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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

१६४ भारत में अंगरेज़ी राज
और हमारी क़ौम की फिर से मित्रता लाभ करने का आपके लिए अच्छा
मौक़ा है। आप इससे इनकार नहीं कर सकते कि हमारी क़ौम के साथ
आपने बहुत बेजा सलूक किया है (जब कि आजकल हमारी और आपकी
क़ौमों में सुलह है)। यदि आप हमारे आदमियों को क़ासिमअली ख़ाँ के
हाथों से निकाल कर हमारे पास भेजने की तदबीर कर सकें तो आप अंगरेज़ों
की कृतज्ञता पर पूरा भरोसा रखिए और हम आपको पचास हज़ार रुपए
फ़ौरन देने का वादा करते हैं।"*
'सीअरुल-मुताख़रीन' में लिखा है कि इसके बाद मीर क़ासिम
मीर क़ासिम को  को किसी तरह गिरफ़्तार करने की अंगरेज़ों को
गिरफ़्तार करने  चिन्ता हुई। वन्सीटार्ट और वारन हेस्टिंग्स
की योजना   ने कलकत्ते के ईसाई सौदागर ख़ोजा पेतरूस से
जिसे आग़ा बेदरूस भी कहते थे, ख़ोजा ग्रिगरी
के नाम जिसे गुरघिन ख़ाँ भी कहते थे, इस सम्बन्ध में एक पत्र

  • "We are persuaded also that it must have been the most absolute
    necessity only which could have engaged you in so dishonourable a service
    to a Christian as that of the moors, who always treat with the grossest
    brutality those of our religion and Europeans when it is in their power to do
    it with impunity. A favourable opportunity now offers to enable you to
    rid yourself of so irksome a slavery and to reconcile yourself with our
    nation, towards which you can not deny but you have acted very improperly
    (and which is now at peace with yours). If you can contrive means for the
    delivery of our gentlemen from the power of Cossim Ally Khan and will
    convey them to us, you may place a firm reliance on the gratitude of the
    English; and we promise you fifty thousand Rupees immediately."-Letter
    dated 19th September, 1763, from Adams and Carnac to one Monsieur Gentil
    in the employ of Meer Kassim—Long's Records, pp. 332, 333.

मीर क़ासिम १६५

लिखाया। अचानक एक दिन रात को एक बजे मीर क़ासिम के
एक विश्वस्त जासूस ने उसे जगाकर ख़बर दी—"आप बिछौने
पर पड़े क्या कर रहे हैं, आपका सेनापति गुरघिन ख़ाँ आपको
साफ़ फ़िरङ्गियों के हाथों में बेच रहा है! कुछ बाहर के लोगों के
साथ और मालूम होता है कि भीतर के लोगों, यानी आपके क़ैदियों,
के साथ भी उसकी साज़िश हो चुकी है।"
अभी तक एलिस और उसके अंगरेज़ साथियों के साथ मीर
क़ासिम ने बड़ी उदारता का व्यवहार किया था। इन खुले बाग़ियों
को ख़तम कर देने के बजाय वह तीन महीने से बराबर उन्हें आदर
पूर्वक अपने साथ रक्खे था और खिला पिला रहा था। किन्तु
'सीअरुल-मुताख़रीन' के अनुसार जब उसने देखा कि ये सब लोग
अब भी मेरे ख़िलाफ़ गहरी साज़िश कर रहे हैं और बाहर से शस्त्रों
वगैरह का भी गुप्त प्रबन्ध कर चुके हैं, तो उसने मजबूर होकर पटने
में ख़ोजा ग्रिगरी को, एलिस और उसके तमाम साथियों को—केवल
एक अंगरेज़ डॉक्टर फ़ुलरटन को छोड़कर—जगतसेठ और उसके
भाई महाराजा स्वरूपचन्द को, यानी उन सबको जो इस साज़िश
में शामिल थे, क़त्ल करवा दिया। कहा जाता है कि ख़ोजा ग्रिगरी
इस साज़िश का सरग़ना था।
इसके बाद जब अंगरेज़ पटने की ओर बढ़े तो मीर क़ासिम ने
[हाशिया: मीर क़ासिम के शासन का अंत] कर्मनासा नदी को पार कर कुछ सेना और तोप
ख़ाने सहित ४ दिसम्बर सन् १७६३ को अपनी
सरहद से निकल कर नवाब शुजाउद्दौला के

