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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

२१२ भारत में अंगरेजी राज
किए जायँ । इस पर भी शुजाउद्दौला और अंगरेज़ों में इस समय
सुलह न हो सकी।
मालूम होता है कि सम्राट बक्सर से इलाहाबाद की ओर चल
दिया। शुजाउद्दौला फिर से मुक़ाबला करने की तैयारी के इरादे
से पीछे हटा और अंगरेज़ शुजाउद्दौला का पीछा करने के लिए
आगे बढ़े।
मार्ग में अंगरेज़ों ने चुनार के क़िले का मोहासरा किया।
[चुनारगढ़ में] "सीअरुल-मुताख़रीन" में लिखा है कि अंगरेज़
[अंगरेज़ों की हार] सेनापति ने कम्पनी के नाम सम्राट का एक
दस्तख़ती परवाना क़िलेदार मोहम्मद बशीर ख़ाँ
के सामने पेश किया, किन्तु क़िले के भीतर की भारतीय सेना ने
इस परवाने की ख़ाक परवा न की। इस सेना ने जब यह देखा कि
हमारा क़िलेदार भी डाँवाडोल हो रहा है तो उन्होंने उसे क़िले से
बाहर निकाल कर उस सड़क पर छोड़ दिया, जो नवाब शुजाउद्दौला
के ख़ेमों की ओर जाती थी और स्वयं वीरता के साथ विदेशियों
से क़िले की रक्षा शुरू की। अंगरेज़ों ने अपनी तोपें सामने कीं।
कई दिन की गोलेबारी के बाद वे केवल क़िले की दीवार का एक
थोड़ा सा टुकड़ा गिरा पाए, किन्तु ज्योंही एक दिन अँधेरी रात में
अंगरेज़ी सेना ने इस रास्ते से क़िले के भीतर प्रवेश करना चाहा,
भीतर की भारतीय सेना ने अपनी बन्दूकों से उनमें से अधिकांश
का वहीं दीवार के ऊपर काम तमाम कर दिया। लाचार होकर
और बुरी तरह हार कर अंगरेज़ों को चुनार का मोहासरा छोड़

फिर मीर जाफ़र २१३
इलाहाबाद का रास्ता लेना पड़ा। वास्तव में बिना रिशवत, दग़ा
या इसी तरह के दूसरे उपायों के अंगरेज़ों ने कभी कहीं किसी एक
लड़ाई में भी किसी भारतीय सेना के ऊपर विजय प्राप्त नहीं की।
इलाहाबाद के क़िले की संरक्षक सेना ने भी अंगरेज़ी सेना का
इलाहाबाद पर खासा मुक़ाबला किया। किन्तु अंगरेज़ों के
अंगरेज़ों का क़ब्ज़ा सौभाग्य से वही नजफ़ ख़ाँ जिसने ऊदवानाला
पर अंगरेज़ों को बुरी तरह दिक़ किया था और
जो बहुत अरसे तक इलाहाबाद के क़िले में रह चुका था और
उसके रहस्यों से परिचित था, इस मौक़े पर अंगरेज़ों से मिल
गया। क़िले की दीवारों को गिराने के लिए अंगरेज़ी सेना के पास
इस समय जो एक सबसे अच्छी तोप थी वह हिन्दोस्तान ही की
बनी हुई थी और शुजाउद्दौला के ख़ेमों की लूट में उन्हें मिली थी।
नजफ़ ख़ाँ ने अंगरेज़ों को क़िले के सब गुप्त रास्ते बतला दिए और
इस तोप ने भी उन्हें ख़ासी मदद दी। अन्त में थोड़ी सी लड़ाई
के बाद अंगरेज़ी सेना ने इलाहाबाद के क़िले में प्रवेश किया।
क़िले पर हमला करने और भीतर वालों से शर्तें तय करने में
महाराजा शिताबराय की फ़ौज आगे थी, किन्तु क़ब्ज़ा करते समय
कम्पनी की अपनी सेना आगे थी।
शुजाउद्दौला अब भाग कर बरेली पहुँचा। वहाँ से लौट कर
कम्पनी और नवाब मलहरराव होलकर की कुछ मराठा सेना की
शुजाउद्दौला में सहायता से उसने कड़ा में अंगरेज़ी सेना पर
संधि फिर हमला किया। एक दो छोटी मोटी लड़ाइयाँ

