भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 662, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंलॉर्ड कॉर्नवालिस ३८५
कम्पनी के दूसरे मित्र निज़ाम के साथ कॉर्नवालिस का सलूक
इससे बेहतर न था। इंगलिस्तान से चलते
कॉर्नवालिस और समय डाइरेक्टरों ने उसे हिदायत कर दी थी
निज़ाम कि 'गुण्टूर का इलाक़ा' किसी तरह निज़ाम से
ले लिया जाय। कॉर्नवालिस जानता था कि यदि मैसूर युद्ध से
पहले निज़ाम पर यह बात ज़ाहिर हो गई तो निज़ाम के टीपू से
मिल जाने का डर है। वह मौक़े की ताक में रहा। युद्ध के बाद
जब उसने निज़ाम को निर्बल पाया तो अपने एक अफ़सर कप्तान
केन्नावे को इस काम के लिए निज़ाम के दरबार में भेजा। इतिहास
लेखक मिल लिखता है :—
“तय हो गया था कि जब तक कप्तान केन्नावे दरबार में पहुँच न जावे
तब तक निज़ाम को यह ख़बर न होने पावे कि उससे गुण्टूर माँगे जाने की
तजवीज़ की जा रही है x x x मद्रास की गवरमेण्ट ने इधर उधर के बहाने
लेकर एक सेना गुण्टूर के आस पास पहुँचा दी, और इससे पहले कि कोई
दूसरी शक्ति लड़ने के लिए या एतराज़ करने के लिए पहुँच सके, खुद उस
इलाक़े पर क़ब्ज़ा करने की तैयारी कर ली।”*
निज़ाम पहले ही कायर और कमज़ोर था। युद्ध की ज़रूरत
- "No intimation was to be given to the Nizam of the proposed
demand, till after the arrival of Captain Kennaway at his Court . . . .
the Government of Madras, under spacious pretences, conveyed a body of
troops to the neighbourhood of the Sircar; and held themselves in readiness
to seize the territory before any other power could interpose, either with
arms or remonstrance."—Mill, vol. v, p. 225.
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