भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 462, कुल 727 में से
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२०६ भारत में अंगरेज़ी राज
जब इस पत्र का कोई सन्तोषजनक उत्तर न मिला तो शुजाउद्दौला
ने सम्राट् और मीर क़ासिम के साथ आकर अपनी फ़ौज से पटने
को घेर लिया।
बंगाल के अंगरेज़ इस समय ज़बरदस्त संकट में थे, किन्तु
[हाशिया: सम्राट् को शुजा-] उनकी पुरानी कूटनीति ने इस अवसर पर भी
[हाशिया: उद्दौला से फोड़ने] उनका पूरा साथ दिया। सबसे पहले उन्होंने
[हाशिया: की कोशिश] सम्राट् और शुजाउद्दौला को एक दूसरे से फोड़ने
की कोशिश की। "सीअरुल मुताख़रीन" का
विद्वान लेखक सय्यद गुलामहुसेन, जो अपने पिता के साथ इस
अवसर पर सम्राट् की सेना में मौजूद था, अपनी पुस्तक में स्वीकार
करता है कि लोभवश वह खुद इस समय अंगरेज़ों से मिल गया।
उसी की मारफ़त अंगरेज़ों ने शाहआलम को विश्वास दिलाया कि
हम आपके सच्चे "वफ़ादार और ख़ैरख़ाह" हैं। उन्होंने सम्राट् से
यह वादा किया कि हम शुजाउद्दौला को ज़ेर करके उसका सारा
सूबा आपके हाथों में दे देंगे। सम्राट् शाहआलम को इस समय
दिल्ली में अपने विपत्तियों के विरुद्ध चारों ओर से मदद की ज़रूरत
थी और उसकी इस कमज़ोरी तथा अदूरदर्शिता से अंगरेज़ों को
अपनी कूटनीति के लिए काफ़ी मदद मिली। भारत सम्राट् का इस
समय का भोलापन भी दर्दनाक और हैरतअंगेज़ था। अंगरेज़ों
ने अपनी चालों द्वारा सम्राट् को अपने पक्ष में तो नहीं कर लिया
किन्तु संग्राम से उदासीन अवश्य कर दिया।
एक दूसरा विश्वासघातक महाराजा शिताबराय का बेटा महा-