सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

सिराजुद्दौला ६७
की ख़बर सुनकर और कोई चारा न देख २४ जून की आधी रात
को सिराजुद्दौला केवल अपने तीन अनुचरों सहित महल की
एक खिड़की से होकर फ़क़ीर के वेष में भगवान गोला नामक नगर
की ओर निकल गया।
२५ जून को सबेरे मीर जाफ़र मुर्शिदाबाद पहुँचा, उसके पीछे
पीछे २६ को क्लाइव अपनी सेना सहित मुर्शिदाबाद आया। किन्तु
तीन दिन तक क्लाइव मुर्शिदाबाद से लगभग छै मील बाहर
सय्यदाबाद की फ्रांसीसी कोठी में ठहरा रहा। उसके अपने पत्र
से ज़ाहिर है कि वह इस समय एकाएक मुर्शिदाबाद के शहर में
प्रवेश करने से डरता था।
२६ ता० को मीर जाफ़र से समय निश्चित करके २०० गोरे
और ५०० हिन्दोस्तानी सिपाहियों सहित विजयी क्लाइव ने मुर्शिदा-
बाद के शहर में प्रवेश किया। कुछ दिनों बाद क्लाइव ने पार्लिमेण्ट
की कमेटी के सामने गवाही देते हुए कहा :—
"नगर के लोग, जो उस अवसर पर तमाशा देख रहे थे, कई लाख
अवश्य रहे होंगे; और यदि वे चाहते तो लकड़ियों और पत्थरों से हम
यूरोपियन लोगों को वहीं ख़तम कर सकते थे।"*
यह अनुमान करना अब निरर्थक है कि यदि मुर्शिदाबाद के
बाशिन्दे उस समय ऐसा कर बैठते तो भारत के बाद के इतिहास

  • "That the inhabitants, who were spectators upon that occasion,
    must have amounted to some hundred thousands ; and if they had an inclina-
    tion to have destroyed the Europeans, they might have done it with sticks
    and stones."—Clive's Evidence Before the Parliamentary Committee.
    ७

६८ भारत में अंग्रेज़ी राज
ने किस ओर पलटा खाया होता। इसमें सन्देह नहीं कि उस समय
क्लाइव ने नवाब मीर जाफ़र के एक पक्ष-समर्थक की हैसियत से
मुर्शिदाबाद में प्रवेश किया। बहुत सम्भव है कि यदि नगर निवासियों
को उस समय क्लाइव के वास्तविक रूप का पता होता, यदि
उन्हें मालूम होता कि क्लाइव और उसके साथी इन चालों से अन्दर
ही अन्दर भारत की आज़ादी छीनने की कोशिशें कर रहे हैं, तो
बहुत सम्भव है नगर निवासियों का व्यवहार क्लाइव के साथ कुछ
दूसरा ही होता। किन्तु अभी तो विश्वासघातक मीर जाफ़र की
आँखें खुलने में भी कुछ समय बाक़ी था।
मुर्शिदाबाद की उस समय की अवस्था के विषय में क्लाइव
लिखता है :—
मुर्शिदाबाद उस “मुर्शिदाबाद का शहर उतना ही लम्बा, चौड़ा,
समय और आज आबाद और धनवान है जितना कि लंदन शहर ; फ़र्क़
इतना है कि लंदन के धनाढ्य से धनाढ्य मनुष्य के पास जितनी सम्पत्ति हो
सकती है, उससे बेइन्तहा ज़्यादा सम्पत्ति मुर्शिदाबाद में अनेकों के पास
मौजूद है।”
आज मुर्शिदाबाद भागीरथी नदी के तट पर ३५००० मनुष्यों की
एक छोटी सी बस्ती है, जिसकी आबादी प्रति वर्ष घटती जा रही है
और जिसमें यात्रियों के देखने के लिए पुराने महलों के खंडहर और
कुछ क़बरें मौजूद हैं। उद्योग धन्धों में वहाँ पर रेशमी वस्त्रों की बुनाई,
हाथी दाँत का काम और कपड़े पर सोने चाँदी के काम अभी तक
प्रसिद्ध हैं, किन्तु अब असें से ये सब धन्धे भी मृतप्राय हो रहे हैं।

