भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
१० पुस्तक प्रवेश
जब कि स्वयं ब्रिटिश पार्लिमेण्ट के काग़ज़ों की यह हालत है तो अंगरेज़ों
के लिखे हुए मामूली ऐतिहासिक उल्लेखों पर कहाँ तक विश्वास किया
जा सकता है ।
इतिहास लेखक फ़्रीमैन स्वीकार करता है कि सरकारी एलानों, पत्रों
और राजनैतिक दस्तावेज़ों का सारा क्षेत्र “झूठ का मनोवाञ्छित क्षेत्र है ।”
वह लिखता है—
“फिर भी ये झूठ शिक्षाप्रद झूठ हैं,—ये उन लोगों के कहे
हुए झूठ हैं, जो सच्चाई से वाक़िफ़ थे । कई तरह के उपायों से
झूठ के अन्दर से भी सच्चाई का पता लगाया जा सकता है,
किन्तु किसी झूठ पर विश्वास कर लेना उससे सच्चाई का पता
लगाने का तरीक़ा नहीं है । वास्तव में वह मनुष्य बालक की तरह
भोला है, जो हर शाही एलान पर या पार्लिमेण्ट के हर एक्ट
की भूमिका पर विश्वास करले, और उनसे यह अन्दाज़ा लगावे
कि अमुक अमुक बड़े लोगों ने क्या क्या किया और उसके करने
में उनकी क्या ग़रज़ थी ।”*
इतिहास से झूठ की कुछ मिसालें
इस पुस्तक के लेखक को आज १९२८ ई० से चार साल पहले तक
- “. . . Here we are in the very chosen region of lies . . . yet
they are instructive lies ; they are lies told by people who know the truth;
truth may even, by various processes, be got out of the lies ; but it will not
be got out of them by the process of believing them. He is of childlike
simplicity indeed who believes every royal proclamation or the preamble
of every Act of Parliament, as telling us, not only what certain august
persons did, but the motives which led them to do it.”—Freeman.
लेखक की कठिनाइयां ११
इस बात का अनुमान न हो सकता था कि अंगरेज़ विद्वानों के लिखे हुए
भारत के अधिकांश इतिहासों में झूठ की मात्रा कितनी अधिक और कितनी
भयङ्कर है।
सिन्ध के अंगरेज़ विजेता सर चार्ल्स नेपियर के भाई मेजर जनरल
विलियम नेपियर की पुस्तक "दी कॉन्क्वेस्ट ऑफ़ सिन्ध" की शुमार सिन्ध के
ऊपर सबसे अधिक प्रामाणिक अंगरेज़ी पुस्तकों में की जाती है। अंगरेज़ों की
सिन्ध विजय को मनुष्य जाति के ऊपर एक बहुत बड़ा उपकार साबित करने
के लिये विलियम नेपियर ने सिन्ध निवासियों और उनके मुसलमान
शासकों के चरित्र पर जो अनेक कलङ्क लगाए हैं उनमें से एक कलङ्क शिशु
हत्या भी है। नेपियर लिखता है—
“और ये राक्षस खुद अपने बच्चों की किस तरह हत्या करते
थे ? पहले तो वे भ्रूणहत्या के लिए दवाइयां पिलाते थे; यदि
इससे काम न चलता था तो कभी कभी वे बच्चों के पैदा होते ही
अपने हाथों से काट कर उनके टुकड़े टुकड़े कर डालते थे; किन्तु
अधिकतर वे यह करते थे कि इन बच्चों को गद्दों के नीचे डाल कर
उन पर खुद बैठ जाते थे, और जब कि उनके बच्चों का उनके नीचे
घुट कर दम निकलता था, वे उनके ऊपर बैठे हुए तम्बाकू पीते
रहते थे, शराब पीते रहते थे और अपने इस नारकीय कृत्य पर
एक दूसरे से मज़ाक़ करते रहते थे।" ✽
✽ "And how did these monsters destroy their own children? First they
gave potions, called Odalisques, to procure abortion; if these failed, they
sometimes chopped the children to pieces with their own hands immediately
१२ पुस्तक प्रवेश
कप्तान ईस्टविक, जिसे ठीक उन्हीं दिनों कई साल सिन्ध में रहने और
सिन्ध के देशी शासकों और वहाँ की प्रजा दोनों से मिलने जुलने का अव-
सर मिला और जो सिन्ध की भाषाओं और वहाँ के रस्मोरिवाज से अच्छी
तरह परिचित था, इस लज्जाजनक झूठ की आलोचना करते हुए एक दूसरे
यूरोपियन विद्वान ग्रैटन का नीचे लिखा वाक्य नक़ल करता है—
“इतिहास में अनेक बातें ऐसी लिखी मिलती हैं, जिनको
सच साबित करने या जिनका खण्डन करने का कोई ख़ास मूल्य
नहीं है । सदाचार की इस तरह की ऊँची (किन्तु असत्य) मिसालें
इतिहास में मिलती हैं, जिन्हें यदि एक बार लोगों ने सच्चा मान
लिया है तो उनसे दुनियां का भला ही हुआ है । किन्तु जब
किसी व्यक्ति या जाति के चरित्र पर कलङ्क लगाए जाते हैं और
जब हम यह देखते हैं कि कितनी आसानी से उन झूठे कलङ्कों का
प्रचार किया जाता है, कितने शौक़ के साथ लोग उन्हें पढ़ते और
सुनते हैं, और जिन बातों को गढ़ लेने या फैलाने में कुछ भी
ख़र्च नहीं होता, किन्तु जिनका पूरी तरह खण्डन करने में ज़िन्दगी
भर मेहनत और इस तरह की परिस्थिति की ज़रूरत होती है,
जिसका मिलना क़रीब क़रीब नामुमकिन हो जाता है, उन बातों
पर लोग सहज ही में और बेपरवाही के साथ विश्वास कर लेते हैं,
after birth; but more frequently placed them under cushions and sat down,
smoking and drinking and jesting with each other about their hellish work,
while their children were being suffocated beneath them."—The Conquest of
Sindh, part ii, p. 348.
