भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवे और हम २४
यूरोप में फैली, उससे इस बात का साफ़ पता चलता है कि लोगों
में दुराचार कितने भयंकर रूप में फैला हुआ था । यदि हम उस
समय के लेखकों पर विश्वास करें तो विवाहित या अविवाहित,
ईसाई पादरी या मामूली गृहस्थ, पोप लियो दसवें से लेकर गली
के भिखमंगे तक—कोई वर्ग ऐसा न था जो इस रोग से बचा रहा
हो । × × × इंग्लिस्तान की आबादी पचास लाख से भी कम
थी । × × × किसान थपनी ज़मीन का मालिक न होता था ।
ज़मीन ज़मींदार की होती थी और किसान केवल उसका मज़दूर
और चौकीदार होता था । ऐसी हालत में दूसरे देशों की तिजारत
ने समाज में हलचल मचानी शुरू की । आबादी इधर से उधर
आने जाने लगी । दूसरे देशों से तिजारत करने के लिए कम्पनियाँ
बनाई गईं । ये अफ़वाहें या ख़बरें सुन कर कि दूसरे देशों में
जाकर जल्दी से ख़ूब धन कमाया जा सकता है, लोगों के दिमाग़
फिरने लगे × × × सारी अंगरेज़ क़ौम इतनी बेपढ़ी थी कि
पार्लिमेण्ट के बहुत से हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स के मेम्बर तक न लिख
सकते थे और न पढ़ सकते थे × × × ईसाई पादरियों में भयंकर
दुराचार फैला हुआ था । खुले तौर पर कहा जाता था कि
इंग्लिस्तान में एक लाख औरतें ऐसी हैं, जिन्हें पादरियों ने
ख़राब कर रक्खा है । × × × कोई पादरी यदि बुरे से बुरा भी
जुर्म करता था तो उसे केवल थोड़ा सा जुरमाना देना पड़ता था ।
मनुष्य हत्या के लिए पादरियों को केवल छै शिलिंग आठ पेन्स
( क़रीब पाँच रुपए ) जुरमाना देना पड़ता था । × × × सत्रहवीं