२१४ भारत में अंगरेज़ी राज
भी हुईं। अन्त में महाराजा शिताबराय ने बीच में पड़ कर नीचे
लिखी शर्तों पर कम्पनी और शुजाउद्दौला में सुलह करवा दी :—
१—युद्ध में कम्पनी का जो ख़र्च हुआ है उसके लिए शुजाउद्दौला
पचास लाख रुपए कम्पनी को दे। पच्चीस लाख फ़ौरन् और पच्चीस
लाख सालाना क़िस्तों में।
२—इलाहाबाद के आस पास का प्रान्त जो इससे पहले अवध
के सूबे में शामिल था, सम्राट के उपयोग के लिए अलग कर दिया
जाय। इलाहाबाद का शहर और क़िला सम्राट के रहने के लिए
नियुक्त हो और इलाहाबाद के क़िले में सम्राट की रक्षा के लिए
कम्पनी की एक सेना रहे।
३—ग़ाज़ीपुर और उसके आस पास का इलाक़ा कम्पनी को
दे दिया जाय।
४—अंगरेज़ों का एक वकील शुजाउद्दौला के दरबार में रहा
करे, किन्तु नवाब शुजाउद्दौला के राज प्रबन्ध में वह किसी तरह
का दख़ल न दे।
५—आइन्दा हर पक्ष दूसरे पक्ष के शत्रु या मित्र को अपना
शत्रु या मित्र समझे।
अवध के नवाब वज़ीर के साथ अंगरेज़ों की यह पहली सन्धि
थी। अवध की नवाबी का प्रारम्भ सन् १७२० के क़रीब दिल्ली
दरबार की निर्बलता के दिनों में हुआ था। दिल्ली के सम्राट ने पहले
नवाब सआदत ख़ाँ को अवध का सूबेदार नियुक्त करके भेजा था।
उसके बाद सआदत ख़ाँ के भतीजे दूसरे नवाब सफ़दरजंग ने दो

फिर मीर जाफ़र २१५
करोड़ रुपये नादिरशाह को नज़र करके अपनी नवाबी क़ायम
रक्खी । सफ़दरजंग ही को पहली बार दिल्ली सम्राट ने साम्राज्य के
वज़ीर की पदवी प्रदान की और तभी से अवध के नवाब 'नवाब
वज़ीर' कहलाने लगे । शुजाउद्दौला सफ़दरजंग का बेटा था ।
निस्सन्देह नवाब शुजाउद्दौला ने अंगरेज़ों का ख़ासा मुक़ाबला
किया और इसमें भी सन्देह नहीं कि यदि स्वयं शाहआलम और
उसके अन्य साथी अंगरेज़ों के हाथों में न खेल जाते, तो बक्सर
के मैदान में ही शुजाउद्दौला अंगरेज़ों की उभरती हुई ताक़त को
सदा के लिए अन्त कर देता । शाहआलम की अयोग्यता ने
शुजाउद्दौला को पंगुल कर दिया । किन्तु शुजाउद्दौला के बाद से
सन् १८५६ तक अंगरेज़ कम्पनी और भारतीय नरेशों के परस्पर
संग्रामों में भारतवासियों को अवध के नवाबों से कभी विशेष
फ़ायदा नहीं पहुँचा । इसके विपरीत ब्रिटिश सत्ता के क़ायम करने
में अवध के निर्बल नवाब अक्सर कम्पनी की साज़िशों में एक
उपयोगी साधन साबित हुए । कम्पनी की भारतीय सेना के अधि-
कांश सिपाही सदा अवध से ही आते रहे और कम्पनी के अफ़सरों
को जब जब रुपये की ज़रूरत पड़ी, तो डर कर या मूर्खतावश,
उन्हें धन देने में अवध के ख़ज़ाने ने सदा कामधेनु का काम दिया ।
मीर जाफ़र को भी अंगरेज़ों ने अपनी महत्वाकांक्षा की शिखर
[हाशिया: मीर जाफ़र का] तक पहुँचने के लिए बतौर एक सीढ़ी के इस्तेमाल
[हाशिया: अन्त] किया और ज्योंही वे ऊपर तक पहुँच गए
उन्होंने बिना सङ्कोच उसे लात मार कर अलग

