रजा थे। वारन हेस्टिंग्स के समय तक बंगाल, बिहार और
उड़ीसा की दीवानी के लिए वे दिल्ली दरबार को सालाना खिराज
भेजा करते थे। हेस्टिंग्स ने माधोराव सींधिया के साथ मिलकर
दिल्ली सम्राट को मराठों के हवाले करवा दिया, और कलकत्ते से
दिल्ली खिराज जाना रुक गया। उसके बाद सर जॉन मैकफ़रसन
केवल अस्थायी गवर्नर जनरल था। इस दरमियान दिल्ली से
खिराज की माँग बराबर आती रही। कॉर्नवालिस के समय में
सम्राट की ओर से फिर माँग आई। कॉर्नवालिस ने अब सदा के
लिए खिराज देने से इनकार कर दिया। इसलिए नहीं कि दिल्ली
सम्राट ने इस बीच अंगरेज़ों का कोई अहित किया हो, बल्कि केवल
इसलिए क्योंकि दिल्ली का सम्राट अब काफ़ी बलहीन हो चुका था
और अंगरेज़ अपना बल काफ़ी बढ़ा चुके थे। सम्राट दरबार में
इतनी हिम्मत न थी कि सेना भेजकर कलकत्ते से खिराज वसूल
३८४ भारत में अंगरेज़ी राज
कर सके। इस तरह बङ्गाल, बिहार और उड़ीसा के प्रान्त अब
साफ़ साफ़ दिल्ली साम्राज्य से कटकर अंगरेज़ कम्पनी के स्वायत्त
शासन में आ गए ।
अवध के नवाब के साथ भी कॉर्नवालिस का सलूक इसी
तरह का था। कम्पनी की एक विशाल सेना
[पार्श्व टिप्पणी: कॉर्नवालिस और नवाब अवध] जिसके सब अफ़सर अंगरेज़ थे, ज़बरदस्ती
अवध के ऊपर मढ़ दी गई थी। नवाब को
उसका ख़र्च देना पड़ता था। वारन हेस्टिंग्स ने नवाब से वादा
किया था कि भविष्य में जब ज़रूरत न रहेगी तो यह सेना अवध
से वापस बुला ली जायगी। नवाब ने अब उस वादे को पूरा करने
के लिए कॉर्नवालिस से प्रार्थना की। किन्तु इतिहास लेखक मिल
लिखता है :—
"गोकि उस समय अवध के सामने कोई ख़ास ख़तरा न था, और
जितने रुपए नवाब से कम्पनी को लेने का हक़ था उससे ज़्यादा फ़तहगढ़
की इस सेना पर नवाब का ख़र्च होता था, फिर भी कॉर्नवालिस अपने इस
निश्चय पर क़ायम रहा कि सेना फ़तहगढ़ से न हटाई जावे।"*
इस प्रकार ब्रिटिश साम्राज्य पिपासा को भविष्य में शान्त
करने के वास्तविक उद्देश से पचास लाख रुपए सालाना से ऊपर
का दण्ड ज़बरदस्ती कम्पनी के मित्र अवध के नवाब से वसूल
किया जाता रहा।
- Mill, vol. V. p. 222.
लॉर्ड कॉर्नवालिस ३८५
कम्पनी के दूसरे मित्र निज़ाम के साथ कॉर्नवालिस का सलूक
इससे बेहतर न था। इंगलिस्तान से चलते
कॉर्नवालिस और समय डाइरेक्टरों ने उसे हिदायत कर दी थी
निज़ाम कि 'गुण्टूर का इलाक़ा' किसी तरह निज़ाम से
ले लिया जाय। कॉर्नवालिस जानता था कि यदि मैसूर युद्ध से
पहले निज़ाम पर यह बात ज़ाहिर हो गई तो निज़ाम के टीपू से
मिल जाने का डर है। वह मौक़े की ताक में रहा। युद्ध के बाद
जब उसने निज़ाम को निर्बल पाया तो अपने एक अफ़सर कप्तान
केन्नावे को इस काम के लिए निज़ाम के दरबार में भेजा। इतिहास
लेखक मिल लिखता है :—
“तय हो गया था कि जब तक कप्तान केन्नावे दरबार में पहुँच न जावे
तब तक निज़ाम को यह ख़बर न होने पावे कि उससे गुण्टूर माँगे जाने की
तजवीज़ की जा रही है x x x मद्रास की गवरमेण्ट ने इधर उधर के बहाने
लेकर एक सेना गुण्टूर के आस पास पहुँचा दी, और इससे पहले कि कोई
दूसरी शक्ति लड़ने के लिए या एतराज़ करने के लिए पहुँच सके, खुद उस
इलाक़े पर क़ब्ज़ा करने की तैयारी कर ली।”*
निज़ाम पहले ही कायर और कमज़ोर था। युद्ध की ज़रूरत
- "No intimation was to be given to the Nizam of the proposed
demand, till after the arrival of Captain Kennaway at his Court . . . .
