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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 664

बेकार है; और एक इतने ज़िम्मेवारी के ओहदे पर उसे नियुक्त करना
केवल मज़ाक़ उड़वाना होगा, इत्यादि ।
कॉर्नवालिस ने भारत आकर देखा कि उस समय ऊँचे ऊँचे
ओहदों पर कम्पनी के ज़्यादातर यूरोपियन नौकर अयोग्य और
रिश्वतख़ोर थे। कॉर्नवालिस ने इसे महसूस किया और इसके दो
इलाज किए। एक यह कि उसने नियम कर दिया कि आइन्दा
सिवाय छोटी से छोटी नौकरियों के कम्पनी के इलाक़े में कोई बड़ी
नौकरी किसी हिन्दोस्तानी को न दी जाय। दूसरे उसने कम्पनी के
यूरोपियन मुलाज़िमों की तनख़्वाहें बढ़ा दीं।
अत्यन्त प्राचीन काल से भारत की ८६ फ़ीसदी जन संख्या
[हाशिया: भारत की ग्राम] ग्रामों में रहती रही है। हर गाँव में सदा से एक
[हाशिया: पंचायतें] ग्राम पंचायत होती थी। इतिहास लेखक टॉरेन्स
के शब्दों में “भारतवासियों का सारा सामाजिक,
औद्योगिक और राजनैतिक जीवन इन्हीं ग्रामों और ग्राम पंचायतों के
आधार पर क़ायम था और इन्हीं का बना हुआ था।”* इन ग्राम
पञ्चायतों के सङ्गठन और उनके कार्यों के विषय में हम उस समय
के केवल एक दो अंगरेज़ इतिहास लेखकों की गवाही पेश करते हैं।
टॉरेन्स लिखता है :—
“उस प्राचीन काल से लेकर, जिसकी कि कोई याद तक बाक़ी नहीं रही,
हर गाँव के बड़े बूढ़ों की एक पञ्चायत गाँव पर शासन करती रही है, गाँव के

  • “... the village Community was, as it is still, the unit of
    social, industrial and political existence.”—Torrens' Empire in Asia, p. 100.