१६६ भारत में अंगरेज़ी राज
सूबे अवध में प्रवेश किया। तीन साल तक वह बंगाल का सूबेदार
रह चुका था। उसका सारा शासन काल आपत्तियों से भरा हुआ
था। अब इस प्रकार उसके शासन का अन्त हुआ। मीर क़ासिम
के बाक़ी प्रयत्नों और उसकी मृत्यु का ज़िक्र अगले अध्याय में किया
जायगा। निस्सन्देह वह योग्य, वीर और अपने देश और प्रजा
दोनों का सच्चा हितचिन्तक था। सिराजुद्दौला के समान वह
विश्वासघात का शिकार हुआ। उसके शासन काल और पतन के
सारे क़िस्से को पढ़कर और उसकी कोशिशों के साथ उसके
विरोधियों की समस्त करतूतों की तुलना कर प्रत्येक निष्पक्ष मनुष्य
के चित्त में उसकी ओर दया, प्रेम और सहानुभूति का उत्पन्न
होना स्वाभाविक है। बहुत दरजे तक वह अन्तिम भारतीय वीर
था, जिसने बंगाल की स्वाधीनता की रक्षा के लिए एक बार जी
तोड़ प्रयत्न किया और इसी प्रयत्न में अपने आपको मिटा डाला।

पाँचवाँ अध्याय
फिर मीर जाफ़र
७ जुलाई सन् १७६३ को कलकत्ते के अंग्रेज़ों ने समस्त बंगाल,
बिहार और उड़ीसा में यह एलान प्रकाशित कर
[हाशिया: अंग्रेज़ों की ओर] दिया कि ‘मीर मोहम्मद क़ासिमअली ख़ाँ’ के
[हाशिया: से एलान] जुल्मों के कारण उन्हें सूबेदारी की मसनद से
उतार कर उनकी जगह ‘मीर मोहम्मद जाफ़रअली ख़ाँ बहादुर’
को फिर से मसनद पर बैठा दिया गया है। इसी एलान में सब
सरकारी कर्मचारियों और प्रजा से अपील की गई कि आप लोग
“मीर मोहम्मद जाफ़रअली ख़ाँ बहादुर की मदद के लिए उनके
झंडे के नीचे आकर जमा हो जावें, ताकि मीर मोहम्मद जाफ़र
अली ख़ाँ बहादुर क़ासिमअली ख़ाँ के प्रयत्नों को निष्फल करके
अपनी सूबेदारी को पक्का कर सकें।”

१६८ भारत में अंगरेज़ी राज
७ जुलाई से पहले ही एक और नई सन्धि मीर जाफ़र के साथ
[हाशिया: मीर जाफ़र के साथ] कर ली गई थी, जिसके विषय में इतिहास लेखक
[हाशिया: नई सन्धि] एल्फिन्स्टन लिखता है :—
“अधिकांश अंगरेज़ यही कहते थे कि मीर
जाफ़र को फिर से मसनद पर बैठाना केवल उसके न्याय्य अधिकारों का उसे
वापस देना है, किन्तु फिर भी वे उससे नई और अधिक कड़ी शर्तें स्वीकार
करा लेने में न झिझके ।”*
बर्धमान इत्यादि तीनों ज़िले और जितनी रियायतें मीर क़ासिम
ने उन्हें दे रक्खी थीं वे सब इस नई सन्धि द्वारा क़ायम रक्खी
गईं। एल्फिन्स्टन लिखता है कि आइन्दा के लिए यह नियत कर
दिया गया कि नवाब छै हज़ार सवार और बारह हज़ार पैदल से
ज़्यादा फ़ौज अपने पास न रक्खे। तमाम हिन्दोस्तानी व्यापारियों
से पहले की तरह सब माल पर २५ फ़ी सदी महसूल वसूल किया
जावे। अंगरेज़ व्यापारी नमक पर ढाई फ़ी सदी महसूल दिया करें
और बाक़ी हर तरह के माल पर उन्हें बिना महसूल दिए देश भर
में व्यापार करने का अधिकार रहे। मीर जाफ़र अंगरेज़ों को युद्ध
के ख़र्च के लिए ३० लाख, अंगरेज़ी स्थल सेना के लिए २५ लाख
और जल सेना के लिए १२½ लाख रुपए दे, और अंगरेज़ व्याप-
रियों का जितना नुक़सान मीर क़ासिम के समय में देशी व्याप-
रियों से महसूल न लिए जाने के कारण हुआ है, अब मीर जाफ़र
उसे पूरा करे। सन्धि के समय कहा गया कि यह हरजाने की


  • Rise of British Power in India, p. 397.