the Government of Madras, under spacious pretences, conveyed a body of
troops to the neighbourhood of the Sircar; and held themselves in readiness
to seize the territory before any other power could interpose, either with
arms or remonstrance."—Mill, vol. v, p. 225.
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३८६ भारत में अंगरेज़ी राज
भी न पड़ी और गुण्टूर का इलाक़ा कम्पनी के हाथों में आ गया ।
कहा जाता है कि किसी डाकू की माँ ने सिकन्दर के सामने
विजेताओं और डाकुओं की परस्पर समानता दर्शाई थी। निस्संदेह
उसे इससे बढ़कर मिसाल न मिल सकती ।
अन्त में लॉर्ड कॉर्नवालिस के शासनकाल की और कुछ
कम्पनी के मुलाज़िमों काररवाइयों और उसके 'शासन सुधारों' पर
की नियुक्ति नज़र डालना ज़रूरी है। सब से पहले उसके
समय के कम्पनी के नौकरों की नियुक्ति का
ढङ्ग । इतिहास में दर्ज है कि उस समय के इंग्लिस्तान के युवराज
(प्रिन्स ऑफ़ वेल्स) ने अनेक बार अपने अनेक मित्रों या आश्रितों
की भारत की ख़ास ख़ास नौकरियों के लिए सिफ़ारिश की और
कॉर्नवालिस बराबर युवराज की इच्छा को पूरा करता रहा। एक
बार युवराज ने कॉर्नवालिस को लिखा कि आप "एलीकान नामक
एक काले" को बनारस की फ़ौजदारी की चीफ़ जजी से हटा कर
पैल्लेग्राइन ट्रीव्ज़ नामक एक अंगरेज़ को उसकी जगह नियुक्त कर
दें। पैल्लेग्राइन ट्रीव्ज़ इंग्लिस्तान के एक बदनाम महाजन का बेटा
था और युवराज को उस महाजन का कुछ क़र्ज़ा अदा करना था ।
कॉर्नवालिस इस बार युवराज की इच्छा पूरी न कर सका। उसने
युवराज को लिखा कि अली इब्राहीम ख़ाँ (जिसे युवराज ने 'काला
एलीकान' लिखा था) गोकि हिन्दोस्तानी है फिर भी "भारत के
सब से अधिक योग्य और सब से अधिक सम्मानित सरकारी
अफ़सरों में से है।" जब कि ट्रीव्ज़ नौजवान और बिलकुल नातजरु
बेकार है; और एक इतने ज़िम्मेवारी के ओहदे पर उसे नियुक्त करना
केवल मज़ाक़ उड़वाना होगा, इत्यादि ।
कॉर्नवालिस ने भारत आकर देखा कि उस समय ऊँचे ऊँचे
ओहदों पर कम्पनी के ज़्यादातर यूरोपियन नौकर अयोग्य और
रिश्वतख़ोर थे। कॉर्नवालिस ने इसे महसूस किया और इसके दो
इलाज किए। एक यह कि उसने नियम कर दिया कि आइन्दा
सिवाय छोटी से छोटी नौकरियों के कम्पनी के इलाक़े में कोई बड़ी
नौकरी किसी हिन्दोस्तानी को न दी जाय। दूसरे उसने कम्पनी के
यूरोपियन मुलाज़िमों की तनख़्वाहें बढ़ा दीं।
अत्यन्त प्राचीन काल से भारत की ८६ फ़ीसदी जन संख्या
[हाशिया: भारत की ग्राम] ग्रामों में रहती रही है। हर गाँव में सदा से एक
[हाशिया: पंचायतें] ग्राम पंचायत होती थी। इतिहास लेखक टॉरेन्स
के शब्दों में “भारतवासियों का सारा सामाजिक,
औद्योगिक और राजनैतिक जीवन इन्हीं ग्रामों और ग्राम पंचायतों के
आधार पर क़ायम था और इन्हीं का बना हुआ था।”* इन ग्राम
पञ्चायतों के सङ्गठन और उनके कार्यों के विषय में हम उस समय
के केवल एक दो अंगरेज़ इतिहास लेखकों की गवाही पेश करते हैं।
टॉरेन्स लिखता है :—
“उस प्राचीन काल से लेकर, जिसकी कि कोई याद तक बाक़ी नहीं रही,
हर गाँव के बड़े बूढ़ों की एक पञ्चायत गाँव पर शासन करती रही है, गाँव के
- “... the village Community was, as it is still, the unit of
social, industrial and political existence.”—Torrens' Empire in Asia, p. 100.
