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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 461

अगर ( खुदा न करे ) आप सरकशी और नाफ़रमानी करते रहे तो इन्साफ़
की तलवार बग़ावत करने वालों के सरों को खा जायगी और आप शाहन-
शाह की ख़फ़गी के भार को महसूस करेंगे, जो खुदा के क़हर का एक नमूना
है; फिर बाद में आपके अपनी ग़लती मानने या दरख़्वास्तें देने से भी काम
न चलेगा, क्योंकि शुरू ज़माने से बादशाह आपकी कम्पनी के साथ काफ़ी
रिआयतें करते रहे हैं। इसलिए मैंने आपको लिख दिया है, आप जैसा
मुनासिब समझिए वैसा कीजिए और मुझे जल्दी जवाब दीजिए।”
निस्सन्देह मुग़ल साम्राज्य के वज़ीर की हैसियत से शुजाउद्दौला
का पत्र उचित, उदार और न्यायानुकूल था। किन्तु इस पत्र से
यह भी ज़ाहिर है कि उस समय के भारतीय शासकों को पाश्चात्य
कूटनीति का पूरा पता न था।
इस पत्र को पाते ही और यह सुनते ही कि सम्राट और शुजा-
उद्दौला को साथ लेकर मीर क़ासिम बिहार लौटने वाला है, अंगरेज़
डर गए। ‘सीअरुल मुताख़रीन' में लिखा है :—
“शुजाउद्दौला के बल की ख्याति और उसकी सेना की अधिकता और
वीरता का हाल सुनकर वे डर गए और उन्होंने अपने आपको मैदान में
शुजाउद्दौला का मुक़ाबला कर सकने के नाक़ाबिल समझा।”
मीर क़ासिम के प्रान्त छोड़ने के समय अंगरेज़ों ने अज़ीमाबाद
( पटना ) से आगे बढ़कर सोन नदी को पार कर बक्सर में अपनी
छावनी डाल ली थी। अब फिर फुर्ती के साथ बक्सर की छावनी
को छोड़ कर सोन पार कर वे अज़ीमाबाद की चहारदीवारी के
अन्दर आ गए।