२१६ भारत में अंगरेज़ी राज
कर दिया। उसकी ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों को उन्होंने अत्यन्त
दुखमय बना दिया। अक्तूबर सन् १७६४ में उससे पाँच लाख रुपए
माहवार कम्पनी को देने का वादा करा लिया, जिससे वह अन्त
तक बहुत तङ्ग रहा और सदा शिकायत करता रहा। सन्धि से
बाहर नित्य नई और बढ़ बढ़ कर माँगें उससे की जाती रहीं।
आए दिन की इन ज़बरदस्तियों ने उसके स्वास्थ्य और आयु
दोनों पर असर डाला। प्रसिद्ध इतिहास लेखक सर विलियम
हण्टर लिखता है :—
"मीर जाफ़र जनवरी सन् १७६५ में मरा और कहा जाता है कि जिस
बेजा तरीक़े से कलकत्ते के अंगरेज़ों ने अपने व्यक्तिगत नुक़सानों के हरजाने
की अदायगी के लिए उससे तक़ाज़े शुरू किए, उनसे उसकी मौत और
जल्दी हुई।"*
वास्तव में मीर जाफ़र की मृत्यु फ़रवरी सन् १७६५ के आरम्भ
में मुर्शिदाबाद के महल में हुई। उसकी आयु उस समय ६५ वर्ष
की थी। अन्त समय में मीर जाफ़र की इच्छा के अनुसार उसके
अनेक सम्बन्धियों और बेटों के रहते हुए उसके चिर मित्र महाराजा
नन्दकुमार ने एक हिन्दू मन्दिर से गंगाजल लाकर मीर जाफ़र के
मुंह में डाला और उसी जल से अपने हाथों से उसने मीर जाफ़र
को आख़िरी स्नान कराया।

  • "His death took place in January 1765, and is said to have been
    hastened by the unseemly importunity with which the English at Calcutta
    pressed upon him their private claims to restitution."—Sir W. W. Hunter,
    in Statistical Account of Bengal vol. ix, p. 191.

छठा अध्याय
मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद
मीर जाफ़र के बड़े बेटे मीरन की हत्या का हाल ऊपर आ चुका
[हाशिया: नवाब नजमुद्दौला] है। मीर जाफ़र का दूसरा बेटा नजमुद्दौला अब
[हाशिया: और उसके साथ] मुर्शिदाबाद की मसनद पर बैठा, किन्तु असम्भव
[हाशिया: नई सन्धि] था कि अंगरेज़ हर ऐसे अवसर से पूरा लाभ न
उठाते। कलकत्ते का अंगरेज़ गवर्नर उन दिनों
“बंगाल में फ़ोर्ट विलियम क़िले का गवर्नर” कहलाता था।
अंगरेज़ ‘गवर्नर और कौन्सिल’ के पास मुर्शिदाबाद की सरकारी
सेना से कहीं अधिक सेना थी। बिना इस ‘गवर्नर और
कौन्सिल’ की रज़ामन्दी के मुर्शिदाबाद का कोई सूबेदार अब अपने
आप को क्रियात्मक सूबेदार न समझ सकता था। उस समय
के गवर्नर स्पेन्सर ने जो बन्सीटार्ट का उत्तराधिकारी था और
उसकी अंगरेज़ कौन्सिल ने नजमुद्दौला को उस समय तक