फिर मीर जाफ़र १६६
रक़म पाँच लाख से अधिक न होगी, किन्तु बाद में इस पाँच
लाख की जगह ५३ लाख वसूल किए गए। सन्धि की इन शर्तों के
विषय में कर्नल मालेसन लिखता है :—
"देशभक्त मीर क़ासिम ने जिन जिन रिआयतों के देने से इनकार
कर दिया था, नीच और स्वार्थी मीर जाफ़र ने वह सब अंगरेज़ों को प्रदान
कर दीं।"*
इतिहास लेखक स्क्रैफ़टन लिखता है :—
"नवाब इसके बाद केवल एक बैंक की तरह रह गया, जिससे कम्पनी
के मुलाज़िम जितनी दफ़े और जितनी रक़म चाहें, ले सकते थे।"
मीर क़ासिम के ख़िलाफ़ मीर जाफ़र अंगरेज़ों के हाथों में एक
उपयोगी हथियार था। उसी के नाम पर मीर
[हाशिया: बंगाल की और बुरी हालत] क़ासिम के अनेक आदमियों को बहका बहका कर
अंगरेज़ों ने अपनी ओर फोड़ा। ऊदवानाला की
लड़ाई में मीर जाफ़र अंगरेज़ी सेना के साथ था। फिर भी मीर
जाफ़र का अहसान मानने के स्थान पर अंगरेज़ों ने उसे अब और
अधिक दबाना शुरू किया, यहाँ तक कि इस दूसरे बार की सूबेदारी
में उसकी और उसकी प्रजा दोनों की हालत धीरे धीरे पहले की
अपेक्षा कहीं अधिक दर्दनाक हो गई। सितम्बर सन् १७६४ में मीर
जाफ़र ने कलकत्ते की कौन्सिल के नाम एक पत्र भेजा, जिसमें
उसने तेरह शिकायतें अंगरेज़ों के सामने रक्खीं। इन शिकायतों का

  • "Having obtained from the low ambition of Mir Jathr the advantages
    which the patriotism of Mir Kassim had refused to them."—Ibid p. 145.

२०० भारत में अंगरेज़ी राज
सार नीचे दिया जाता है, जिससे उस समय के बंगाल की
हालत का ख़ासा अन्दाज़ा लगाया जा सकता है। शिकायतें इस
प्रकार थीं :—
१—पटने में करनलगंज और मारूगंज नाम की दो नई मंडियां
अंगरेज़ों ने क़ायम की हैं। वहाँ के अंगरेज़ अफ़सर पुरानी सरकारी
मंडियों के व्यापारियों को ज़बरदस्ती पकड़ पकड़ कर अपने यहाँ
ले जाते हैं, जिसके कारण मेरी मंडियाँ उजड़ गईं और मुझे एक
लाख का नुक़सान हो रहा है।
२—पटना और मुर्शिदाबाद की कचहरियों की यह हालत है कि
वहाँ पर तमाम व्यापारी अंगरेज़ी कोठियों की आड़ लेकर सरकारी
महसूल देने से इनकार कर देते हैं।
३—जगह जगह अंगरेज़ गुमाश्ते सरकार के बाग़ियों और
मुजरिमों को अपने यहाँ आश्रय देते हैं।
४—हल्के और घटिया सिक्के ढालकर टकसाल के अधिकार
का दुरुपयोग किया जा रहा है।
५—क़ासिमबाज़ार की कोठी के गुमाश्तों ने ज़बरदस्ती दम-
दम, शिवपुर और बामनघाट इन तीनों गांव पर क़ब्ज़ा कर लिया
है और एक कौड़ी मालगुज़ारी नहीं देते।
६—अंगरेज़ गुमाश्ते अपना तम्बाकू और दूसरा माल ताल्लुक़-
दारों और रय्यत के सर ज़बरदस्ती मढ़ देते हैं, जिससे मुल्क
वीरान हो रहा है और सरकार की आमदनी को बहुत भारी
नुक़सान हो रहा है।

