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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 52

२६ पुस्तक प्रवेश
सदी के अन्त में लन्दन का शहर गन्दा था, मकान भद्दे बने हुए
थे और सफ़ाई का कोई इन्तज़ाम न था । × × × जंगली जानवर
हर जगह फिरते थे । × × × बरसात में सड़कें इतनी ख़राब हो
जाती थीं कि उन पर से चलना मुश्किल था । × × × देहात में
अक्सर जब लोग रास्ता भूल जाते थे तो उन्हें रात रात भर बाहर
ठण्डी हवा में रहना पड़ता था । ख़ास ख़ास नगरों के बीच में भी
कहीं कहीं सड़कों का पता न होता था, जिसकी वजह से पहिये-
दार गाड़ियों का चल सकना इतना कठिन था कि लोग ज़्यादातर
लद्दू टट्टुओं के पालानों में दाएँ और बाएँ असबाब के साथ साथ
और असबाब की तरह लद कर एक जगह से दूसरी जगह आते
जाते थे । × × × सत्रहवीं सदी के अन्त में जाकर तेज़ से तेज़
गाड़ी दिन भर में तीस मील से पचास मील तक चल सकती थी
और वह “उड़ने वाली गाड़ी” कहलाती थीं । × × × टाइन
नदी के स्रोत पर जो लोग रहते थे वे अमरीका के आदिमवासियों
से कम जंगली न थे । उनकी स्त्रियाँ आधी नंगी जंगली गाने
गाती फिरती थीं, और पुरुष अपनी कटार घुमाते हुए लड़ाइयों के
नाच नाचते थे । × × × जब कि पुरुषों ही की यह हालत थी
कि उनमें से बहुत थोड़े ठीक ठीक लिखना जानते थे तो यह सोचा
जा सकता है कि स्त्रियाँ कितनी अनपढ़ रही होंगी । × × ×
समाज की व्यवस्था में जिसे हम सदाचार कहते हैं उसका कहीं
पता न था । × × × पति अपनी पत्नी को कोड़ों से पीटता था
× × × अपराधियों को टिकटिकी से बाँध कर पत्थर मार मार