भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 666, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंलॉर्ड कॉर्नवालिस ३८६
सर टामस मनरो, जो हिन्दोस्तान के दूसरे हिस्सों से भी
अच्छी तरह परिचित था, लिखता है :—
“हिन्दोस्तान के हर गाँव में एक बाक़ायदा पंचायत ( म्युनिसिपैल्टी )
होती थी, जो गाँव की मालगुज़ारी और पुलिस दोनों का इन्तज़ाम करती थी
और जो बहुत बड़े दरजे तक, मुजरिमों को सज़ा देने और मुक़दमों के फ़ैसला
करने का भी काम करती थी ।”*
सर टॉमस मनरो ने बड़े विस्तार के साथ बयान किया है कि
इन सुसङ्गठित ग्राम पञ्चायतों में कौन कौन कर्मचारी होते थे, उनके
क्या क्या अधिकार और क्या क्या कर्त्तव्य होते थे, गाँव की
मालगुज़ारी वसूल करने वाले ( कलक्टर ) और गाँव में अमन
श्रामान क़ायम रखने वाले ( मैजिस्ट्रेट ) दो अलग अलग अफ़सर
एक दूसरे से बिल्कुल स्वतन्त्र होते थे । ग्राम निवासियों के जान
माल की रक्षा के लिए हर पञ्चायत के अधीन 'तहारों' (?) यानी
काँस्टेबलों का एक दल होता था, इत्यादि ।
टॉरेन्स लिखता है कि भारत की इन ग्राम पंचायतों में सबसे
विचित्र व्यवस्था जूरियों की थी। दीवानी और फ़ौजदारी हर
मुक़दमे के लिए अलग अलग जूरी या अस्थाई पञ्च चुने जाते थे।
इनका फ़ैसला सबके लिए मान्य होता था। इन्हें जनता चुनती
थी। उच्च से उच्च चरित्र, साहस और त्याग वाले मनुष्य इन
- "In all Indian villages there was a regularly constituted municipality,
by which its affairs, both of revenue and police, were administered, and
which exercised, to a very great extent, Magisterial and Judicial authority."
—Sir Thomas Munro, Ibid, p. 101.