फिर मीर जाफ़र २०१
७—पटना, मुंगेर इत्यादि के क़िलों में अंगरेज़ों के आदमी
ज़बरदस्ती घुसे बैठे हैं और मेरी एक नहीं सुनते।
८—बंगाल के गंजों (मंडियों) और गोलों में कई अंगरेज़ों के
आदमी ज़बरदस्ती नाज ख़रीद लेते हैं और जिस तरह चाहते बेचते
हैं, यहाँ तक कि मेरे फ़ौजदारों को फ़ौज की आवश्यकताओं के
लिए भी नाज नहीं मिलता।
६—पटने के अन्दर क़रीब चालीस मकानों पर, जो मुसाफ़िरों के
लिए बने हैं, कुछ अंगरेज़ों ने क़ब्ज़ा कर लिया है, यहाँ तक कि मुझे
अपने और अपने कुटुम्बियों के ठहरने के लिए भी जगह न मिल सकी।
१०—पूर्णिया की लकड़ी की मंडी से मुझे पचास हज़ार रुपए
साल वसूल होते थे। अब अंगरेज़ों ने उस पर क़ब्ज़ा कर लिया है
और मुझे एक कौड़ी नहीं मिलती।
११—यह क़ायदा कर दीजिये कि सरकार के नौकरों या
आदमियों को न कोई अंगरेज़ उकसावे और न उन्हें आश्रय दे।
१२—कम्पनी की कोठियों से जो सिपाही मुल्क के विविध
भागों में भेजे जाते हैं, वे गाँव के गाँव उजाड़ डालते हैं और उनके
अत्याचारों के कारण रय्यत गाँव छोड़ कर भाग जाती है।
१३—इस मुल्क के जो ग़रीब लोग सदा से नमक, छालिया,
तम्बाकू इत्यादि का व्यापार करते थे, उन सब की रोज़ी अब
यूरोपनिवासियों ने छीन ली है, जिससे कम्पनी को कोई फ़ायदा
नहीं और सरकारी आमदनी को बहुत बड़ा नुक़सान है। ❋

  • Long's Selections, pp. 356-358.

२०२ भारत में अंगरेज़ी राज
मीर जाफ़र ने प्रार्थना की कि मेरी ये शिकायतें दूर की
जावें, किन्तु कलकत्ते की अंगरेज़ कौन्सिल ने इस ओर तनिक भी
ध्यान न दिया ।
उधर मीर क़ासिम का साहस अभी तक टूटा न था । अपनी
[हाशिया: मीर क़ासिम के अन्तिम प्रयत्न] सरहद से बाहर निकल कर वह इन विदेशियों
के बल को तोड़ने के अन्तिम प्रयत्न कर रहा
था । सूबेदारी की सनद मीर क़ासिम को सम्राट
की ओर से बाज़ाब्ता अता हो चुकी थी और मीर जाफ़र को बिना
सम्राट की इजाज़त ज़बरदस्ती अंगरेज़ों ने सूबेदार बना दिया था ।
सम्राट शाहआलम अभी तक फाफामऊ ( इलाहाबाद ) में था ।
अवध का नवाब शुजाउद्दौला इस समय मुग़ल साम्राज्य का प्रधान
मंत्री और सम्राट का विशेष संरक्षक था । मीर क़ासिम ने सम्राट
और शुजाउद्दौला दोनों से मिलकर अंगरेज़ों और बंगाल का सब
हाल कह सुनाया । शुजाउद्दौला की माँ को उसने माँ और शुजाउद्दौला
को अपना भाई कह कर सम्बोधन किया । शुजाउद्दौला ने क़ुरान
हाथ में लेकर अंगरेज़ों को सज़ा देने और मीर क़ासिम को फिर से
मुर्शिदाबाद की मसनद पर बैठाने की क़सम खाई ।
बुन्देलखण्ड का राजा इधर कई वर्ष से विद्रोह कर रहा था ।
उसने दिल्ली दरबार को ख़िराज भेजना बन्द कर दिया था ।
शुजाउद्दौला सम्राट की ओर से उस पर चढ़ाई की तैयारी कर रहा
था । मीर क़ासिम ने इस मौक़े को ग़नीमत समझा, सम्राट और
शुजाउद्दौला से इजाज़त लेकर अपनी सेना और तोपख़ाने सहित

फिर मीर जाफ़र २०३
बुन्देलखण्ड पर चढ़ाई की और शीघ्र ही वहाँ के राजा को अधीन
कर लिया। राजा ने तमाम पिछला खिराज श्रंदा करने का वादा
किया। मीर क़ासिम इलाहाबाद लौट आया। सम्राट और उसका
वज़ीर मीर क़ासिम की इस सेवा से इतने ख़ुश हुए कि उन्होंने
तुरन्त अंगरेज़ों के विरुद्ध बंगाल पर चढ़ाई करने की तैयारी शुरू
कर दी। सम्राट की इस चढ़ाई का स्पष्ट उद्देश मोर क़ासिम को
फिर से मसनद पर बैठाना था।
किन्तु चढ़ाई करने सं पहले अंगरेज़ों को इसकी सूचना देना
और उनसे जवाब तलब करना ज़रूरी था।
अंगरेज़ों के नाम नवाब वज़ीर शुजाउद्दौला ने इस समय सम्राट
शुजाउद्दौला का की श्रोर से नीचे लिखा पत्र अंगरेज़ गवर्नर
पत्र और उसकी कौन्सिल के नाम कलकत्ते भेजा :—
“हिन्दोस्तान के पिछले बादशाहों ने अंगरेज़ कम्पनी को महसूल माफ़
कर दिया, उन्हें बहुत सी बस्तियाँ और कोठियाँ अता कीं और उनके तमाम
कारबार में मदद की। इस तरह उन्होंने कम्पनी पर इतनी मेहरबानियों की
हैं और उसकी इतनी इज़्ज़त बढ़ाई है, जितनी न अपने मुल्क के व्यापारियों
के साथ कीं और न किसी दूसरी यूरोपियन क़ौम के साथ। इसके अलावा
हाल ही में बादशाह ने मेहरबानी करके मुनासिब से ज़्यादा ख़िताब और
रुतबे और उसके बाद जागीरें और दूसरी रिआयतें आप लोगों को अता की
हैं। बावजूद इन सब इनायतों के आप लोगों ने बादशाह के मुल्क में दख़ल
दिया, बर्धमान, चटग्राम वगैरह सरकारी इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर लिया और
बिना दरबार की रज़ामन्दी के जिस नवाब को चाहा मसनद से उतार दिया

