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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 467

फिर मीर जाफ़र २११
शुजाउद्दौला को अपनी सेना सहित मैदान से पीछे हट जाना पड़ा,
जिसमें कहा जाता है उसके हज़ारों सैनिक गंगा की दलदल में फँस
कर रह गए ।
मीर क़ासिम जानता था कि यदि मैं अंगरेज़ों के हाथों में पड़
गया तो जो व्यवहार उन्होंने सिराजुद्दौला के
मीर क़ासिम की साथ किया उससे बेहतर सलूक की मुझे अंगरेज़ों
मृत्यु से आशा नहीं हो सकती । इसलिए वह बक्सर से
भाग कर सीधा इलाहाबाद पहुँचा । वहाँ से चल कर उसने बरेली
में दम लिया और अन्त को १२ साल से ऊपर एक गृहविहीन
जलावतन की तरह जगह जगह मुसीबतें उठाकर सन् १७७७ ई० में
दिल्ली में उसकी मृत्यु हुई । निस्सन्देह भारत की स्वाधीनता के
लिए अपने आप को मिटा देने वालों में मीर क़ासिम का नाम सदा
के लिए स्मरणीय रहेगा ।
सम्राट शाहआलम ने लड़ाई के समाप्त होते ही शुजाउद्दौला
का साथ छोड़कर अंगरेज़ी सेना के साथ डेरा डाला । अंगरेज़ों ने
फ़ौरन उसके सामने हाज़िर होकर उसका बाक़ायदा आदर मान
किया और उसे अपना सम्राट कह कर सलाम किया । सम्राट ही
के साथ अंगरेज़ों ने गंगा को पार किया और वहाँ से शुजाउद्दौला
के दीवान बेनीबहादुर को बुलवाकर शुजाउद्दौला के साथ सुलह की
बातचीत शुरू की । अंगरेज़ों ने दीवान बेनीबहादुर को यह विश्वास
दिलाने की कोशिश की कि कम्पनी ने अपने मुलाज़िमों को आज्ञा
दे दी है कि हिन्दोस्तान के अन्दर अब और नए इलाक़े फ़तह न