लेखक की कठिनाइयां १३
जब हम यह सब देखते हैं तो हर ईमानदार लेखक या पाठक का
इस तरह के 'इतिहास की सच्चाई पर सन्देह' करना कुदरती है।”*
यह दोहराने की ज़रूरत नहीं है कि स्वयं अंगरेज़ गवाहों ही के अनुसार
विलियम नेपियर का ऊपर लिखा बयान बिल्कुल कल्पित, झूठा और
निराधार है। आज से केवल ८२ साल पहिले जिस समय सिन्ध पर ईस्ट
इण्डिया कम्पनी का क़ब्ज़ा हुआ, उस समय सिन्ध के अमीरों और सिन्ध
की प्रजा दोनों का सार्वजनिक और व्यक्तिगत चरित्र नेपियर और उसके देश-
वासियों के चरित्र की निस्बत कहीं अधिक पवित्र और ऊँचा था। नेपियर
ने अपनी पुस्तक में जिस तरह सिन्ध निवासियों के चरित्र पर निराधार झूठे
कलङ्क लगाए हैं, उसी तरह सिन्ध के अमीरों को भी बदनाम करने की
भरसक कोशिश की है। जिन अमीरों ने कभी जीवन भर किसी मादक द्रव्य
को अपने पास नहीं आने दिया, जो तम्बाकू के धुएँ तक से बचते थे, और
जो स्त्री जाति के सतीत्व की रक्षा का ग़ैर मामूली ध्यान रखते थे, उनको
नेपियर ने शराबी और कुचरित्र चित्रित किया है। हम ये सब बातें सर्वथा
विश्वस्त अंगरेज़ लेखकों ही के आधार पर लिख रहे हैं। इन बातों का विस्तृत
हाल पाठकों को इस पुस्तक के अन्दर सिन्ध के अध्याय में पढ़ने को मिलेगा।
- "There are many statements of history which it is immaterial to
substantiate or disprove. Splendid pictures of public virtue have often
produced their good if once received as fact. But, when private character
is at stake, every conscientious writer or reader will cherish his 'historic
doubts,' when he reflects on the facility with which calumny is sent abroad,
the avidity with which it is received, and the careless ease with which men
credit what it costs little to invent and propogate, but requires an age of
trouble, and an almost impossible conjunction of opportunities, effectually
to refute."—Frattan's History of the Netherlands, vol. ii, p. 242
३४ पुस्तक प्रवेश
भारतीय नरेशों पर झूठे कलङ्क .
ठीक इसी तरह जिस सिराजुद्दौला ने अपने नाना अलीवर्दी ख़ाँ की
अन्तिम आज्ञा के अनुसार तख़्त पर बैठने के दिन से मरने की घड़ी तक
कभी मदिरा को हाथ तक न लगाया था, * और जिसके व्यक्तिगत चरित्र
में कोई ऐसा दोष न था, जो उस समय के ९९ प्रतिशत भारतीय नरेशों या
अंगरेज़ शासकों में न पाया जाता हो, उसे अंगरेज़ी पुस्तकों में परले दरजे
का दुराचारी बयान किया जाता है। यही अन्याय मीर क़ासिम, हैदरअली,
टीपू सुलतान, नन्दकुमार, लक्ष्मीबाई इत्यादि अन्य भारतीय वीरों और
वीरांगनाओं के चरित्र के साथ किया गया है। इन सब बातों का अधिक
हाल इस पुस्तक के अन्दर जगह जगह दिया गया है। इतिहास लेखक सर
जॉन के साफ़ लिखता है—
“× × × हम लोगों में यह एक रिवाज है कि पहले किसी
देशी नरेश का राज उससे छीन लेते हैं और फिर पदच्युत नरेश
पर या उस मनुष्य पर, जो उसका उत्तराधिकारी बनने वाला था,
झूठे कलंक लगाकर उन्हें बदनाम करते हैं।”†
फ़र्जी चित्र
जिस तरह व्यक्तियों के चरित्र के साथ किया जाता है उसी तरह
घटनाओं के साथ, यहाँ तक कि अनेक पुस्तकों में भारतीय नरेशों के चित्र
- Scrafton's Reflections, as quoted in “बाङ्गलार इतिहास, नवाबी
आमल,” लेखक कालीप्रसन्न बन्द्योपाध्याय ।
† “. . . It is a custom among us . . . to take a native ruler's
kingdom and then to revile the deposed ruler or his would be successor.”—
Sir John Kaye's History of the Sepoy War, vol. iii, pp. 361, 362.
