भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० भारत में अंगरेज़ो राज
क़िलेदार था। वह गुलामहुसेन की बातों में आ गया। उसने
अपनी शर्तें पेश कीं। अंगरेज़ों ने उसकी शर्तें मंजूर करलीं और
चुपचाप उसकी मदद से क़िले पर कब्ज़ा कर लिया। बाद में
अंगरेज़ों ने राजा साहूमल के साथ एक भी शर्त का पालन नहीं
किया। राजा साहूमल ने गुलामहुसेन से शिकायत की, किन्तु व्यर्थ।
यह भी कहा जाता है कि इस समय मीर क़ासिम के साथ
शुजाउद्दौला का व्यवहार जैसा चाहिए वैसा न रहा था।
१५ सितम्बर सन् १७६४ को बक्सर में दोनों ओर की सेनाओं
[बक्सर की मशहूर] में संग्राम हुआ। शाहआलम के दिल और दिमाग़
[लड़ाई] पर अंगरेज़ों की चालों का काफ़ी असर हो चुका
था। "सीअरुल-मुताख़रीन" का रचयिता, जो
इस काम में अंगरेज़ों का ख़ास मददगार था, लिखता है :—
"किन्तु शाहआलम ने जो भीतर से वज़ीर (शुजाउद्दौला) से असन्तुष्ट
था × × × कई तरह के बहाने करके समय टालना उचित समझा। वजह
यह थी कि वह कुछ पहले ही से अंगरेज़ों से मिल जाने की तदबीर सोच
चुका था। अंगरेज़ क़ौम इस विषय का कुछ सन्देशा उसके पास भेज चुकी
थी, जिससे वह उनसे मिल जाने का इच्छुक हा गया था और उनकी सहायता
से लाभ उठाने का भी निश्चय कर चुका था।"
जब कि स्वयं भारत सम्राट की यह हालत थी तो न जाने उस
दिन और कितने भारतीय सेनानियों ने सक्रिय या निष्क्रिय रूप में
शत्रु का साथ दिया होगा। नतीजा यह हुआ कि दिन भर के
घमासान में क़रीब पाँच छै हज़ार आदमी काम आए और असहाय