२०४ भारत में अंग्रेज़ी राज
और जिसे चाहा बैठा दिया । आप लोगों ने दरबार के आदमियों को अपने
यहाँ क़ैद कर लिया और शहनशाह की हुकूमत को तौहीन और उसकी
बेइज़्ज़ती की, आपने देश के व्यापारियों की तिजारत को बरबाद कर दिया,
बादशाह के बाग़ियों को अपने यहाँ पनाह दी, दरबार की आमदनी को
नुक़सान पहुँचाया और अपने ज़ुल्म से मुल्क के बाशिन्दों को पामाल किया ।
आप लोग अभी तक कलकत्ते से नई नई फ़ौजें भेज कर शाही इलाक़ों पर
लगातार हमले करते रहते हैं, यहाँ तक कि इलाहाबाद के सूबे के कई गांव
और परगनों को भी आप लोगों ने लूट लिया है; इन सब नाजायज़ हरकतों
की क्या वजह समझी जा सकती है, सिवाय इसके कि आपको दरबार की
क़तई परवा नहीं और आप खुद मुल्क पर क़ब्ज़ा करने की बेजा कोशिशों में
लगे हुए हैं ?
"अगर आपने यह सब अपने बादशाह के हुकुम या कम्पनी की हिदायत
से किया है, तो मेहरबानी करके मुझे पूरा पूरा हाल बताइए, ताकि मैं उसका
मुनासिब इलाज कर सकूँ, लेकिन अगर इन शरारतों की वजह आपकी
अपनी ही बेजा ख़्वाहिशें हैं, तो आइन्दा ऐसी हरकतों से बाज़ रहिए; हुकूमत
के कामों में दख़ल न दीजिए, हर जगह से अपने आदमियों को हटा कर उन्हें
अपने मुल्क को वापस भेज दीजिए, पहले की तरह कम्पनी की तिजारत जारी
रखिए और महज़ तिजारती कारबार तक ही अपने तईं महदूद रखिए ।
अगर आप इस तरह रहना चाहें तो शाही दरबार हमेशा से ज़्यादा आपकी
तिजारत में मदद देगा और आपके साथ रिआयतें करेगा । किसी ऊँचे दरजे
के ओहदेदार को बतौर अपने वकील के यहाँ भेज दीजिए, जो तमाम हालात
की मुझे ठीक ठीक इत्तला दे, ताकि मैं उसके मुताबिक़ अमल कर सकूँ ।

नवाब वज़ीर शुजाउद्दौला
[ श्री वासुदेव राव सूबेदार, सागर, की कृपा द्वारा, एक प्राचीन चित्र से ]

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अगर ( खुदा न करे ) आप सरकशी और नाफ़रमानी करते रहे तो इन्साफ़
की तलवार बग़ावत करने वालों के सरों को खा जायगी और आप शाहन-
शाह की ख़फ़गी के भार को महसूस करेंगे, जो खुदा के क़हर का एक नमूना
है; फिर बाद में आपके अपनी ग़लती मानने या दरख़्वास्तें देने से भी काम
न चलेगा, क्योंकि शुरू ज़माने से बादशाह आपकी कम्पनी के साथ काफ़ी
रिआयतें करते रहे हैं। इसलिए मैंने आपको लिख दिया है, आप जैसा
मुनासिब समझिए वैसा कीजिए और मुझे जल्दी जवाब दीजिए।”
निस्सन्देह मुग़ल साम्राज्य के वज़ीर की हैसियत से शुजाउद्दौला
का पत्र उचित, उदार और न्यायानुकूल था। किन्तु इस पत्र से
यह भी ज़ाहिर है कि उस समय के भारतीय शासकों को पाश्चात्य
कूटनीति का पूरा पता न था।
इस पत्र को पाते ही और यह सुनते ही कि सम्राट और शुजा-
उद्दौला को साथ लेकर मीर क़ासिम बिहार लौटने वाला है, अंगरेज़
डर गए। ‘सीअरुल मुताख़रीन' में लिखा है :—
“शुजाउद्दौला के बल की ख्याति और उसकी सेना की अधिकता और
वीरता का हाल सुनकर वे डर गए और उन्होंने अपने आपको मैदान में
शुजाउद्दौला का मुक़ाबला कर सकने के नाक़ाबिल समझा।”
मीर क़ासिम के प्रान्त छोड़ने के समय अंगरेज़ों ने अज़ीमाबाद
( पटना ) से आगे बढ़कर सोन नदी को पार कर बक्सर में अपनी
छावनी डाल ली थी। अब फिर फुर्ती के साथ बक्सर की छावनी
को छोड़ कर सोन पार कर वे अज़ीमाबाद की चहारदीवारी के
अन्दर आ गए।