२१= भारत में अंगरेज़ी राज
सूबेदार मानने से इनकार किया, जब तक कि उससे एक नई सन्धि
पर दस्तख़त न करा लिए । इस नई सन्धि की मुख्य शर्तें ये थीं :—
( १ ) नवाब नजमुद्दौला 'नायब सूबेदार' का एक नया ओहदा
क़ायम करे, नायब सूबेदार नवाब के नाम पर शासन का सारा
काम करे, और अंगरेज़ों का एक ख़ास आदमी मोहम्मद रज़ा ख़ाँ
इस नए ओहदे पर नियुक्त किया जावे ।
( २ ) माल के महकमे में बिना कलकत्ते की अंगरेज़ कौन्सिल
की रज़ामन्दी के नवाब न किसी को बरख़ास्त करे और न कोई
नया आदमी नियुक्त करे ।
( ३ ) कम्पनी को फ़ौज के ख़र्च के लिए पाँच लाख रुपए
माहवार बराबर मुर्शिदाबाद के ख़ज़ाने से मिलते रहें ।
( ४ ) सिवाय इतनी फ़ौज के जो सरकारी मालगुज़ारी वसूल
करने और दरबार की इज़्ज़त क़ायम रखने के लिए ज़रूरी हो,
नवाब और अधिक फ़ौज अपने पास न रक्खे । और
( ५ ) देश भर में हर तरह के व्यापार पर अंगरेज़ों के लिए
महसूल माफ़ रहे ।
इन शर्तों के बाद बंगाल के सूबेदार की सत्ता केवल छाया मात्र
रह गई । किन्तु नजमुद्दौला को ये सब शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं,
और इनके अलावा बीस लाख रुपये नक़द बतौर दोस्ताने या रिश्वत
के स्पेन्सर और उसके साथियों की नज़र करने पड़े । यह बीस लाख
की रक़म गवर्नर और उसकी कौन्सिल के मेम्बरों ने आपस में
बाँट ली ।

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २१६
नए नवाब ने महाराजा नन्दकुमार को अपना दीवान नियुक्त
करना चाहा। अंगरेज़ नन्दकुमार से काफ़ी
[हाशिया: नन्दकुमार की गिरफ़्तारी] सावधान हो चुके थे। उन्होंने इजाज़त न दी
और नवाब पर उसकी बेबसी प्रकट कर देने के
लिए वे महाराजा नन्दकुमार को क़ैद करके ज़बरदस्ती मुर्शिदाबाद
से कलकत्ते ले आए।
कम्पनी का कारबार अब काफ़ी बढ़ गया था। उसकी आकां-
क्षाएँ बहुत ऊँची हो गई थीं। अपने कारबार की
[हाशिया: क्लाइव का दोबारा भारत आना] ठीक व्यवस्था करने और इन आकांक्षाओं को
पूरा करने के लिए डाइरेक्टरों ने क्लाइव को, जो
अब 'लॉर्ड क्लाइव' था, दोबारा भारत भेजना आवश्यक समझा।
क्लाइव फिर एक बार 'फोर्ट विलियम का गवर्नर' नियुक्त हुआ
जिस समय क्लाइव इंगलिस्तान से कलकत्ते आ रहा था मद्रास में
उसने मीर जाफ़र की मृत्यु का समाचार सुना । उसका ख़ास
उद्देश इस समय बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दिवानी के अधि-
कार शाह आलम से प्राप्त करना था। इतिहास लेखक होलर
लिखता है:—
"मीर जाफ़र की मृत्यु की ख़बर सुनकर क्लाइव बहुत खुश हुआ । वह
अब बंगाल प्रान्तों के राज्य शासन में उस नई पद्धति को जारी करने के लिए
उत्सुक था, जिसका सात साल से अधिक हुए वह इंगलिस्तान के प्रधान मंत्री
पिट से ज़िक्र कर चुका था। वह चाहता था कि एक ऐसे नए आदमी को
नवाब बना दिया जाय जो केवल शून्य मात्र हो, सारा शासन प्रबन्ध

२२० भारत में अंगरेज़ी राज
हिन्दोस्तानी कर्मचारियों के हाथों में रहे, असली मालिक अंगरेज़ रहे। वे ही
मालगुज़ारी वसूल करें, वे ही बाहर के हमलों और भीतर के विद्रोहों
से तीनों प्रान्तों की रक्षा करें, जंग करें और सन्धियाँ करें; किन्तु अंगरेज़ों
की यह बादशाइत जन सामान्य की आँखों से छिपी रहे, अंगरेज़ इस
तरह नवाब के नाम पर और मुग़ल सम्राट के दिए हुए अधिकार से शासन
करते रहें।" *
क्लाइव को उस समय तक यह मालूम न था कि अंगरेज़ों ने
नजमुद्दौला को नवाब मान लिया है। उसकी
क्लाइव की तजवीज़ यह थी कि मीर जाफ़र के छै साल के
तजवीज़ एक पोते को मुर्शिदाबाद की मसनद पर बैठाकर
उसके नाम पर अपनी यह सारी योजना पूरी की जावे।
मई सन् १७६५ में क्लाइव कलकत्ते पहुँचा। यहाँ आकर जब
उसने सुना कि स्पेन्सर और उसके साथियों ने नजमुद्दौला को
नवाब स्वीकार कर लिया और इस सौदे में बीस लाख रुपए नक़द
अपनी जेबों में भर लिए, तो क्लाइव को बड़ा क्रोध आया। किन्तु

