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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 667

३६० भारत में अंग्रेज़ी राज
के मुखिया चुने जाते थे। मैलकम लिखता है कि ये मुखिया
आम तौर पर ऐसे लोग होते थे जो हर न्यायशील नरेश की
सहायता करते थे और हर अन्यायी नरेश का साहस के साथ
विरोध करते थे और गाँव के जीवन की अन्याय से रक्षा
करते थे। हर श्रेणी और हर बिरादरी के लोगों में से ये पञ्च
चुने जाते थे। मुद्दई और मुद्दालै दोनों को इनके चुनाव पर
एतराज़ करने का हक़ होता था। ये पञ्चायतें ही अत्यन्त प्राचीन
समय से लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आने के समय तक
भारतीय न्याय पद्धति के रग पट्ठे थीं। भारतवासियों के चरित्र पर
इनका प्रभाव बड़ा गहरा पड़ता था। मैलकम लिखता है कि—
“यदि कभी किसी आपत्ति के समय कोई मनुष्य अपना घर या
खेत छोड़ कर कहीं चला जाता था तो वह या उसकी औलाद जब
चाहे अपने झोपड़े या अपने खेत पर फिर से आकर क़ब्ज़ा कर
लेती थी, न किसी दीवार के लिए कोई झगड़ा होता था और न
किसी खेत के लिए मुक़दमेबाज़ी।।”* हर किसान अपनी ज़मीन का
पूरा मालिक समझा जाता था। मनरो लिखता है कि उस समय के
भारतवासी “सरल, निष्पाप और ईमानदार होते थे और इतने सच्चे
थे जितने संसार के किसी भी दूसरे देश के लोग हो सकते थे।”†
* "Every wall of a house, every field, was taken possession of by the
owner or cultivator without dispute or litigation."--Malcolm, vol. ii,
Chap. i Ibid., p. 100.
† "Simple, harmless, honest and having as much truth in them as any
people in the world."--Munro, vol. i, p. 280. Ibid, p. 100.

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