भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ भारत में अंग्रेज़ी राज
लिए अपनी वक़्त की मुलाज़मत को छोड़कर अपने मालिक के दुश्मनों से जा
मिलना बड़ी ज़िल्लत की बात है, फिर भी कुछ हालात ऐसे हैं जिनसे हम
लोगों के लिए ऐसा करना जायज़ है × × ×"*
निस्सन्देह भारतीय नरेशों में परस्पर ईर्ष्या इस समय हद को
पहुँची हुई थी।
इस दरमियान बरसात शुरू हो गई और मौसम ख़राब होने
की वजह से या इन सब बातों से विवश होकर शुजाउद्दौला पटने
का मोहासरा छोड़कर बक्सर लौट आया। बक्सर ही में उसने
बरसात गुज़ारने का निश्चय किया।
उधर मीर जाफ़र ने मसनद पर दोबारा बैठते ही महाराजा
[हाशिया: दीवान नन्दकुमार] नन्दकुमार को अपना दीवान नियुक्त किया।
[हाशिया: के साथ ज़बरदस्ती] नन्दकुमार सच्चा और वफ़ादार साबित हुआ।
अंग्रेज़ों की चालों को वह ख़ासा समझ गया
था। नन्दकुमार की सलाह से मीर जाफ़र ने अब यह कोशिश की
कि मैं सम्राट शाहआलम और वज़ीर शुजाउद्दौला को खुश करके
अपनी सूबेदारी के लिए बाज़ाब्ता शाही फ़रमान हासिल करलूं।
निस्सन्देह मीर जाफ़र की यह इच्छा हर तरह उचित और नियमा-
नुकूल थी। किन्तु सम्राट और मीर जाफ़र का मेल अंग्रेज़ों के
लिए हितकर न हो सकता था। इसलिए ख़बर पाते ही अंग्रेज़ों ने
फ़ौरन निर्दोष नन्दकुमार को ज़बरदस्ती दीवानी से अलग कर
- Long's Selections, pp. 358, 359.