[Page Header]
२०६ भारत में अंगरेज़ी राज


जब इस पत्र का कोई सन्तोषजनक उत्तर न मिला तो शुजाउद्दौला
ने सम्राट् और मीर क़ासिम के साथ आकर अपनी फ़ौज से पटने
को घेर लिया।
बंगाल के अंगरेज़ इस समय ज़बरदस्त संकट में थे, किन्तु
[हाशिया: सम्राट् को शुजा-] उनकी पुरानी कूटनीति ने इस अवसर पर भी
[हाशिया: उद्दौला से फोड़ने] उनका पूरा साथ दिया। सबसे पहले उन्होंने
[हाशिया: की कोशिश] सम्राट् और शुजाउद्दौला को एक दूसरे से फोड़ने
की कोशिश की। "सीअरुल मुताख़रीन" का
विद्वान लेखक सय्यद गुलामहुसेन, जो अपने पिता के साथ इस
अवसर पर सम्राट् की सेना में मौजूद था, अपनी पुस्तक में स्वीकार
करता है कि लोभवश वह खुद इस समय अंगरेज़ों से मिल गया।
उसी की मारफ़त अंगरेज़ों ने शाहआलम को विश्वास दिलाया कि
हम आपके सच्चे "वफ़ादार और ख़ैरख़ाह" हैं। उन्होंने सम्राट् से
यह वादा किया कि हम शुजाउद्दौला को ज़ेर करके उसका सारा
सूबा आपके हाथों में दे देंगे। सम्राट् शाहआलम को इस समय
दिल्ली में अपने विपत्तियों के विरुद्ध चारों ओर से मदद की ज़रूरत
थी और उसकी इस कमज़ोरी तथा अदूरदर्शिता से अंगरेज़ों को
अपनी कूटनीति के लिए काफ़ी मदद मिली। भारत सम्राट् का इस
समय का भोलापन भी दर्दनाक और हैरतअंगेज़ था। अंगरेज़ों
ने अपनी चालों द्वारा सम्राट् को अपने पक्ष में तो नहीं कर लिया
किन्तु संग्राम से उदासीन अवश्य कर दिया।
एक दूसरा विश्वासघातक महाराजा शिताबराय का बेटा महा-

फिर मीर जाफ़र २०७
राजा कल्यानसिंह शुजाउद्दौला की सेना में एक ऊँचा ओहदेदार था
[हाशिया: शुजाउद्दौला की सेना में विश्वास-घातक] और अपने यहाँ की सेना की संख्या, सामान,
इरादों इत्यादि की पूरी सूचना अंगरेज़ कम्पनी
के अफ़सरों को देता रहता था। उसने अपने
एक लेख में स्वीकार किया है :—
“महाराजा शिताबराय उस समय अज़ीमाबाद में थे, उनका एक मुन्शी
राय साधोराम फुलवाड़ी में मुझसे मिलने के लिए आया x x x मैंने उससे
यह कहा कि अंगरेज़ अफ़सरों को और मीर मोहम्मद जाफ़र ख़ाँ को विश्वास
दिला दो कि मैं उनके साथ हूँ और इस बात के इन्तज़ार में बैठा हूँ कि
मौक़ा मिले और मैं लड़ाई का सारा रुख़ उनके पक्ष में मोड़ दूँ। राय साधो
राम ने मेरा सन्देश पहुंचा दिया और वापस आकर मुझे इत्तला दी कि
आपके सहानुभूति और आशा से भरे संदेश को पाकर अंगरेज़ और नवाब
दोनों खुश हुए और उन्हें आप पर पूरा भरोसा है।”*
एक तीसरे देशघातक और विश्वास घातक ज़ैनुल आबदीन का
एक पत्र अंगरेज़ सेनापति मेजर मनरो के नाम २२ सितम्बर सन्
१७६४ को कलकत्ते पहुँचा। इस पत्र में लिखा है :—
“असद ख़ाँ बहादुर की मारफ़त आपका मित्रता सूचक पत्र मेरे पास
पहुँचा, जिससे मेरी इज़्ज़त बढ़ी। उस पत्र में आपने इच्छा प्रकट की है कि
जितने अधिक मज़बूत और हथियारबन्द मुग़ल, तूरानी और अन्य सवारों
को हो सके, साथ लेकर मैं आपसे आ मिलूँ।
“जनाबमन, हर आदमी के लिए और ख़ासकर ख़ानदानी लोगों के