लेखक की कठिनाइयां १५
तक बिल्कुल ग़लत मिलते हैं। जिस हैदरअली ने होश सँभालने के बाद से
कभी दाढ़ी या मूँछ नहीं रक्खी उसका दाढ़ी और मूँछों वाला चित्र अनेक
अंगरेज़ी इतिहासों में मिलता है ! कैसल की 'हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया' में जो
अत्यन्त प्रामाणिक मानी जाती है, हमने सम्राट बहादुरशाह का एक चित्र
देखा, जिसके पैरों में राजपूती जूता, दाढ़ी चढ़ी हुई और धोती मारवाड़ के
तर्ज़ पर बँधी हुई है ! सच यह है कि जो पुस्तकें भारत के इतिहास पर
स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई जाती हैं, उनमें तारीख़ों, राजाओं के नामों
या अत्यन्त मोटी मोटी घटनाओं को छोड़ कर बाक़ी बातों में से कम से
कम ६० फ़ी सदी का मूल्य एक साधारण उपन्यास से अधिक नहीं है, और
वह भी निहायत ख़तरनाक उपन्यास, जिसका असर क़ौम के बढ़ते हुए
दिमाग़ों पर अत्यन्त ज़हरीला पड़ता है।
किराये के लेखक
निस्सन्देह कुछ भारतीय विद्वानों के लिखे हुए इसी समय के ऐति-
हासिक वृत्तान्त एक दरजे तक ज़्यादा सच्चे और विश्वसनीय हैं। किन्तु
एक तो इस तरह के वृत्तान्त हैं ही बहुत कम और फुटकर, और दूसरे
इनके सम्बन्ध में हमें एक और गहरी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
फ़ारसी का ग्रन्थ 'सोअरुल मुताख़रीन' भारतीय मुग़ल साम्राज्य के
अन्तिम दिनों का ख़ासा विश्वस्त इतिहास माना जाता है और है भी।
फिर भी इस ग्रन्थ का विद्वान रचयिता सय्यद गुलाम हुसेन अपने ग्रन्थ में
स्वीकार करता है कि सम्राट शाहआलम और अंगरेज़ों के संग्रामों के दिनों
में उसे लोभ देकर अंगरेज़ों ने अपनी ओर मिला लिया था। निस्संदेह
१६ पुस्तक प्रवेश
उस ज़माने का उसका सारा वृत्तान्त अंगरेज़ों के एक धनक्रीत लेखक का
लिखा वृत्तान्त है ।
और भी अनेक भारतीय और अन्य लेखकों को फ़ारसी और दूसरी
भाषाओं में झूठे ऐतिहासिक वृत्तान्त लिखने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी
की ओर से समय समय पर धन मिलता रहा है । मिसाल के तौर पर
लॉर्ड विलियम बेण्टिङ्क ने ऐबे दुबॉय का प्रसिद्ध फ़्रान्सीसी ग्रन्थ, जिसमें
हिन्दुओं के उस समय के रहन सहन इत्यादि का ज़िक्र है, आठ हज़ार
रुपये देकर दुबॉय से ख़रीदा, कम्पनी की ओर से उसे अंगरेज़ी में प्रकाशित
कराया और अन्त में कम्पनी ने उसके लिए दुबॉय को आजीवन पेनशन
दी । हैदरअली की एक फ़ारसी जीवनी लिखने के लिए मिरज़ा इक़बाल को
कम्पनी की ओर से रुपए दिए गए । हैदरअली की यह जीवनी शुरू से
आख़ीर तक झूठे कलङ्कों और पक्षपात से भरी हुई है । करनल माइल्स ने
हैदरअली की एक जीवनी अंगरेज़ी में लिखी है, जिसके विषय में करनल
माइल्स का बयान है कि वह पुस्तक मीर हुसेनअली ख़ाँ किरमानी की
फ़ारसी पुस्तक 'निशाने हैदरी' का अनुवाद है और 'निशाने हैदरी' का मूल
फ़ारसी मसविदा मलका विक्टोरिया के निजी पुस्तकालय में मौजूद था ।
हमने करनल माइल्स की पुस्तक को पढ़ा । हम यह देख कर चकित रह गए
कि उस पुस्तक के अन्दर पृष्ठ के पृष्ठ ऐसे हैं, जिनका एक एक शब्द एक
फ़्रान्सीसी लेखक एम० एम० डी० एल० टी० के ग्रन्थ 'हिस्ट्री ऑफ़ हैदरशाह'
के एक अंगरेज़ी संस्करण के कुछ पृष्ठों से मिलता है । यह फ़्रान्सीसी किताब
हैदरअली के जीवनकाल में लिखी गई थी । मीर हुसेनअली ख़ाँ किरमानी
की किताब ज़ाहिर है उसके बाद की लिखी हुई है । यदि फ़ारसी लेखक ने
लेखक की कठिनाइयां १७
फ्रान्सीसी किताब से या उसके अंगरेज़ी अनुवाद से ये पृष्ठ लिए होते तो यह
नामुमकिन था कि फ़ारसी से अङ्गरेज़ी तर्जुमा करने में ठीक वही शब्द ज्यूँ के
त्यूँ लिखे जा सकते। ज़ाहिर है कि मीर हुसेनअली ख़ाँ का फ़ारसी मसविदा
या तो कहीं है ही नहीं, या कम से कम जिसे कर्नल माइल्स ने उस
मसविदे का अनुवाद कह कर प्रकाशित किया है, वह उस मसविदे का
अनुवाद नहीं है।
इसी तरह की और भी अनेक मिसालें अंगरेज़ों के ज़माने के हिन्दोस्तान
