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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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३८६ भारत में अंगरेज़ी राज
भी न पड़ी और गुण्टूर का इलाक़ा कम्पनी के हाथों में आ गया ।
कहा जाता है कि किसी डाकू की माँ ने सिकन्दर के सामने
विजेताओं और डाकुओं की परस्पर समानता दर्शाई थी। निस्संदेह
उसे इससे बढ़कर मिसाल न मिल सकती ।
अन्त में लॉर्ड कॉर्नवालिस के शासनकाल की और कुछ
कम्पनी के मुलाज़िमों काररवाइयों और उसके 'शासन सुधारों' पर
की नियुक्ति नज़र डालना ज़रूरी है। सब से पहले उसके
समय के कम्पनी के नौकरों की नियुक्ति का
ढङ्ग । इतिहास में दर्ज है कि उस समय के इंग्लिस्तान के युवराज
(प्रिन्स ऑफ़ वेल्स) ने अनेक बार अपने अनेक मित्रों या आश्रितों
की भारत की ख़ास ख़ास नौकरियों के लिए सिफ़ारिश की और
कॉर्नवालिस बराबर युवराज की इच्छा को पूरा करता रहा। एक
बार युवराज ने कॉर्नवालिस को लिखा कि आप "एलीकान नामक
एक काले" को बनारस की फ़ौजदारी की चीफ़ जजी से हटा कर
पैल्लेग्राइन ट्रीव्ज़ नामक एक अंगरेज़ को उसकी जगह नियुक्त कर
दें। पैल्लेग्राइन ट्रीव्ज़ इंग्लिस्तान के एक बदनाम महाजन का बेटा
था और युवराज को उस महाजन का कुछ क़र्ज़ा अदा करना था ।
कॉर्नवालिस इस बार युवराज की इच्छा पूरी न कर सका। उसने
युवराज को लिखा कि अली इब्राहीम ख़ाँ (जिसे युवराज ने 'काला
एलीकान' लिखा था) गोकि हिन्दोस्तानी है फिर भी "भारत के
सब से अधिक योग्य और सब से अधिक सम्मानित सरकारी
अफ़सरों में से है।" जब कि ट्रीव्ज़ नौजवान और बिलकुल नातजरु