  • ". . . was delighted at the news. He was anxious to introduce
    the new system for the Government of the Bengal provinces, which he had
    unfolded to Pitt more than seven years before. He would set up a new
    Nawab who should be only a cypher. He would leave the administration in
    the hands of native officials. The English were to be the real masters ; they
    were to take over the revenues, defend the three provinces from invasion
    and insurrection, make war and conclude peace. But the sovereignty of the
    English was to be hidden from the public eye. They were to rule only in
    the name of the Nawab and under the authority of the Moghul Emperor."—
    Wheeler's Early Records of British India, pp. 329, 330.

१

सम्राट् शाहआलम लार्ड क्लाइव को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्रदान कर रहा है
[By the courtesy of the Trustees, Victoria Memorial, Calcutta.]

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २२१
वह उसी समय से अपनी ऊपर लिखी योजना को पूरा करने के
प्रयत्नों में लग गया।
सम्राट शाहआलम अभी तक इलाहाबाद में था। सम्राट और
क्लाइव का इलाहा- नवाब वज़ीर शुजाउद्दौला दोनों अंगरेज़ों से दबे
बाद आना हुए थे। बंगाल के तीनों प्रान्तों के 'दीवानी' के
अधिकार सम्राट से प्राप्त कर लेने की अंगरेज़
पहले भी कोशिशें कर चुके थे। यही बात क्लाइव की ऊपर लिखी
योजना में भी शामिल है। उसने इस काम के लिए अब सीधे
इलाहाबाद पहुँचने का इरादा किया।
मार्ग में सबसे पहले क्लाइव मुर्शिदाबाद ठहरा। वहाँ पर
मोहम्मद रज़ा ख़ाँ की सहायता से क्लाइव ने
शुजाउद्दौला से पाँच लाख रुपये नक़द बतौर नज़र के अपने
नई सन्धि लिए नवाब नजमुद्दौला से वसूल किए और इस
तरह का पक्का इन्तज़ाम कर दिया कि जिससे आइन्दा के लिए
क़रीब क़रीब सारी अमली हुकूमत अंगरेज़ों के हाथों में आ गई
और सूबेदार केवल एक नाम मात्र की चीज़ रह गया। वहाँ से
चलकर क्लाइव जनरल कारनक के पास बनारस पहुँचा। शुजा-
उद्दौला भी उस समय बनारस में था। शुजाउद्दौला और अंगरेज़ों
के बीच हाल ही में सन्धि हो चुकी थी। दो अगस्त को क्लाइव की
शुजाउद्दौला से भेंट हुई। उसी दिन इस हाल की सन्धि की ख़ाक
परवा न करते हुए क्लाइव ने शुजाउद्दौला को फिर से लड़ाई की
धमकी देकर उससे एक नई सन्धि मंजूर करा ली, जिसके अनुसार

