भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
DevanagariHindipublished727 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 463फिर मीर जाफ़र २०७
फिर मीर जाफ़र २०७
राजा कल्यानसिंह शुजाउद्दौला की सेना में एक ऊँचा ओहदेदार था
[हाशिया: शुजाउद्दौला की सेना में विश्वास-घातक] और अपने यहाँ की सेना की संख्या, सामान,
इरादों इत्यादि की पूरी सूचना अंगरेज़ कम्पनी
के अफ़सरों को देता रहता था। उसने अपने
एक लेख में स्वीकार किया है :—
“महाराजा शिताबराय उस समय अज़ीमाबाद में थे, उनका एक मुन्शी
राय साधोराम फुलवाड़ी में मुझसे मिलने के लिए आया x x x मैंने उससे
यह कहा कि अंगरेज़ अफ़सरों को और मीर मोहम्मद जाफ़र ख़ाँ को विश्वास
दिला दो कि मैं उनके साथ हूँ और इस बात के इन्तज़ार में बैठा हूँ कि
मौक़ा मिले और मैं लड़ाई का सारा रुख़ उनके पक्ष में मोड़ दूँ। राय साधो
राम ने मेरा सन्देश पहुंचा दिया और वापस आकर मुझे इत्तला दी कि
आपके सहानुभूति और आशा से भरे संदेश को पाकर अंगरेज़ और नवाब
दोनों खुश हुए और उन्हें आप पर पूरा भरोसा है।”*
एक तीसरे देशघातक और विश्वास घातक ज़ैनुल आबदीन का
एक पत्र अंगरेज़ सेनापति मेजर मनरो के नाम २२ सितम्बर सन्
१७६४ को कलकत्ते पहुँचा। इस पत्र में लिखा है :—
“असद ख़ाँ बहादुर की मारफ़त आपका मित्रता सूचक पत्र मेरे पास
पहुँचा, जिससे मेरी इज़्ज़त बढ़ी। उस पत्र में आपने इच्छा प्रकट की है कि
जितने अधिक मज़बूत और हथियारबन्द मुग़ल, तूरानी और अन्य सवारों
को हो सके, साथ लेकर मैं आपसे आ मिलूँ।
“जनाबमन, हर आदमी के लिए और ख़ासकर ख़ानदानी लोगों के
- J. B. & O. R. S. vi, pp. 148, 149.