३८८ भारत में अंगरेज़ी राज
पंचायती कामों को चलाती रही है और गाँव भर के हितों की रक्षा करती रही
है। पञ्चों की तादाद् पहले पाँच हुआ करती थी, अब अक्सर पाँच से अधिक
होती है। किन्तु पञ्चों में सदा सब बिरादरियों के चुने हुए लोग शामिल रहे
हैं। जब कभी कोई झगड़ा होता है पञ्च ही प्राचीन मर्यादा के अनुसार उसका
फ़ैसला करते हैं, और जब कभी कोई नए ढङ्ग का प्रश्न आ खड़ा होता है
तो पञ्च ही नए नियम बनाकर आइन्दा के लिए मर्यादा क़ायम करते हैं।"*
सर जॉन मैलकम लिखता है :—
"भारत की म्युनिसिपल और ग्राम पंचायतों को छोटे बड़े तमाम लोगों
ने मिल कर जो अधिकार दे रक्खे थे उनके बल पर ये पंचायतें अपने अपने
दायरे के अन्दर पूरी तरह शान्ति और व्यवस्था क़ायम रख सकती थीं। मध्य
भारत में अन्यायी शासकों ने भी कभी इन पंचायतों के स्वत्वों और उनके
अधिकारों पर हमला नहीं किया, जब कि तमाम न्यायशील नरेशों की कीर्ति
और सर्वप्रियता का ख़ास सबब यही होता था कि वे इन पंचायतों का पूरा
ख़याल रखते थे।"†
- "Time out of mind, the village and its common interests and affairs
have been ruled over by a council of elders, anciently five in number, now
frequently more numerous, but always representative in character, who,
-when any dispute arises, declare what is the customary law, and who, when
any new or unprecedented case occurs, occasionally legislate,"—Ibid p. 101.
† "The Municipal and village institutions of India were competent,
from the power given them by the common assent of all ranks, to maintain
order and peace within their respective circles. In Central India, their rights
and privileges never were contested even by tyrants, while all just princes
founded their chief reputation and claim to popularity on attention to them."
alcolm vol. i. Chap. xii. Ibid, p. 101.
लॉर्ड कॉर्नवालिस ३८६
सर टामस मनरो, जो हिन्दोस्तान के दूसरे हिस्सों से भी
अच्छी तरह परिचित था, लिखता है :—
“हिन्दोस्तान के हर गाँव में एक बाक़ायदा पंचायत ( म्युनिसिपैल्टी )
होती थी, जो गाँव की मालगुज़ारी और पुलिस दोनों का इन्तज़ाम करती थी
और जो बहुत बड़े दरजे तक, मुजरिमों को सज़ा देने और मुक़दमों के फ़ैसला
करने का भी काम करती थी ।”*
सर टॉमस मनरो ने बड़े विस्तार के साथ बयान किया है कि
इन सुसङ्गठित ग्राम पञ्चायतों में कौन कौन कर्मचारी होते थे, उनके
क्या क्या अधिकार और क्या क्या कर्त्तव्य होते थे, गाँव की
मालगुज़ारी वसूल करने वाले ( कलक्टर ) और गाँव में अमन
श्रामान क़ायम रखने वाले ( मैजिस्ट्रेट ) दो अलग अलग अफ़सर
एक दूसरे से बिल्कुल स्वतन्त्र होते थे । ग्राम निवासियों के जान
माल की रक्षा के लिए हर पञ्चायत के अधीन 'तहारों' (?) यानी
काँस्टेबलों का एक दल होता था, इत्यादि ।
टॉरेन्स लिखता है कि भारत की इन ग्राम पंचायतों में सबसे
विचित्र व्यवस्था जूरियों की थी। दीवानी और फ़ौजदारी हर
मुक़दमे के लिए अलग अलग जूरी या अस्थाई पञ्च चुने जाते थे।
इनका फ़ैसला सबके लिए मान्य होता था। इन्हें जनता चुनती
थी। उच्च से उच्च चरित्र, साहस और त्याग वाले मनुष्य इन
- "In all Indian villages there was a regularly constituted municipality,
by which its affairs, both of revenue and police, were administered, and
which exercised, to a very great extent, Magisterial and Judicial authority."
