भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ पुस्तक प्रवेश
सामान्य क़ानून के विरुद्ध जाने से रुके रहें। उस समय की उदा-
रता का अन्दाज़ा उस एक क़ानून से लगाया जा सकता है, जो
८ मई सन् १६८५ को स्कॉटलैण्ड की पार्लिमेण्ट ने पास किया।
क़ानून यह था कि जो कोई मनुष्य सिवाय बादशाह की सम्प्रदाय
के दूसरी किसी ईसाई सम्प्रदाय के गिरजे में जाकर उपदेश देगा
या उपदेश सुनेगा, उसे मौत की सज़ा दी जायगी, और उसका
माल असबाब ज़ब्त कर लिया जायगा। इस बात के काफ़ी से
ज़्यादा सबूत हमारे पास मौजूद हैं कि इस तरह के निन्दनीय
भाव केवल क़ानूनों के अक्षरों में ही बन्द न रह जाते थे। × × ×
स्कॉटलैण्ड में कवेनेण्टर (एक ईसाई सम्प्रदाय) लोगों के घुटनों
को शिकंजों के अन्दर कुचल कर तोड़ दिया जाता था और वे
दुःख से पड़े चिल्लाते रहते थे; स्त्रियों को लकड़ियों से बाँध कर
समुद्र के किनारे रेत पर छोड़ दिया जाता था और धीरे धीरे
बढ़ती हुई लहरें उन्हें बहा ले जाती थीं, केवल इस अपराध में
कि वे सरकार के बताए हुए गिरजे में जाने से इनकार करती थीं,
या उनके गालों को दाग़ कर उन्हें जहाज़ों में बन्द करके ज़बर-
दस्ती गुलाम बनाकर अमरीका भेज दिया जाता था। × × ×
राजकुल की स्त्रियाँ यहाँ तक कि स्वयं इङ्गलिस्तान की मलका तक
स्त्रियोचित दयाभाव और मामूली मनुष्यत्व तक को भूल कर
गुलामों के इस क्रय-विक्रय के नारकीय व्यापार में हिस्सा लेती
थीं × × ×।" ꕤ
- "The peasant's cabin was made of reeds or sticks plastered over