सिराजुद्दौला ६६
२६ ता० का तीसरा पहर मीर जाफ़र के मसनद पर बैठाए
जाने के लिए नियत था । मालूम होता है उसकी
[हाशिया: मीर जाफ़र का] आत्मा भीतर से अशान्त थी । ऐन मौक़े पर
[हाशिया: मसनद पर बैठाया] उसने सिराजुद्दौला की मसनद पर बैठने से
[हाशिया: जाना] इनकार कर दिया । क्लाइव को उसका हाथ
पकड़ कर उसे मसनद पर बैठाना पड़ा । पहले क्लाइव नए नवाब के
सामने आकर आदाब बजा लाया और फिर बाक़ी दरबारियों ने
दरजा बदरजा सलामियाँ दीं ।*
कम्पनी और उसके मददगारों के लिए अब मुर्शिदाबाद के
[हाशिया: मुर्शिदाबाद की] ख़ज़ाने से अपनी अपनी जेबें भरने का समय
[हाशिया: लूट] आया । ख़ज़ाने की जाँच पड़ताल के लिए एक
दिन नियत किया गया । यह कार्य दोनों जैन
जगतसेठों के सुपुर्द किया गया। क्लाइव और उसके साथियों ने जब
देखा कि मुर्शिदाबाद के ख़ज़ाने की हालत, जो उन्होंने सुन रक्खी
थी वह अब न थी, तो वे इस बात पर राज़ी होगए कि मीरजाफ़र
ने जितना धन उन्हें देने का वादा किया था उसमें आधा फ़ौरन
अदा कर दे और आधा तीन साल के अन्दर तीन क़िस्तों में दे दे ।
क्लाइव का परम मित्र अंगरेज़ इतिहास लेखक और्म लिखता है :—
“ × × × ६ जुलाई सन् १७५७ ईसवी तक ( कलकत्ते की अंगरेज़ )
कमेटी के पास चाँदी के सिक्कों में ७२,७१,६६६ रुपये पहुँच गए । यह
ख़ज़ाना सात सौ सन्दूक़ों में भर कर सौ किश्तियों पर लादा गया । सैनिकों

  • Clive's Letter to the Select Committee, dated 30th June 1757.

१०० भारत में अंगरेज़ी राज
की निगरानी में यह किश्तियाँ नदियां गईं। वहां से (अंगरेज़ी) जंगी
जहाज़ों की तमाम किश्तियों और अन्य किश्तियों को साथ लेकर, झंडे
फहराते हुए और विजय का बाजा बजाते हुए आगे बढ़ीं x x x इससे
पहले कभी भी अंगरेज़ क़ौम को एक साथ इतना अधिक नक़द धन कहीं
किसी लड़ाई में न मिला था।"*
बटवारे के समय छोटे से छोटे अंगरेज़ अफ़सर को कम से कम
[अमींचन्द के साथ] ४५,००० रु० दिए गए; किन्तु अपने हिन्दो-
[दग़ा] स्तानी मददगारों के साथ क्लाइव और उसके
साथियों ने फिर एक बार दग़ा की। इस तमाम
साज़िश में आदि से अन्त तक मुख्यतम हिस्सा अमींचन्द का था।
निस्सन्देह बिना अमींचन्द की सहायता के न बंगाल में अंगरेज़ों
का व्यापार इतना बढ़ पाता, न वे चन्दरनगर विजय कर सकते,
और न सिराजुद्दौला सूबेदारी की मसनद से उतारा जा सकता।
आज ही के दिन की आशा में अमींचन्द ने सिराजुद्दौला के भारतीय
दरबारियों और मुलाज़िमों को विदेशी अंगरेज़ों की ओर से रिश्वतें
देने में अपने धन को पानी की तरह बहाया था। अमींचन्द ने

  • " . . . The committee by the 6th of July 1757 received, in coined
    silver, 72,71,666 rupees. This treasure was packed up in 700 chests and
    laden in 100 boats, which proceeded under the care of soldiers to Nadiya ;
    from whence they were escorted by all the boats of the squadron and many
    others, proceeding with banners displayed and music sounding, of a trium-
    phal procession. . . . Never before did the English nation at one time
    obtain such a prize in solid money."—Orme's History of Indostan, vol. ii.
    pp. 187, 188.