—Sir Thomas Munro, Ibid, p. 101.
३६० भारत में अंग्रेज़ी राज
के मुखिया चुने जाते थे। मैलकम लिखता है कि ये मुखिया
आम तौर पर ऐसे लोग होते थे जो हर न्यायशील नरेश की
सहायता करते थे और हर अन्यायी नरेश का साहस के साथ
विरोध करते थे और गाँव के जीवन की अन्याय से रक्षा
करते थे। हर श्रेणी और हर बिरादरी के लोगों में से ये पञ्च
चुने जाते थे। मुद्दई और मुद्दालै दोनों को इनके चुनाव पर
एतराज़ करने का हक़ होता था। ये पञ्चायतें ही अत्यन्त प्राचीन
समय से लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आने के समय तक
भारतीय न्याय पद्धति के रग पट्ठे थीं। भारतवासियों के चरित्र पर
इनका प्रभाव बड़ा गहरा पड़ता था। मैलकम लिखता है कि—
“यदि कभी किसी आपत्ति के समय कोई मनुष्य अपना घर या
खेत छोड़ कर कहीं चला जाता था तो वह या उसकी औलाद जब
चाहे अपने झोपड़े या अपने खेत पर फिर से आकर क़ब्ज़ा कर
लेती थी, न किसी दीवार के लिए कोई झगड़ा होता था और न
किसी खेत के लिए मुक़दमेबाज़ी।।”* हर किसान अपनी ज़मीन का
पूरा मालिक समझा जाता था। मनरो लिखता है कि उस समय के
भारतवासी “सरल, निष्पाप और ईमानदार होते थे और इतने सच्चे
थे जितने संसार के किसी भी दूसरे देश के लोग हो सकते थे।”†
* "Every wall of a house, every field, was taken possession of by the
owner or cultivator without dispute or litigation."--Malcolm, vol. ii,
Chap. i Ibid., p. 100.
† "Simple, harmless, honest and having as much truth in them as any
people in the world."--Munro, vol. i, p. 280. Ibid, p. 100.
लॉर्ड कॉर्नवालिस ३६१
इन हज़ारों बरसों की ग्राम पंचायतों पर सबसे पहला हमला
[हाशिया: ग्राम पंचायतों का] उस समय हुआ जब कि बंगाल के अन्दर मीर
[हाशिया: नाश] जाफ़र और मीर क़ासिम के शासन काल में
ईस्ट इंडिया कम्पनी की भयंकर तिजारती तथा
कारबारी लूट और अनेक मौक़ों पर बेपरदा और खुली लूट का
दौर शुरू हुआ। दूसरा बाक़ायदा हमला भारत की ग्राम पंचायतों
पर सन् १७७३ में हुआ जबकि वारन हेस्टिंग्स के शासन काल में
इंग्लिस्तान के अन्दर 'रेगुलेशन ऐक्ट' नाम का क़ानून पास हुआ,
जिसके अनुसार वारन हेस्टिंग्स के मशहूर दोस्त सर एलाइज़ाह
इम्पे के अधीन कलकत्ते में पहली अंग्रेज़ी हाईकोर्ट क़ायम हुई।
उस समय से ही, टॉरेन्स लिखता है :—
"इससे पहले के तमाम राजकुलों के परिवर्तनों में मुसलमान या मराठे
सब भारतीय नरेश जिन (म्यूनिसिपल) पंचायतों का पूरा पूरा लिहाज़ रखते
थे और जिन्हें उन लोगों ने निस्सन्देह बिलकुल ज्यों का त्यों क़ायम रखा था,
अब नए विदेशी शासकों ने उन प्राचीन पंचायतों का पूरी तरह निरादर
किया और उनमें से अधिकांश को निर्दयता के साथ उखाड़ कर फेंक दिया।
देशी पंचों की अदालत की जगह अब एक स्वेच्छाचारी विदेशी जज बैठा
दिया गया।"*
- "Yet these Municipal institutions, which confessedly had been
scrupulously respected in all former changes of dynasty, whether Moham-
madan or Maratha, were henceforth to be disregarded, and many of them
to be rudely uprooted by the new system of foreign administration. Instead
of the native Panchayat, there was established an arbitrary judge."-- Ibid,
p. 102, 103.
