भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 660, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंलॉर्ड कॉर्नवालिस ३८३
उस समय एक मोटी क़िस्म के कपड़े को कहते थे जो ख़ेमे बनाने
के काम में आता था।
अगले साल यानी सन् १७६३ ईसवी में कॉर्नवालिस ने
फ़्रांसीसियों के तमाम भारतीय इलाक़ों पर हमला करके उन्हें
अंगरेज़ कम्पनी के अधीन कर लिया।
इसके बाद भारत के अन्य नरेशों के साथ कॉर्नवालिस के
कॉर्नवालिस और व्यवहार को बयान करना बाक़ी है। दिल्ली का
दिल्ली सम्राट सम्राट अभी तक कहने के लिए समस्त भारत
का अधिराज था। अंगरेज़ क़ायदे के अनुसार
उसकी प्रजा थे। वारन हेस्टिंग्स के समय तक बंगाल, बिहार और
उड़ीसा की दीवानी के लिए वे दिल्ली दरबार को सालाना खिराज
भेजा करते थे। हेस्टिंग्स ने माधोराव सींधिया के साथ मिलकर
दिल्ली सम्राट को मराठों के हवाले करवा दिया, और कलकत्ते से
दिल्ली खिराज जाना रुक गया। उसके बाद सर जॉन मैकफ़रसन
केवल अस्थायी गवर्नर जनरल था। इस दरमियान दिल्ली से
खिराज की माँग बराबर आती रही। कॉर्नवालिस के समय में
सम्राट की ओर से फिर माँग आई। कॉर्नवालिस ने अब सदा के
लिए खिराज देने से इनकार कर दिया। इसलिए नहीं कि दिल्ली
सम्राट ने इस बीच अंगरेज़ों का कोई अहित किया हो, बल्कि केवल
इसलिए क्योंकि दिल्ली का सम्राट अब काफ़ी बलहीन हो चुका था
और अंगरेज़ अपना बल काफ़ी बढ़ा चुके थे। सम्राट दरबार में
इतनी हिम्मत न थी कि सेना भेजकर कलकत्ते से खिराज वसूल