सिराजुद्दौला १०१
अपनी आत्मा के साथ, अपने राजा और मालिक के साथ और
अपनी क़ौम के साथ दग़ा की, किन्तु अंगरेज़ों के साथ उसका
व्यवहार बराबर सच्चा रहा। कहते हैं कि चोर चोर आपस में एक
दूसरे के साथ बड़ा सच्चा व्यवहार करते हैं; किन्तु क्लाइव, वाट्सन
इत्यादि का व्यवहार अमींचन्द के साथ इसके विपरीत रहा।
जो सन्धि अंगरेज़ों ने मीर जाफ़र के साथ की उसमें १३ शर्तें
थीं। अमींचन्द का उनमें कहीं ज़िक्र न था। यह सन्धि सफ़ेद
काग़ज़ पर लिखी हुई थी। उसी के साथ एक दूसरी जाली सन्धि
१४ शर्तों की लाल काग़ज़ पर लिख कर अमींचन्द को दिखाई गई थी,
जिसमें एक १४ वीं शर्त यह भी थी कि मीर जाफ़र को गद्दी दिए
जाने के समय अमींचन्द को ३० लाख नक़द और उसके अलावा
नवाब के तमाम ख़ज़ाने का पाँच फ़ी सैकड़ा दिया जायगा। वाट्सन
ने इस जाली सन्धि पर दस्तख़त करने से इनकार कर दिया था,
किन्तु क्लाइव ने लुशिङ्गटन नामक एक शख़्स के हाथ से वाट्सन के
जाली दस्तख़त उस पर बनवा दिए थे।
मीर जाफ़र के नवाब बन जाने के बाद एक दिन जगतसेठ के
मकान पर जब पहली बार सन्धिपत्र पढ़कर सुनाया गया तो अमीं-
चन्द चकित होकर चिल्ला पड़ा—"यह वह सन्धि नहीं हो सकती,
जो मैंने देखी थी—वह लाल काग़ज़ पर थी।" इस पर क्लाइव ने
शान्ति के साथ उत्तर दिया—"ठीक है अमींचन्द, किन्तु यह सन्धि
सफ़ेद काग़ज़ पर लिखी हुई है।""*


  • Clive's evidence before the Parliamentary Committee.

१७२ भारत में अंगरेज़ी राज
अमींचन्द के दिल पर इस का ज़बरदस्त सदमा हुआ।
बाद में स्वास्थ्य ठीक करने के लिए क्लाइव ने उसे तीर्थयात्रा की
सलाह दी। वह तीर्थयात्रा के लिए गया, किन्तु इसी सदमे से डेढ़
साल के अन्दर अमींचन्द की मृत्यु हो गई।
उन दिनों इंग्लिस्तान में जालसाज़ी की सज़ा मौत थी। किन्तु
क्लाइव ने पालिमेण्ट की कमेटी के सामने बड़े गर्व के साथ अपनी
इस जालसाज़ी का ज़िक्र किया और उसके बदले में क्लाइव को
“लॉर्ड” की उपाधि दी गई, इंग्लिस्तान में क्लाइव का बुत खड़ा
किया गया और उसके सम्मान तथा प्लासी की लड़ाई की यादगार
में तमगे ढाले गए।
चन्द रोज़ के अन्दर सिराजुद्दौला राजमहल नामक स्थान पर
[हाशिया: सिराजुद्दौला की] गिरफ़्तार कर लिया गया। अपने उस वीर तथा
[हाशिया: हत्या] शाही शत्रु के साथ कम्पनी का व्यवहार अत्यन्त
लज्जाजनक रहा। २ जुलाई को वह मुर्शिदाबाद
लाया गया। कहा जाता है कि मीर जाफ़र उसे आदर के साथ
मुर्शिदाबाद में नज़रबन्द रखना चाहता था। किन्तु उसी रात को
एक मनुष्य मोहम्मद बेग ने सिराजुद्दौला को क़त्ल कर डाला।
अगले दिन सिराजुद्दौला का कटा हुआ शरीर हाथी पर रखकर
मुर्शिदाबाद की गलियों में घुमाया गया।
फ़ारसी पुस्तक “रियाज़ुस्सलातीन” का मुसलमान रचयिता
लिखता है :—