३६२ भारत में अंगरेज़ी राज
आगे चल कर टॉरेन्स लिखता है :—
“कोई भी समझदार और न्यायशील इतिहास लेखक इन कामों पर
बिना आश्चर्य प्रकट किए और उन्हें निन्दनीय ठहराए उनका उल्लेख नहीं
कर सकता ।”*
कॉर्नवालिस ने देश भर में नई अंगरेज़ी अदालतें क़ायम करके
नई अंगरेज़ी इन भारतीय ग्राम पंचायतों के रहे सहे चिन्हों
अदालतें का अब सदा के लिए अन्त कर दिया ।
कॉर्नवालिस की इन करतूतों को 'शासन सुधारों'
का नाम दिया जाता है। इतिहास लेखक मिल ने बड़ी योग्यता
और विस्तार के साथ दर्शाया है कि किस प्रकार कॉर्नवालिस के
इन 'शासन सुधारों' (?) ने—“भारत की प्राचीन ग्राम पंचायतों
का सत्यानाश कर दिया, नई अंगरेज़ी कचहरियों की तमाम
कार्रवाइयों को जान बूझ कर लम्बा और पेचीदा बना दिया,
वकीलों को जन्म दिया और इस तरह के क़ानून बना दिए कि
बिना वकील की मदद के किसी मुक़दमे का चल सकना क़रीब
क़रीब नामुमकिन हो गया, ग़रीबों के लिए न्याय प्राप्त कर सकना
नामुमकिन कर दिया, सरकार के लिए एक तरह के नियम और
मामूली प्रजा के लिए दूसरी तरह के नियम रख कर सरकार के लिए
अपनी मालगुज़ारी वसूल कर सकना सस्ता और आसान कर
दिया, इंगलिस्तान के हज़ारों निकम्मे लड़कों की जीविका का
- “ No wise or just historian will note these things without expressions
of wonder and condemnation.”— Ibid p 103.
लार्ड कॉर्नवालिस ३६३
सुन्दर प्रबन्ध कर दिया और भारतवासियों में मुक़द्दमेबाज़ी,
जालसाज़ी, दरोग़हलफ़ी, रिश्वत सितानी, फूट और बरबादी के
फैलने के लिए मैदान साफ़ कर दिया ।”*
इन सब सुधारों (?) और उनके नतीजों को यहाँ और अधिक
विस्तार के साथ बयान करना व्यर्थ है। निस्सन्देह भारतवासियों
के चरित्र पर इनका असर सब से अधिक नाशकर हुआ।
सुप्रसिद्ध अंगरेज़ विद्वान एस० लौब लिखता है :—
“हमारी न्याय पद्धति कितनी ज़लील है ! वकालत
[हाशिया: वकालत की नई] की जिस यूरोपीय प्रथा को हम इस देश में प्रचलित
[हाशिया: प्रथा] करने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं, क्या उससे अधिक
सदाचार से बिलकुल गिरी हुई किसी दूसरी प्रथा का अनुमान भी किया जा
सकता है ! × × × क्या हमारी अदालतें रिश्वत देने के अड्डे नहीं हैं ? और
क्या मुक़द्दमेबाज़ी का शौक़ क़ौम के दिमाग़ पर लगनी बीमारी की तरह असर
करके उसे पूरी तरह सदाचार भ्रष्ट नहीं कर रहा है ? जहाँ तक हो सके वहाँ
तक लोगों को अपने मुक़दमें आपस ही में तय करने का मौक़ा क्यों न
दिया जाय ?”†
- Mill, vol. v, p. 355, etc.
† "Look at our miserable legal system. Can anything be conceived
more thoroughly immoral than the system of Western Advocacy which we
are doing our best to introduce into this country? . . . are not our
law-courts hot-beds of corruption, and is not the love of litigation con-
taminating and thoroughly perverting the national mind? Why not let the
people settle their own disputes as far as possible?"—S. Lobb, the famous
English Positivist.