२२२ भारत में अंगरेज़ी राज
नवाब वज़ीर ने अब इलाहाबाद और कड़ा दोनों स्थान सम्राट के
लिए (?) कह कर कम्पनी को दे दिए और लड़ाई का जो हरजाना
पिछली सन्धि में पचास लाख रुपये नियुक्त किया गया था उसे
बढ़ाकर अब ६ लाख पाउण्ड यानी क़रीब ६० लाख रुपये कम्पनी
को भर देने का वादा किया ।
बनारस से आगे बढ़ कर क्लाइव इलाहाबाद पहुँचा । ६ अगस्त
[कम्पनी को दीवानी] सन् १७६५ को उसने सम्राट शाहआलम से भेंट
[के अधिकार] की और उसी रोज़ बंगाल, बिहार और उड़ीसा
की दीवानी के अधिकार अंगरेज़ कम्पनी को
देकर निर्बल और अदूरदर्शी शाहआलम ने मुर्शिदाबाद की सूबेदारी
और मुग़ल साम्राज्य दोनों की मौत के परवाने पर दस्तख़त कर दिए ।
इसका मतलब यह था कि आइन्दा से दोनों प्रान्तों का लगान और
दूसरे सरकारी टैक्स वसूल करने और उसमें से २६ लाख रुपये सम्राट
की मालगुज़ारी दिल्ली भेजते रहने और मुर्शिदाबाद दरबार के खर्च
के लिए रक़म अदा करने का काम कम्पनी के सुपुर्द हो गया । तीनों
प्रान्तों का शेष शासन प्रबन्ध सूबेदार के हाथों में रहा और बची
हुई मालगुज़ारी कम्पनी की सम्पत्ति हो गई । इस समय से बंगाल में
दो अलग अलग 'सरकारें' साफ़ दिखाई देने लगीं—एक मुर्शिदाबाद
की भारतीय सरकार और दूसरी कलकत्ते की अंगरेज़ सरकार ।
इसमें सन्देह नहीं, सम्राट से इस महत्त्वपूर्ण परवाने के हासिल
करने में बल प्रदर्शन से भी काम लिया गया । 'सीअरुल मुताख़रीन'
में लिखा है कि सम्राट और वज़ीर दोनों को—

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नजमुद्दौला
[ From the "History of Murshidabad", by Major Walsh

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २२३
“अपनी इच्छा के विरुद्ध मजबूर होकर यह प्रार्थना स्वीकार करनी पड़ी।”
क्लाइव अब अपना उद्देश पूरा कर इलाहाबाद से कलकत्ते वापस
आ गया।
क्लाइव जब मुर्शिदाबाद से बनारस के लिए रवाना हुआ था
[हाशिया: नजमुद्दौला की] उसी समय अचानक नवाब नजमुद्दौला की मृत्यु
[हाशिया: हत्या] हो गई। जिन हालात में यह मृत्यु हुई वे काफी
शक पैदा करने वाले थे। 'सीअरुल मुताख़रीन'
से मालूम होता है कि नजमुद्दौला और मोहम्मद रज़ा ख़ाँ दोनों
मुर्शिदाबाद के बाहर एक बाग़ तक क्लाइव को छोड़ने के लिए आए।
क्लाइव के रवाना हो जाने पर जब ये दोनों अपने अपने महलों की
ओर लौटे तो मार्ग ही में नौजवान नवाब के पेट में एकाएक ज़बर-
दस्त दर्द पैदा हुआ और महल तक पहुंचते पहुंचते उसकी मृत्यु हो
गई। लिखा है कि उन दिनों आम लोगों का ज़ोरों के साथ यह
ख़याल था कि मोहम्मद रज़ा ख़ाँ ने नजमुद्दौला को मरवा डाला।
मोहम्मद रज़ा ख़ाँ अंगरेज़ों का खास आदमी था। वेरेल्स्ट
नामक अंगरेज़ के एक ख़त से मालूम होता है कि कलकत्ते में उन
दिनों यह ज़बरदस्त अफ़वाह थी कि नवाब नजमुद्दौला की हत्या में
लॉर्ड क्लाइव और उसके कई अंगरेज़ साथियों की साज़िश थी। *
इसमें सन्देह नहीं, क्लाइव नजमुद्दौला के ख़िलाफ़ था। पाँच लाख
रुपये नक़द ले लेने के बाद उसने डाइरेक्टरों के नाम एक ख़त में
लिखा—“नजमुद्दौला के हाथों सत्ता सौंप देना और ख़ैरियत से

  • Third Report 1773, p. 325.