के लिखे हुए इतिहास से दी जा सकती हैं। सच यह है कि आजकल की
यूरोपीय सभ्यता में और ख़ासकर यूरोपीय राजनीति में ईमानदारी या सच
के लिए कोई जगह नहीं, और यूरोपीय इतिहास कला बहुत दरजे तक
यूरोपीय राजनीति का केवल एक अङ्ग है। प्रोफेसर सीली, प्रोफेसर गोल्ड-
विन स्मिथ और इतिहास लेखक फ़्रीमैन जैसे यूरोपियन विद्वानों ने इतिहास
को केवल राजनीति का एक अङ्ग स्वीकार किया है। और 'Politics has
no conscience,' यानी 'राजनीति में पाप पुण्य के विवेक का कोई
स्थान नहीं', अंगरेज़ी की एक मशहूर कहावत है। ꕤ
• इस तरह के झूठे और कल्पित इतिहास का नतीजा हमारी क़ौमी
ꕤ पिछले साल एच० डी० लैसवेल की लिखी 'प्रोपैगैंडा टेकनीक इन
वर्ल्ड वार' नामक एक पुस्तक प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक में साफ़ लिखा
है कि आगामी महायुद्ध के लिये युद्धविद्या, शस्त्राभ्यास इत्यादि के साथ
साथ समस्त राजनीतिज्ञों, शासकों और सेनापतियों को झूठ बोलने की विद्या
का भी बाज़ाब्ता वैज्ञानिक अध्ययन करना चाहिये। लेखक के अनुसार पिछले
महायुद्ध के दिनों में झूठ बोलने की कला में सब से अधिक सफलता
२
१८ पुस्तक प्रवेश
ज़िन्दगी के लिये और ख़ास कर हमारे शिक्षित देशवासियों की मानसिक
अवस्था पर इतना गहरा पड़ा है कि आज हमारी क़ौमी तरक्क़ी के मार्ग में
यही सबसे बड़ी बाधा दिखाई दे रही है। इसके अलावा अनेक भयङ्कर
ऐतिहासिक भ्रान्तियों और झूठों का स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों और अन्य
उपायों द्वारा इतना ज़्यादा प्रचार किया गया है कि आज हमारे असंख्य
विचारवान देशवासी इन ऐतिहासिक भ्रान्तियों की भूलभुलइयों में पड़
कर अपनी सलामती के उपायों को सोच सकने के बिलकुल नाक़ाबिल
हो रहे हैं।
हमारे इतिहास के भ्रम
कहा जाता है, अनादिकाल से भारत पर पश्चिमोत्तर सीमा की ओर
से विदेशियों या विदेशी जातियों के हमले होते रहे हैं, भारत कभी भी इन
आरम्भ में इङ्गलिस्तान ने दिखाई, उसके बाद अमरीका इस कला में
इंगलिस्तान से भी बढ़ गया । वह लिखता है—
"राष्ट्रपति विल्सन ने इस कला में जो दक्षता दिखलाई वह संसार के
इतिहास में अद्वितीय है ।” लेखक ने पिछले महायुद्ध के समय के अंगरेज़ों
के कई प्रसिद्ध झूठों की मिसालें दी हैं ! मसलन संसार के अख़बारों में छपा
था कि जरमन सिपाहियों ने बेल्जियम वालों के अनेक बच्चों के हाथ काट
डाले । यह बात शुरू से आख़ीर तक झूठी थी । इस ख़बर के सम्बन्ध में युद्ध
के समाप्त होने पर इतालियों के प्रधान-मन्त्री सीन्योर नित्ती ने लिखा था—
"युद्ध के बाद एक धनाढ्य अमरीकन ने अपना एक दूत इस उद्देश
से बेल्जियम भेजा कि जिन ग़रीब बालकों के नन्हें नन्हें हाथ काट डाले
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लेखक की कठिनाइयां १६
हमलों से अपनी रक्षा नहीं कर सका और एक दूसरे के बाद लगातार
मुख़्तलिफ़ विदेशी शासनों का शिकार होता रहा है। कहा जाता है कि
इस तरह के विदेशी हमलों में भारत के ऊपर सबसे अधिक भयङ्कर हमला
मुसलमानों का था। भारत के मुसलमान आक्रमक असभ्य, धर्मान्ध और
अन्यायी थे, जिन्होंने अंगरेज़ों के आने से पहले क़रीब एक हज़ार साल तक
भारतवर्ष को अपने अत्याचारों से कुचले रक्खा; प्राचीन हिन्दू धर्म और
हिन्दू संस्कृति का सत्यानाश कर डाला और हमारे करोड़ों देशवासियों को
तलवार के ज़ोर से धर्मभ्रष्ट कर मुसलमान बना लिया। हमसे कहा जाता
गये हैं, उनकी जीविका का प्रबन्ध कर दिया जाय। इस दूत को एक भी
इस तरह का बालक नहीं मिल सका। जिन दिनों मैं इतालिया सरकार का
प्रधान मन्त्री था, मैंने और मिस्टर लायड जार्ज ने मिल कर इन भीषण
इलज़ामों की सत्यता का पता लगाने के लिए विस्तृत छान बीन की। इनमें
से कम से कम कई इलज़ामों के साथ मनुष्यों और स्थानों के नाम तक हमें