३६४ भारत में अंगरेज़ी राज
किन्तु कॉर्नवालिस खूब समझता था कि किसी भी परतन्त्र
देश में पराजित क़ौम के चरित्र भ्रष्ट कर देने और उसे चरित्र भ्रष्ट
रखने में ही विदेशी शासकों का सब से अधिक बल है।
लॉर्ड कॉर्नवालिस के शासन काल की सब से अधिक महत्व की
इस्तमरारी घटना बंगाल का इस्तमरारी बन्दोबस्त बताई
बन्दोबस्त जाती है। असली बात यह थी कि जिस समय
कम्पनी ने तीनों प्रान्तों की दीवानी दिल्ली सम्राट
सं प्राप्त की और धीरे धीरे उन प्रान्तों पर अपना शासन जमाना
शुरू किया उस समय से उन्होंने हर जगह नया बन्दोबस्त करके
सरकारी लगान बेहद बढ़ा दिया, जिसका ज़िक्र एक पिछले
अध्याय में किया जा चुका है। एडमंड बर्क लिखता है कि लगान
बेहद बढ़ा दिए जाने की वजह से ही सारा "देश वीरान दिखाई
देने लगा।"* इस लगान बढ़ाए जाने ही का एक नतीजा बंगाल
भर के अन्दर सन् १७७० का वह भयंकर दुष्काल था जिसके
समान आपत्ति देश पर पहले कभी न आई थी और जिसमें लाखों
गाँव उजड़ गए।
जिस समय कॉर्नवालिस बंगाल पहुँचा, कम्पनी का ख़ज़ाना
ख़ाली पड़ा था, अच्छी से अच्छी ज़मीन बिना जोती बोई और
वीरान पड़ी हुई थी और अधिकांश ज़मींदारों के ज़िम्मे कई कई
साल का लगान बाक़ी चला आ रहा था जिसे चुका सकना उनकी
शक्ति सं बिल्कुल बाहर था। इस शोचनीय अवस्था में कम्पनी को
- "The country has turned into a desert." Edmund Burke.
लॉर्ड कॉर्नवालिस ३६५
दिवाले से बचाने का केवल एक ही उपाय हो सकता था। वह यह
था कि नए सिरे से बन्दोबस्त करके सदा के लिए एक मुनासिब
लगान तय कर दिया जाय। कॉर्नवालिस से दस साल पहले कुछ
अंगरेज़ अफ़सर यह सलाह दे चुके थे और कम्पनी के डाइरेक्टरों
ने कॉर्नवालिस को भारत भेजते समय उसे इस्तमरारी बन्दोबस्त
करने की हिदायत कर दी थी।
इस इस्तमरारी बन्दोबस्त के साथ साथ कॉर्नवालिस ने यह
क़ानून भी पास कर दिया कि जिन जिन ज़मींदारों के ज़िम्मे लगान
बाक़ी है उनकी ज़मींदारियाँ फ़ौरन नीलाम कर दी जावें और ज्योंही
आइन्दा किसी के ज़िम्मे बकाया निकले, त्योंही उसकी ज़मीन
नीलाम कर दी जाय और ऐसे मौक़ों पर बड़ी बड़ी ज़मींदारियों के
टुकड़े करके उन्हें अलग अलग नीलाम किया जाय।
एक अंगरेज़ लेखक लिखता है कि कॉर्नवालिस के इस्तमरारी
बन्दोबस्त के दस साल के अन्दर बंगाल भर की तमाम ज़मींदारियों
की शक्लें और उनके मालिक सब बदल गए। इस प्रकार कॉर्नवालिस
ने इस्तमरारी बन्दोबस्त के बहाने बंगाल के हज़ारों पुराने घरानों
और तमाम बड़ी बड़ी ज़मींदारियों का ख़ात्मा कर दिया और
उसकी जगह नए छोटे छोटे निर्बल और ख़ुशामदी ज़मींदार पैदा
कर दिए।*
* Memorandum on the Revenue Administration of the Lower Provinces
of Bengal, by J. Macneile, p. 9.