  • J. B. & O. R. S. vi, pp. 148, 149.

२०८ भारत में अंग्रेज़ी राज
लिए अपनी वक़्त की मुलाज़मत को छोड़कर अपने मालिक के दुश्मनों से जा
मिलना बड़ी ज़िल्लत की बात है, फिर भी कुछ हालात ऐसे हैं जिनसे हम
लोगों के लिए ऐसा करना जायज़ है × × ×"*
निस्सन्देह भारतीय नरेशों में परस्पर ईर्ष्या इस समय हद को
पहुँची हुई थी।
इस दरमियान बरसात शुरू हो गई और मौसम ख़राब होने
की वजह से या इन सब बातों से विवश होकर शुजाउद्दौला पटने
का मोहासरा छोड़कर बक्सर लौट आया। बक्सर ही में उसने
बरसात गुज़ारने का निश्चय किया।
उधर मीर जाफ़र ने मसनद पर दोबारा बैठते ही महाराजा
[हाशिया: दीवान नन्दकुमार] नन्दकुमार को अपना दीवान नियुक्त किया।
[हाशिया: के साथ ज़बरदस्ती] नन्दकुमार सच्चा और वफ़ादार साबित हुआ।
अंग्रेज़ों की चालों को वह ख़ासा समझ गया
था। नन्दकुमार की सलाह से मीर जाफ़र ने अब यह कोशिश की
कि मैं सम्राट शाहआलम और वज़ीर शुजाउद्दौला को खुश करके
अपनी सूबेदारी के लिए बाज़ाब्ता शाही फ़रमान हासिल करलूं।
निस्सन्देह मीर जाफ़र की यह इच्छा हर तरह उचित और नियमा-
नुकूल थी। किन्तु सम्राट और मीर जाफ़र का मेल अंग्रेज़ों के
लिए हितकर न हो सकता था। इसलिए ख़बर पाते ही अंग्रेज़ों ने
फ़ौरन निर्दोष नन्दकुमार को ज़बरदस्ती दीवानी से अलग कर

  • Long's Selections, pp. 358, 359.