बताये गये थे। किन्तु हमारे छान बीन करने पर ये तमाम क़िस्से झूठे
निकले।"—"विशाल भारत" अगस्त १६२८ ।
एक दूसरी बात यह भी कही गई थी कि जरमनी में एक कारख़ाना
खुला है, जिसमें सिपाहियों की लाशों को उबाल कर उनसे साबुन और
ग्लिसरीन बनाया जाता है। इस कारख़ाने के फ़ोटो तक अंगरेज़ी अख़बारों
में छपे थे। "सन् १६२५ में जाकर इस असत्य समाचार की पोल खुली।
जरमन सरकार ने एलान किया कि यह एक बिलकुल झूठा क़िस्सा है और
इसमें सच का नामनिशान तक नहीं। आखिर इंगलिस्तान के वैदेशिक
विभाग के मन्त्री सर आस्टिन चैम्बरलेन को जरमनी का यह कथन स्वीकार
२० पुस्तक प्रवेश
है कि भारत के इन मुसलमान शासकों में सिवाय अय्याशी, लूट मार
और धर्मान्धता के और कोई विशेषता न थी। यहाँ तक कि बड़े से बड़े या
अच्छे से अच्छे मुग़ल बादशाहों को हिन्दुओं और हिन्दोस्तान के लिए
अधिक से अधिक 'मीठी छुरी' कह कर बयान किया जाता है। हमें विश्वास
दिलाया जाता है कि मुसलमानों ने कोई भी उपकार भारत पर नहीं किया,
उनके शासन में कोई बात तारीफ़ की न थी, उन्होंने भारत के राष्ट्रीय
जीवन को हर तरह से नुक़सान पहुँचाया और आज तक हिन्दुओं और
मुसलमानों में कभी भी वास्तविक मेल न हुआ और न हो सकता है। जो
इतिहास स्कूलों में पढ़ाए जाते हैं उनमें दिखाया जाता है कि अंगरेज़ों के
कर लेना पड़ा और उसने कहा भी—'I trust that this false
report will not again be revived.' यानी 'मैं विश्वास करता
हूं कि इस झूठी अफ़वाह को अब कोई न दोहराएगा।'
इसी तरह के और भी बेशुमार झूठ उन दिनों जरमनों के विरुद्ध
अंगरेजों और मित्र राष्ट्रों की ओर से प्रकाशित होते रहते थे ।
ऐसी ही एक दूसरी पुस्तक "फ़ाल्सहुड इन वार टाइम" इंगलिस्तान
की पार्लिमेण्ट के मेम्बर आर्थर पॉन्सन्बी ने हाल में प्रकाशित की है।
पॉन्सन्बी इंगलिस्तान के मन्त्रिमण्डल में वैदेशिक विभाग का उपमन्त्री रह
चुका है। इस पुस्तक की आलोचना करते हुए पार्लिमेण्ट के एक दूसरे
प्रसिद्ध सदस्य बिलफ़्रेड वेलॉक ने अगस्त सन् १६२८ के "विशाल-भारत"
में लिखा है—
"इस पुस्तक में यह बात अकाट्य प्रमाणों द्वारा सिद्ध की गई है
कि पिछले महायुद्ध का सञ्चालन झूठ और फ़रेब के ज़रिये किया गया था
लेखक की कठिनाइयां २१
आने से पहले भारत में चारों ओर कुशासन और अराजकता '
और आए दिन आपसी लड़ाइयाँ होती रहती थीं, अंगरेज़ों ने, जो उस
समय भारतवासियों से कहीं अधिक सभ्य थे, भारत में आकर शान्ति और
सुशासन क़ायम किया और देश को सभ्यता की ओर ले जाना शुरू किया।
इन्हीं सब बातों के आधार पर और वर्त्तमान अंगरेज़ी सत्ता के सच्चे रूप को
हमसे छिपा कर हमें यह यक़ीन दिलाया जाता है कि अंगरेज़ों का भारतीय
शासन भारतवासियों के लिए एक बहुत बड़े सौभाग्य की चीज़ है और
हमारी सारी भावी उन्नति तथा देश की शान्ति अंगरेज़ी शासन के इस देश
में बने रहने पर निर्भर है। यदि आज दुर्भाग्यवश अंगरेज़ी शासन भारत से
मिट जाय तो सम्भव है कि या तो पश्चिमोत्तर की ओर से कोई दूसरी शक्ति
आकर भारत पर क़ब्ज़ा कर ले या हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे से लड़
लड़ कर देश को फिर बरबादी की ओर ले जायँ !
इन सब बातों के जवाब में हम यह दिखलाने का प्रयत्न करेंगे कि
और आरम्भ से लेकर अन्त तक युद्ध के उद्देश्यों के विषय में संसार की
जनता को धोखे में रक्खा गया।”
"यदि संसार में कोई युद्ध ऐसा हुआ है, जो ऊपर से देखने में धर्म के
भावों से प्रेरित मालूम होता था, तो वह पिछला महायुद्ध था। कम से कम
मित्र दल वाले यही कहते थे कि हम धार्मिक युद्ध कर रहे हैं । मित्रों की
ओर से यह एलान किया गया था कि हम लोग छोटी छोटी जातियों की
स्वाधीनता के लिए और सन्धियों की पवित्रता की रक्षा के लिए युद्ध कर रहे
हैं । हमारा उद्देश सैनिक शासन ( Militarism ) को दूर करना है !
“कैसी धोखेबाज़ी थी ! कैसा पाखण्ड था ! कैसा झूठ था !”