३४६ भारत में अंगरेज़ी राज
कार्नवालिस के समय में हिन्दोस्तान का केवल थोड़ा सा
देश की दशा हिस्सा कम्पनी के अधीन था और बाक़ी बहुत
बड़ा हिस्सा मराठों, टीपू, निज़ाम और नवाब
अवध के शासन में था, किन्तु दोनों हिस्सों की तुलना अत्यन्त
शिक्षाप्रद थी। ब्रिटिश भारत चारों ओर उजाड़, दरिद्र और
वीरान नज़र आता था और देशी भारत इधर से उधर तक हरा
भरा, खुशहाल और आबाद दिखाई देता था। देशी भारत के
अन्दर की आपसी लड़ाइयाँ भी प्रजा की खुशहाली के लिए
उतनी घातक न होती थीं जितनी ब्रिटिश भारत का लगातार
कुशासन और आए दिन की जायज़ और नाजायज़ लूट । प्रजा के
जान माल की उस समय के ब्रिटिश भारत में कोई भी क़द्र या
हिफ़ाज़त न थी। इस कथन के समर्थन में उस समय के अनेक देशी
और विदेशी लेखकों की गवाही पेश की जा सकती है। हम यहाँ
पर केवल कम्पनी की एक सरकारी रिपोर्ट से एक वाक्य नक़ल
करते हैं। सन् १८१२ की पाँचवीं सरकारी रिपोर्ट में लिखा है—
"राजशाही में डकैती खूब फैली हुई है। × × × फिर भी लोगों की
हालत की ओर काफ़ी ध्यान नहीं दिया जाता। इस बात से इनकार नहीं
किया जा सकता कि वास्तव में लोगों की जान और माल की कोई हिफ़ाज़त
नहीं की जाती। बंगाल के अधिकांश ज़िलों की यही हालत है।""*
- "That dacoity is very prevalent in Raj Shaye. . . . . Yet the
situation of the people is not sufficiently attended to. It can not be denied,
that, in point of fact, there is no protection for persons or property. Such
लॉर्ड कॉर्नवालिस ३६७
वास्तव में कम्पनी के शासन से पहले बुरे से बुरे समय में भी
देश की कभी वह हालत न हुई थी जो कम्पनी के शासन के तीस
साल के अन्दर दिखाई दे गई ।
सात साल भारत में शासन करने के बाद लॉर्ड कॉर्नवालिस
सन् १७९३ में विलायत लौट गया । उसे दोबारा हिन्दोस्तान भेजा
गया, किन्तु उसके चन्द महीने के अन्दर हिन्दोस्तान ही में उसकी
मृत्यु हो गई ।
भारत के अन्दर अंगरेज़ी सत्ता की जड़ों को मज़बूत करने में
कॉर्नवालिस ने ख़ास हिस्सा लिया !
is the state of things which prevails in most of the Zillahs in Bengal."--The
Fifth Report of 1812.
बारहवाँ अध्याय
• — • — •
सर जॉन शोर
[ १७६३-१७६८ ]
सर जॉन शोर वारेन हेस्टिंग्स के समय में बंगाल के अन्दर
कम्पनी का एक मामूली नौकर रह चुका था।
सर जॉन शोर की वारेन हेस्टिंग्स का वह पटु शिष्य था और वारेन
नियुक्ति हेस्टिंग्स ही के ज़रिये उसने इतनी तरक्क़ी की।
इंगलिस्तान के मन्त्रियों और कम्पनी के डाइरेक्टरों ने मिलकर
जिस समय सर जॉन शोर को गवरनर जनरल बनाकर भेजने का
इरादा किया उस समय पालिमेण्ट में वारेन हेस्टिंग्स के ऊपर
मुक़दमा चल रहा था। एडमण्ड बर्क उस मुक़दमे में सरकारी
वकील था। बर्क ने कम्पनी के डाइरेक्टरों को लिखा—
“ × × × हमें पता लगा है कि जिन जुर्मों का इलज़ाम वारन हेस्टिंग्स
सर जॉन शोर ३६६
पर लगाया जा रहा है उनमें से कुछ में मिस्टर शोर वास्तव में हेस्टिंग्स का
एक ख़ास साथी और सहायक था। × × ×
× × ×
“ऐसी हालत में आपके लिए यह सोच लेना बुद्धिमानी होगी कि एक
ऐसे आदमी को, जिसका चरित्र ज़ाहिरा आप ही के काग़ज़ात से अत्यन्त
निन्दनीय मालूम होता है, सब से ऊँचे और सब से अधिक अधिकार युक्त
पद पर नियुक्त करने के क्या नतीजे हो सकते हैं × × ×।”*
बर्क ने इससे कहीं अधिक ज़ोरदार पत्र इंगलिस्तान के 'भारत
मन्त्री' हेनरी डण्डास के पास भेजा।
किन्तु इन पत्रों का इंगलिस्तान के अधिकारियों पर कोई असर
न हुआ और २८ अक्तूबर सन् १७६३ को सर जॉन शोर ने कलकत्ते
पहुँच कर गवरनर जनरल का काम सँभाल लिया।
उसी साल पार्लिमेण्ट ने एक नए शाही चार्टर के ज़रिए ईस्ट
इण्डिया कम्पनी की ज़िन्दगी बीस साल के लिए और बढ़ा दी।
हिन्दोस्तान का बना हुआ माल और ख़ासकर यहां का बुना कपड़ा
- "... ... ... we have found Mr. Shore materially concerned as a
principal actor and party in certain of the offences charged upon Mr.
Hastings; ... ... ...
... ... ...