फिर मीर जाफ़र २०६
दिया और मीर जाफ़र को पटने से कलकत्ते बुलवा लिया। कठ-
पुतली तथा बेबस मीर जाफ़र को अंगरेज़ों की आज्ञा माननी पड़ी।
मेजर कारनक की जगह मेजर मनरो अब पटने की सेना का
[हाशिया: मनरो का रोहतास के क़िले पर क़ब्ज़ा] प्रधान सेनापति नियुक्त हुआ। जुलाई मास में
वह पटने पहुँचा। अंगरेज़ों को डर था कि यदि
लड़ाई देर तक चली तो सम्भव है मराठों और
अफ़ग़ानों की सेनाएँ शुजाउद्दौला की मदद के लिए आ जावें।
इसलिए मेजर मनरो को आज्ञा दी गई कि तुम शुजाउद्दौला की
सेना पर हमला करके लड़ाई का शीघ्र अन्त कर डालो। मालूम
होता है मेजर मनरो के आते ही कम्पनी के कुछ हिन्दोस्तानी
सिपाही मीर जाफ़र के साथ अंगरेज़ों के इस अन्याय को देखकर
या किसी दूसरी वजह से अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत कर बैठे।
मेजर मनरो ने फ़ौरन बिना किसी तहक़ीक़ात या पूछ ताछ के तमाम
बाग़ियों को तोप के मुंह से उड़वा दिया।
इसके बाद मेजर मनरो ने रोहिताश्व (रोहतास) के क़िले
पर क़ब्ज़ा किया। इस क़िले के विषय में, सय्यद ग़ुलामहुसेन
लिखता है कि मेजर मनरो ने आते ही डॉक्टर फुलरटन की मारफ़त
सय्यद ग़ुलामहुसेन को पत्र लिखा कि—"यदि आप रोहिताश्व
का क़िला अंगरेज़ों के हवाले करने की तदबीर कर सकें तो आप
अंगरेज़ों की मित्रता और कृतज्ञता के हक़दार होंगे।" सय्यद
ग़ुलामहुसेन लिखता है कि—"इस सूचना के मिलने पर मैंने राजा
साहूमल से बातचीत की।" राजा साहूमल रोहिताश्व के क़िले का
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२१० भारत में अंगरेज़ो राज
क़िलेदार था। वह गुलामहुसेन की बातों में आ गया। उसने
अपनी शर्तें पेश कीं। अंगरेज़ों ने उसकी शर्तें मंजूर करलीं और
चुपचाप उसकी मदद से क़िले पर कब्ज़ा कर लिया। बाद में
अंगरेज़ों ने राजा साहूमल के साथ एक भी शर्त का पालन नहीं
किया। राजा साहूमल ने गुलामहुसेन से शिकायत की, किन्तु व्यर्थ।
यह भी कहा जाता है कि इस समय मीर क़ासिम के साथ
शुजाउद्दौला का व्यवहार जैसा चाहिए वैसा न रहा था।
१५ सितम्बर सन् १७६४ को बक्सर में दोनों ओर की सेनाओं
[बक्सर की मशहूर] में संग्राम हुआ। शाहआलम के दिल और दिमाग़
[लड़ाई] पर अंगरेज़ों की चालों का काफ़ी असर हो चुका
था। "सीअरुल-मुताख़रीन" का रचयिता, जो
इस काम में अंगरेज़ों का ख़ास मददगार था, लिखता है :—
"किन्तु शाहआलम ने जो भीतर से वज़ीर (शुजाउद्दौला) से असन्तुष्ट
था × × × कई तरह के बहाने करके समय टालना उचित समझा। वजह
यह थी कि वह कुछ पहले ही से अंगरेज़ों से मिल जाने की तदबीर सोच
चुका था। अंगरेज़ क़ौम इस विषय का कुछ सन्देशा उसके पास भेज चुकी
थी, जिससे वह उनसे मिल जाने का इच्छुक हा गया था और उनकी सहायता
से लाभ उठाने का भी निश्चय कर चुका था।"
जब कि स्वयं भारत सम्राट की यह हालत थी तो न जाने उस
दिन और कितने भारतीय सेनानियों ने सक्रिय या निष्क्रिय रूप में
शत्रु का साथ दिया होगा। नतीजा यह हुआ कि दिन भर के
घमासान में क़रीब पाँच छै हज़ार आदमी काम आए और असहाय

फिर मीर जाफ़र २११
शुजाउद्दौला को अपनी सेना सहित मैदान से पीछे हट जाना पड़ा,
जिसमें कहा जाता है उसके हज़ारों सैनिक गंगा की दलदल में फँस
कर रह गए ।
मीर क़ासिम जानता था कि यदि मैं अंगरेज़ों के हाथों में पड़
गया तो जो व्यवहार उन्होंने सिराजुद्दौला के
मीर क़ासिम की साथ किया उससे बेहतर सलूक की मुझे अंगरेज़ों
मृत्यु से आशा नहीं हो सकती । इसलिए वह बक्सर से
भाग कर सीधा इलाहाबाद पहुँचा । वहाँ से चल कर उसने बरेली
में दम लिया और अन्त को १२ साल से ऊपर एक गृहविहीन
जलावतन की तरह जगह जगह मुसीबतें उठाकर सन् १७७७ ई० में
दिल्ली में उसकी मृत्यु हुई । निस्सन्देह भारत की स्वाधीनता के
लिए अपने आप को मिटा देने वालों में मीर क़ासिम का नाम सदा
के लिए स्मरणीय रहेगा ।
सम्राट शाहआलम ने लड़ाई के समाप्त होते ही शुजाउद्दौला
का साथ छोड़कर अंगरेज़ी सेना के साथ डेरा डाला । अंगरेज़ों ने
फ़ौरन उसके सामने हाज़िर होकर उसका बाक़ायदा आदर मान
किया और उसे अपना सम्राट कह कर सलाम किया । सम्राट ही
के साथ अंगरेज़ों ने गंगा को पार किया और वहाँ से शुजाउद्दौला
के दीवान बेनीबहादुर को बुलवाकर शुजाउद्दौला के साथ सुलह की
बातचीत शुरू की । अंगरेज़ों ने दीवान बेनीबहादुर को यह विश्वास
दिलाने की कोशिश की कि कम्पनी ने अपने मुलाज़िमों को आज्ञा
दे दी है कि हिन्दोस्तान के अन्दर अब और नए इलाक़े फ़तह न