२२ पुस्तक प्रवेश
अंगरेज़ों के आने से पहले भारत के ऊपर अन्य विदेशियों के हमले कितने,
कब कब और किस ढङ्ग के हुए और भारत ने उनका कहाँ तक सफलता
के साथ मुक़ाबला किया। हम यह भी दिखलाएँगे कि बाहर से इस तरह
के हमलों का होना भारत ही की एक विशेषता है या संसार के अन्य देशों
के इतिहास में भी यह एक सामान्य घटना है। हम यह भी दिखाएँगे कि
यूरोप के विविध देशों और स्वयं इङ्गलिस्तान के ऊपर इस तरह के हमले
कभी हुए हैं या नहीं, यदि हुए हैं तो कितने और यूरोप के देशों ने उन
हमलों का भारत की निस्बत अधिक सफलता के साथ मुक़ाबला किया है
या नहीं। हम यह भी बयान करेंगे कि भारत पर मुसलमानों के हमले से
पहले यूरोप के विविध देशों पर भी मुसलमानों के हमले हुए थे या नहीं,
और यदि हुए थे तो यूरोपियन देशों ने भारत की तुलना में उनका किस
तरह मुक़ाबला किया। हम इस बात की भी पूरी जाँच करना चाहेंगे कि
भारत के ऊपर मुसलमानों के हमले किस ढङ्ग के थे, भारत के लिए उन हमलों
के नतीजे क्या हुए, भारत के अन्दर इसलाम मत का प्रचार वास्तव में किस
ढङ्ग से और किन उपायों द्वारा किया गया, हिन्दुओं के साथ भारत के
मुसलमान शासकों का व्यवहार आद्योपान्त किस ढङ्ग का रहा, दोनों धर्मों
के क़रीब क़रीब एक हज़ार साल के सम्पर्क में भारत भर के अन्दर हिन्दुओं
और मुसलमानों में किस तरह का सम्बन्ध रहा। शिल्प, विज्ञान, शिक्षा,
चित्रकला, कृषि, व्यापार, उद्योग धन्धों, सुशासन और समृद्धि की दृष्टि से
भारत ने मुसलमानों के शासन में कहाँ तक उन्नति या अवनति की,
अंगरेज़ों के सम्पर्क के समय सभ्यता के विविध अङ्गों में भारत की क्या
अवस्था थी, इङ्गलिस्तान की उस समय क्या हालत थी, किन कारणों से
वे और हम २३
और किन उपायों द्वारा अंगरेज़ों का राज भारत में क़ायम हुआ, भारत के
लिए उसके क्या नतीजे हुए और भविष्य में उससे छुटकारा पाने की किस
तरह आशा की जा सकती है ।
वे और हम
१७ वीं सदी का इंगलिस्तान
वास्तव में भारत और इङ्गलिस्तान का सम्पर्क दो अलग अलग सभ्य-
ताओं और अलग अलग आदर्शों का एक दूसरे से टकराना था । इसलिए
और बातों से पहले हम उस समय के इङ्गलिस्तान की हालत का, जब कि
हिन्दोस्तान और इङ्गलिस्तान का पहली बार सम्पर्क हुआ, संक्षिप्त बयान दे
देना चाहते हैं ।
१६ वीं और १७ वीं सदी के इंगलिस्तान की हालत को बयान करते
हुए प्रसिद्ध इतिहासज्ञ ड्रेपर लिखता है—
“किसानों की झोपड़ियाँ नरसलों और छड़ियों की बनी हुई
होती थीं जिनके ऊपर गारा फेर दिया जाता था । घर में आग
घास जला कर तैयार की जाती थी और धुएँ के निकलने के लिए
कोई जगह न होती थी । जिस तरह का सामान उस समय के
एक अंगरेज़ किसान के घर में होता था, और जिस तरह से वह
ज़िन्दगी बसर करता था, उससे मालूम होता था कि गाँव के
पास नदी के किनारे जो ऊदबिलाव मेहनत से माँद बना कर
२४ पुस्तक प्रवेश
रहता था, उस ऊदबिलाव की हालत में और उस किसान की
हालत में ज़्यादा फ़र्क़ न था। सड़कों पर डाकू फिरते रहते थे,
नदियों पर समुद्री लुटेरे और लोगों के कपड़ों और बिस्तरों में
जुएँ। आम तौर पर लोगों की ख़ुराक होती थी—मटर, उड़द,
जड़ें और वृक्षों की छालें। कोई ऐसा धन्धा न था, न कोई
तिजारत थी जिससे बारिश न होने की सूरत में किसान दुष्काल
से बच सके। मौसम की सख़्ती से बचने का मनुष्यों के पास
बिल्कुल कोई उपाय न था। आबादी बहुत कम थी, और महा-
मारी और अन्न के अभाव से और घटती रहती थी। शहर के
लोगों की हालत भी गाँव के लोगों से कुछ अच्छी न थी। शहर
वालों का बिछौना भुस का एक थैला होता था और तकिये की
जगह लकड़ी का एक गोल टुकड़ा। जो शहर वाले खुशहाल होते
थे वे चमड़े के कपड़े पहनते थे, जो ग़रीब होते थे वे अपने हाथ
और पैरों पर पवाल की पूलियाँ लपेट कर अपने को सरदी से बचाते
थे। × × × जिन शहरों में शीशे की या तैल पत्र की कोई खिड़की
तक न होती थी, वहाँ किसी तरह के कारीगर के लिए कहाँ
गुञ्जाइश थी। कहीं कोई कारख़ाना न था, जिसमें कोई कारीगर
आराम से बैठ सके। ग़रीबों के लिए कोई वैद्य न था। × × ×
सफ़ाई का कहीं कोई इन्तज़ाम था ही नहीं।”
आगे चल कर उस समय के यूरोप के सदाचार को बयान करते हुए
ड्रेपर लिखता है—