"In that situation, it is for the prudence of the court to consider the
consequences which possibly may follow from sending out, in offices of the
highest rank and of the highest possible power, persons whose conduct,
appearing on their own Records, is, at the first view, very reprehensible;
... ... ..."-Letter from Edmund Burke to Francis Baring, Chairman of the
Court of Directors, dated October 14, 1792.
४०० भारत में अंगरेज़ी राज
इंगलिस्तान जाना बन्द कर देने के लिए उस समय इंगलिस्तान में
ज़बरदस्त आन्दोलन जारी था। किन्तु यह कहानी एक दूसरे
अध्याय में दी जायगी।
मीर जाफ़र के उत्तराधिकारी अभी तक मुर्शिदाबाद की नुमायशी
मसनद पर बैठते चले आते थे। चुनांचे सर जॉन शोर के भारत
पहुँचने के एक महीने पहले ३७ साल की आयु में २३ साल तक
सूबेदारी की मसनद पर बैठने के बाद नवाब मुबारकुद्दौला की मृत्यु
हुई। मुबारकुद्दौला के बारह लड़के और तेरह लड़कियाँ थीं, जिनमें
सबसे बड़े लड़के वज़ीरुद्दौला के मसनद पर बैठने का २८ सितम्बर
सन् १७६३ को कलकत्ते में कम्पनी की ओर से बाक़ायदा एलान
किया गया।
एक पिछले अध्याय में पहले मराठा युद्ध और सन् १७८२ की
सालबाई वाली सन्धि का ज़िक्र आ चुका है।
[हाशिया: वारन हेस्टिंग्स की दोहरी साज़िशें] माधोराव नारायण उस समय पेशवा था। नाना
फड़नवीस उसका प्रधान मन्त्री था और हत्यारे
राघोबा को गोदावरी के तट पर कोपरगाँव भेज दिया गया था।
सन् १७८४ के शुरू में कोपरगाँव ही में राघोबा की मृत्यु हुई।
उसका बेटा बाजीराव जिसकी आयु ६ साल की थी, उस समय
पूना में था।
माधोजी सींधिया वारन हेस्टिंग्स के हाथों की एक ख़ास
कठपुतली था। माधोजी के साथ गुप्त सन्धियाँ और समझौते करके
हेस्टिंग्स उसके ज़रिये एक ओर मराठों की शक्ति का नाश करना
सर जॉन शोर ४०१
चाहता था और दूसरी ओर दिल्ली सम्राट् के रहे सहे मान और
उसके अधिकार का अन्त कर देना चाहता था। इंगलिस्तान पहुँच
कर वारन हेस्टिंग्स पर जो मुक़दमा चला उसमें एक इलज़ाम उस
पर यह था—
“मुग़ल सम्राट् के थोड़े से रहे सहे इलाकों को छीन लेने के लिए वारन
हेस्टिंग्स मराठा राज के प्रधान सेनापति माधोजी सींधिया से मिल गया;
और जब कि एक ओर उसने अपना एक दूत इस काम के लिए दिल्ली भेज
दिया कि वह वहाँ पर सम्राट् और उसके वज़ीरों के साथ गुप्त साज़िशें जारी
रक्खे × × × दूसरी ओर इस तमाम समय में वह सम्राट् और उसके वज़ीरों
के ख़िलाफ़ बराबर मराठों से मिला रहा; मराठों के साथ भी उसने दग़ा की
और उनसे बहाना यह लेता रहा कि मैं सम्राट् से तुम्हारे अधिकारों की रक्षा
कर रहा हूँ। इस तरह उसने उन सब के नाश की तदबीर की और सब का
नाश कर डाला।”*
वारन हेस्टिंग्स ही की सलाह से माधोजी सींधिया ने एक
[हाशिया: दिल्ली सम्राट् के] ज़बरदस्त फ़ौज रक्खी, उस फ़ौज में यूरोपियन
[हाशिया: साथ दग़ा] अफ़सर रक्खे और वारन हेस्टिंग्स की ख़ास
सिफ़ारिश पर एक यूरोपियन दी बॉयन को
उसका प्रधान सेनापति नियुक्त किया। यही फ़ौज लेकर माधोजी
- " . . . . Warren Hastings did unite with the Captain-General of
the Marhatta State, called Madhoji Scindhia, in designs against the few
remaining territories of the Moghul Emperor; and that whilst he sent an
agent to Delhi and carried on intrigues with the King and his ministers,
. . . . he did all along concur with the Marhattas in their designs
against the said King and his ministers, under the treacherous pretext of
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