२२४ भारत में अंगरेज़ी राज
रह सकना नामुमकिन है ।"* इसके अलावा कोई नीच से नीच
काम ऐसा न हो सकता था जिसे अपनी इष्टसिद्धि के लिए क्लाइव
करने को तैयार न हो जाता । नजमुद्दौला के मृत्यु से एक लाभ
कम्पनी को और हुआ। उन्होंने 'दीवानी' मिलने पर नवाब के सैनिक
ख़र्च के लिए ५५ लाख रुपये सालाना देश की आमदनी में से देने का
वादा किया था । अब उसे घटा कर ४१ लाख ८१ हज़ार कर दिया ।
नजमुद्दौला की मृत्यु के साथ साथ मुर्शिदाबाद के नवाबों की
सत्ता की रही सही छाया भी बंगाल के इतिहास से लोप हो जाती
है। यद्यपि नाम या उपचार के लिए नजमुद्दौला के बाद उसका एक
छोटा भाई मसनद पर बैठा दिया गया और यह दोअमली वारन
हेस्टिंग्स के समय तक जारी रही, किन्तु वास्तव में बंगाल का सूबे-
दार अब केवल एक 'शून्य' रह गया, तीनों प्रान्तों का शासन
अंगरेज़ों के नियुक्त किए हुए तीन 'नायबों' के हाथों में आगया और
'अंगरेज़ सरकार' का ही बंगाल भर में ज़हूर दिखाई देने लगा । उस
समय से बंगाल का इतिहास केवल अंगरेज़ गवर्नरों के कारनामों
का इतिहास रह जाता है।
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के तमाम छोटे बड़े अंगरेज़ मुलाज़िमों
[हाशिया: भयंकर लूट और दोअमली] में धन का लोभ और दुराचार दोनों अब इस
दर्जे फैल गए थे कि नेकी, बदी या न्याय अन्याय
का विचार तो दूर रहा, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ


  • "It is impossible, therefore, to trust him with power, and be safe."—
    Clive's letter to the Court of Directors, dated 30th September, 1765.

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २२५
के सामने ये लोग कम्पनी के हित अहित की भी परवा न करते थे।
३० सितम्बर सन् १७६५ को क्लाइव ने कम्पनी के डाइरेक्टरों के
नाम एक लम्बा पत्र लिखा, जिससे उस समय के अंगरेज़ों की
हालत का ख़ासा पता चलता है। इस पत्र में क्लाइव लिखता है :—
“ x x x ये लोग ( कम्पनी के अंगरेज़ मुलाज़िम ) अपने अपने
व्यक्तिगत और थोड़ी देर के लाभ के पीछे इस जोश के साथ बढ़े चले जा रहे
हैं कि इनमें से अपनी इज़्ज़त का ख़्याल या अपने मालिकों की ओर अपना
कर्त्तव्य पूरा करने का ख़याल दोनों जाते रहे। इन लोगों के पास दौलत एका
एक बढ़ गई है और बहुतों ने उसे नाजायज़ तरीक़ों से हासिल किया है;
जिसकी वजह से तरह तरह की ऐश परस्ती इन लोगों में घर कर गई है
और यह ऐश परस्ती बड़ी ख़तरनाक हद को पहुँच गई है। x x x यह
बुराई रोग की तरह एक से दूसरे को लगती गई और दीवानी तथा फ़ौजी
दोनों महकमों के अंगरेज़ मुहर्रिरों, झंडा बरदारों और स्वतन्त्र व्यापारियों तक
में फैल गई है। x x x
“मैं अभी समझ भी न पाया था कि यह धन किन किन विविध उपायों
से प्राप्त किया गया है कि इतने में मैं यह देख कर अत्यन्त चकित रह
गया कि ये लोग इतनी जल्दी धनवान हो गए हैं कि अंगरेज़ी बस्ती भर में
शायद ही कोई एक अंगरेज़ ऐसा होगा, जिसने बहुत ही थोड़े समय के अन्दर
अपनी विशाल पूँजी सहित इंगलिस्तान लौट जाने का निश्चय न कर रक्खा हो।”
कम्पनी के अंगरेज़ों के धन कमाने का एक ख़ास उपाय उन
दिनों खुले डाके डालना था। इतिहास लेखक
खुले डाके टॉरेन्स ने साफ़ लिखा है कि ये लोग “बंगाल
१५