“जिस तेज़ी के साथ गरमी की बीमारी उन दिनों तमाम
वे और हम २४
यूरोप में फैली, उससे इस बात का साफ़ पता चलता है कि लोगों
में दुराचार कितने भयंकर रूप में फैला हुआ था । यदि हम उस
समय के लेखकों पर विश्वास करें तो विवाहित या अविवाहित,
ईसाई पादरी या मामूली गृहस्थ, पोप लियो दसवें से लेकर गली
के भिखमंगे तक—कोई वर्ग ऐसा न था जो इस रोग से बचा रहा
हो । × × × इंग्लिस्तान की आबादी पचास लाख से भी कम
थी । × × × किसान थपनी ज़मीन का मालिक न होता था ।
ज़मीन ज़मींदार की होती थी और किसान केवल उसका मज़दूर
और चौकीदार होता था । ऐसी हालत में दूसरे देशों की तिजारत
ने समाज में हलचल मचानी शुरू की । आबादी इधर से उधर
आने जाने लगी । दूसरे देशों से तिजारत करने के लिए कम्पनियाँ
बनाई गईं । ये अफ़वाहें या ख़बरें सुन कर कि दूसरे देशों में
जाकर जल्दी से ख़ूब धन कमाया जा सकता है, लोगों के दिमाग़
फिरने लगे × × × सारी अंगरेज़ क़ौम इतनी बेपढ़ी थी कि
पार्लिमेण्ट के बहुत से हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स के मेम्बर तक न लिख
सकते थे और न पढ़ सकते थे × × × ईसाई पादरियों में भयंकर
दुराचार फैला हुआ था । खुले तौर पर कहा जाता था कि
इंग्लिस्तान में एक लाख औरतें ऐसी हैं, जिन्हें पादरियों ने
ख़राब कर रक्खा है । × × × कोई पादरी यदि बुरे से बुरा भी
जुर्म करता था तो उसे केवल थोड़ा सा जुरमाना देना पड़ता था ।
मनुष्य हत्या के लिए पादरियों को केवल छै शिलिंग आठ पेन्स
( क़रीब पाँच रुपए ) जुरमाना देना पड़ता था । × × × सत्रहवीं
२६ पुस्तक प्रवेश
सदी के अन्त में लन्दन का शहर गन्दा था, मकान भद्दे बने हुए
थे और सफ़ाई का कोई इन्तज़ाम न था । × × × जंगली जानवर
हर जगह फिरते थे । × × × बरसात में सड़कें इतनी ख़राब हो
जाती थीं कि उन पर से चलना मुश्किल था । × × × देहात में
अक्सर जब लोग रास्ता भूल जाते थे तो उन्हें रात रात भर बाहर
ठण्डी हवा में रहना पड़ता था । ख़ास ख़ास नगरों के बीच में भी
कहीं कहीं सड़कों का पता न होता था, जिसकी वजह से पहिये-
दार गाड़ियों का चल सकना इतना कठिन था कि लोग ज़्यादातर
लद्दू टट्टुओं के पालानों में दाएँ और बाएँ असबाब के साथ साथ
और असबाब की तरह लद कर एक जगह से दूसरी जगह आते
जाते थे । × × × सत्रहवीं सदी के अन्त में जाकर तेज़ से तेज़
गाड़ी दिन भर में तीस मील से पचास मील तक चल सकती थी
और वह “उड़ने वाली गाड़ी” कहलाती थीं । × × × टाइन
नदी के स्रोत पर जो लोग रहते थे वे अमरीका के आदिमवासियों
से कम जंगली न थे । उनकी स्त्रियाँ आधी नंगी जंगली गाने
गाती फिरती थीं, और पुरुष अपनी कटार घुमाते हुए लड़ाइयों के
नाच नाचते थे । × × × जब कि पुरुषों ही की यह हालत थी
कि उनमें से बहुत थोड़े ठीक ठीक लिखना जानते थे तो यह सोचा
जा सकता है कि स्त्रियाँ कितनी अनपढ़ रही होंगी । × × ×
समाज की व्यवस्था में जिसे हम सदाचार कहते हैं उसका कहीं
पता न था । × × × पति अपनी पत्नी को कोड़ों से पीटता था
× × × अपराधियों को टिकटिकी से बाँध कर पत्थर मार मार
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कर मार डाला जाता था। औरतों की टाँगों को सरे बाज़ार
शिकओं में कस कर छोड़ दिया जाता था। × × × लोगों के
दिल अत्यन्त सख़्त हो गए थे × × × गाँव के लोगों के मकान
झोपड़े होते थे जिन पर फूस छाया हुआ होता था। × × ×
लन्दन में मकान अधिकतर लकड़ी और प्लास्टर के होते थे,
गलियाँ इतनी गन्दी होती थीं कि बयान नहीं किया जा सकता।
शाम होने के बाद डर के मारे कोई अपने घर से न निकलता
था, क्योंकि जो चाहे अपने ऊपर के कमरे से खिड़की खोल कर
बेखटके गन्दा पानी नीचे फेंक देता था। × × × लन्दन की
गलियों में लालटेनों का कहीं निशान न था। उच्च श्रेणी के लोगों
में सदाचार की आमतौर पर यह हालत थी कि उनमें यदि कोई
भी मनुष्य मरता था तो लोग यही समझते थे कि किसी ने ज़हर
देकर मार डाला × × × सारे देश पर दुराचार की एक बाढ़
आई हुई थी।”
विचार स्वातंत्र्य के विषय में ड्रेपर लिखता है—
ऑक्सफ़ोर्ड की विद्यापीठ ने यह आज्ञा दे दी कि बकेनन,
मिल्टन और बेक्सटर की राजनैतिक पुस्तकें स्कूलों के आँगनों में
खुले जला दी जायें। × × × राजनैतिक या धार्मिक अपराधों
के बदले में जिस तरह की सख़्त सज़ाएँ दी जाती थीं उन पर
बिश्वास होना कठिन है। लन्दन में टेम्स नदी के पुराने टूटे हुए
पुल पर इस तरह के अपराधियों के डरावने सिर काट कर लटका
दिए जाते थे, इसलिए कि उस भयङ्कर दृश्य को देख कर जन
२८ पुस्तक प्रवेश
सामान्य क़ानून के विरुद्ध जाने से रुके रहें। उस समय की उदा-
रता का अन्दाज़ा उस एक क़ानून से लगाया जा सकता है, जो
८ मई सन् १६८५ को स्कॉटलैण्ड की पार्लिमेण्ट ने पास किया।
क़ानून यह था कि जो कोई मनुष्य सिवाय बादशाह की सम्प्रदाय
के दूसरी किसी ईसाई सम्प्रदाय के गिरजे में जाकर उपदेश देगा
या उपदेश सुनेगा, उसे मौत की सज़ा दी जायगी, और उसका
माल असबाब ज़ब्त कर लिया जायगा। इस बात के काफ़ी से
ज़्यादा सबूत हमारे पास मौजूद हैं कि इस तरह के निन्दनीय
भाव केवल क़ानूनों के अक्षरों में ही बन्द न रह जाते थे। × × ×
स्कॉटलैण्ड में कवेनेण्टर (एक ईसाई सम्प्रदाय) लोगों के घुटनों
को शिकंजों के अन्दर कुचल कर तोड़ दिया जाता था और वे
दुःख से पड़े चिल्लाते रहते थे; स्त्रियों को लकड़ियों से बाँध कर
समुद्र के किनारे रेत पर छोड़ दिया जाता था और धीरे धीरे
बढ़ती हुई लहरें उन्हें बहा ले जाती थीं, केवल इस अपराध में
कि वे सरकार के बताए हुए गिरजे में जाने से इनकार करती थीं,
या उनके गालों को दाग़ कर उन्हें जहाज़ों में बन्द करके ज़बर-
दस्ती गुलाम बनाकर अमरीका भेज दिया जाता था। × × ×
राजकुल की स्त्रियाँ यहाँ तक कि स्वयं इङ्गलिस्तान की मलका तक
स्त्रियोचित दयाभाव और मामूली मनुष्यत्व तक को भूल कर
गुलामों के इस क्रय-विक्रय के नारकीय व्यापार में हिस्सा लेती
थीं × × ×।" ꕤ
- "The peasant's cabin was made of reeds or sticks plastered over
वे और हम २६
उस समय के भारत से तुलना
ऊपर के लम्बे बयान से उस ज़माने के इङ्गलिस्तान के गांवों और
शहरों की हालत, मकानों, सड़कों, रहन सहन, धन्धों, कचहरियों, धार्मिक
विचारों, शिक्षा और सदाचार इत्यादि का पूरा पूरा पता चलता है। हमें यह
भी याद रखना चाहिए कि यह वह ज़माना था, जब कि हिन्दोस्तान में
कबीर और दादू के उदार धार्मिक विचार, अकबर का विश्वप्रेम, जहाँगीर का
न्यायशासन, शाहजहाँ के समय की ख़ुशहाली और आश्चर्यजनक कलाकौशल
संसार भर के यात्रियों को चकाचौंध कर रहे थे, जब कि भारत में दर्जनों
नगर सुन्दर से सुन्दर इमारतों से सुसज्जित और अत्यन्त घने बसे हुए थे,
जब कि दिल्ली और आगरे के क़िले और ताजमहल जैसी इमारतें बन
with mud. His fire was chimney-less—often it was made of peat. In the
objects and manner of his existence he was but a step above the industrious
beaver who was building his dam in the adjacent stream. There were high-
waymen on the roads, pirates on the rivers, vermin in abundance in the
clothing and beds. The common food was peas, vetches, fern roots and
even the bark of trees. There was no commerce to put off famine. Man
was altogether at the mercy of the seasons. The population, sparse as it
was, was perpetually thinned by pestilence and want. Nor was the state of
the townsman better than that of the rustic; his bed was a bag of straw,
with a hard round log for his pillow. If he was in easy circumstances, his
clothing was of leather, if poor, a wisp of straw wrapped round his limbs
kept off the cold. . . . . As to the mechanic, how was it possible that he
could exist where there were no windows made of glass, not even of oiled
paper, no workshop warmed by a fire. For the poor there was no physician
. . . Sanitary provisions there were none. . . the rapidity of its
(syphilis') spread all over Europe is a significant illustration of the fearful
immorality of the times. If contemporary authors are to be trusted, there
was not a class, married or unmarried, clergy or laity, from the holy father,
Leo X, to the begger by the wayside, free from it. . . . Its (England's)