२२६ भारत में अंगरेज़ी राज
और अन्य स्थानों में निडर होकर लूट के लिए निकलते थे।” और
“बार बार अपनी दूकान छोड़ कर दल बना कर इधर उधर डाके
डालने जाते थे।” “उन दिनों कम्पनी के हर अंगरेज़ मुलाज़िम
का काम केवल यह था कि जितनी जल्दी हो सके, भारतवासियों से
दस या बीस लाख रुपए लूट खसोट कर इंगलिस्तान लौट जावे।”*
और आगे चल कर क्लाइव अपने उस ख़त में लिखता है :—
“× × × दौलत व्यवस्था की शत्रु है ही। इसी दौलत की वजह से
हमारी सेना प्रतिदिन बरबाद होती जा रही है × × × जब अंगरेज़ी फ़ौज
किसी शहर पर क़ब्ज़ा करती है तो उसके बाद सारा लूट का माल, दण्ड का
रुपया और सामान बे रोक टोक फ़ौज के लोग आपस में बाँट लेते हैं। × × ×
मैं आपको विश्वास दिला सकता हूँ कि बनारस में भी ऐसा ही हुआ। इससे
भी अधिक विचित्र बात यह है कि बनारस की लूट से कई साल पहले आपकी
ये स्पष्ट आज्ञाएँ आ चुकी थीं कि लूट के तमाम माल में से आधा कम्पनी
को मिलना चाहिए, फिर भी उस समय के गवर्नर और कौन्सिल ने बजाय
आपकी आज्ञा के अनुसार काम करने के × × × तमाम माल और रुपया
विजयी फ़ौज के सैनिकों में बाट दिया × × × ।
“× × × अय्याशी और रिश्वतख़ोरी का ज़ोर है × × ×।”

  • "The razzias made with impunity in Bengal and elsewhere . . . .
    the counting-house was deserted continually for marauding expeditions,
    . . . During this period the business of a servant of the Company was
    simply to wring out of the natives a hundred or two hundred thousand pounds
    as speedily as possible, that he might return home. . . . ."—Torren's
    Empire in Asia, pp. 82, 83.

मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २२७
उस समय के अंगरेज़ हिन्दोस्तानियों पर जिस तरह के अत्या-
चार करते थे उनके विषय में क्लाइव ने लिखा:-
संसार के इतिहास "जो यूरोपियन एजण्ट और जो बेशुमार काले
में अपूर्व अन्याय (हिन्दोस्तानी) एजेंट और सब एजेंट कम्पनी के मुला-
ज़िमों के अधीन काम करते हैं, उन सब ने प्रजा पर ज़ुल्म करने और उन्हें
पीड़ा पहुंचाने के जो तरीक़े जारी कर रखे हैं, वे मुझे डर है कि इस देश में
अंगरेज़ों के नाम पर सदा के लिए एक कलंक रहेंगे । x x x मैं देखता
हूं कि हर आदमी में बड़े बनने और धन कमाने की इच्छा, उसमें सफलता
और ऐश परस्ती, इन तीनों ने मिलकर एक नई क़िस्म की राजनीति प्रचलित
कर दी है, जिससे अंगरेज़ क़ौम की इज़्ज़त, कम्पनी पर लोगों का विश्वास
और मामूली इन्साफ़ और इन्सानियत—सब का खून हो रहा है ।"*

  • ". . . . . men, whose sense of honour, and duty to their employers,
    had been estranged by the too eager pursuit of their own immediate
    advantage. The sudden, and among many, the unwarrantable acquisition of
    riches, had introduced luxury in every shape, and in its most pernicious
    excess . . . . the evil was contagious, and spread among the Civil and
    Military, down to the writer, the ensign, and the free merchant . . . . .
    "Before I had discovered these various sources of wealth, I was under
    great astonishment to find individuals so suddenly enriched, that there was
    scarce a gentleman in the settlement who had not fixed upon a very short
    period for his return to England with affluence.
    ". . . . riches, the bane of discipline, were daily promoting the ruin
    of our army . . . they are suffered, without control, to take possession, for
    themselves, of the whole booty, donation money, and plunder, on the capture
    of a city. This, I can assure you, happened at Benares : and, what is more
    surprising, the then Governor and Council, so far from laying in a claim to
    the moiety which ought to have been reserved for, the Company, agreeable to
    those positive orders from the Court of Directors a few years ago, . . . .
    gave up the whole to the captors. . . . ."