सिराजुद्दौला १०३
“अंगरेज़ सरदारों और जगत सेठ की साज़िश से सिराजुद्दौला को क़त्ल
किया गया।”
सिराजुद्दौला की हत्या के दो दिन बाद क्लाइव ने सिलेक्ट कमेटी
के नाम एक पत्र में बड़े गर्व के साथ अपने अंगरेज़ मालिकों को
सूचना दी—
"महाशयगण, सिराजुद्दौला ख़तम हो चुका। नवाब उसकी जान
बख़्शना चाहता था, किन्तु नवाब के पुत्र मीरन और 'बड़े लोगों' ने देश के
अमन के लिए उसे मार डालना ज़रूरी समझा, क्योंकि उसके शहर के पास
आते ही ज़मींदार लोग बलवा करने लगे थे।”
निस्सन्देह इन 'बड़े लोगों' में सब से मुख्य क्लाइव था !
क्लाइव और उसके साथियों के दुष्कृत्यों पर परदा डालने के
[हाशिया: सिराजुद्दौला का] लिए अंगरेज़ इतिहास लेखकों ने आमतौर पर
[हाशिया: चरित्र] झूठे इलज़ामों और नई नई जालसाज़ियों द्वारा
सिराजुद्दौला के चरित्र को कलंकित करने का
पूरा पूरा प्रयत्न किया है। किन्तु सिराजुद्दौला की सच्चाई, उसकी
वीरता, उसके सौजन्य, उसकी योग्यता, उसकी दयानतदारी और
उसकी ईमानदारी में किसी तरह का भी सन्देह नहीं हो सकता ।
वास्तव में उसकी योग्यता के कारण ही इंगलिस्तान के ईसाई
'व्यापारियों' ने अपने और अपनी क़ौम के भावी हित के लिए उसका
नाश करना आवश्यक समझा। उसका वह ख़ज़ाना भी जो चाँदी,
सोने और जवाहरात से लबरेज़ था, इन विदेशियों के लिए काफ़ी
लालच की चीज़ थी। उसमें दोष भी थे और वे दोष थे—विदेशियों

१०४ भारत में अंगरेज़ी राज
की चालों को न समझ सकना, उन पर विश्वास और दया करना
और बार बार उनके साथ अमन से रहने की आशा करना। एक
ओर सिराजुद्दौला के ये व्यक्तिगत दोष, दूसरी ओर भारतीय जनता
में राजनैतिक जागृति और उससे उत्पन्न होने वाले राष्ट्रीयता के
भावों की कमी और तीसरी ओर उच्च श्रेणी के भारतवासियों के
चरित्र की लज्जास्पद स्वार्थपरायणता और विश्वासघातकता—इन
तीनों ने मिलकर न केवल सिराजुद्दौला का ही अंत कर दिया वरन्
सिराजुद्दौला की लाश के साथ साथ भारत की आज़ादी को भी
सदियों के लिए दफ़न कर दिया ।
क़त्ल के समय सिराजुद्दौला की आयु २५ साल की भी न थी ।
समस्त अंगरेज़ इतिहास लेखकों में शायद कर्नल मालेसन ही एक
ऐसा है जिसने सिराजुद्दौला के साथ इन्साफ़ करने की कोशिश
की है । वह लिखता है :—
“सिराजुद्दौला में और चाहे कोई भी दोष क्यों न रहा हो, उसने न
अपने मालिक के साथ विश्वासघात किया और न अपने मुल्क को बेचा।
इतना ही नहीं, वरन् कोई निष्पक्ष अंगरेज़ ६ फ़रवरी और २३ जून के बीच
की घटनाओं पर इन्साफ़ से राय क़ायम करते हुए इस बात से इनकार नहीं
कर सकता कि शराफ़त के पैमाने पर सिराजुद्दौला का नाम क्लाइव के नाम
से ऊँचा नज़र आता है । उस शोकान्त नाटक के प्रधान पात्रों में अकेला एक
सिराजुद्दौला ही ऐसा था जिसने किसी को धोखा देने की कोशिश
नहीं की ।"*

  • "Whatever may have been his faults, Sirajuddowla had neither

सिराजुद्दौला १०५
इस परिस्थिति में और इस तरह के उपायों द्वारा प्लासी के
[हाशिया: पलाशी बाग़ का] सुप्रसिद्ध मैदान में हिन्दोस्तान के अंदर अंगरेज़ी
[हाशिया: अन्त] राज की नींव रक्खी गई, जिसका मुख्य श्रेय
निस्सन्देह क्लाइव ही को मिलना चाहिये ।
सम्भवतः उस दिन की लज्जास्पद स्मृति को मिटाने के लिए कुछ
दिनों बाद प्लासी "पलाशी बाग़" के एक एक वृक्ष का ठूंठ और
उनकी जड़ें तक खोदकर इंगलिस्तान पहुँचा दी गईं।
betrayed his master nor sold his country. Nay more, no unbiassed English-
man, sitting in Judgment on the events which passed in the interval between
the 9th February and the 23rd June can deny that the name of Sirajuddowla
stands higher in the scale of honor than does the name of Clive. He was
the only one of the principal actors in that tragic drama who did not attempt
to deceive."—Decisive Battles of India, p. 71.

तीसरा अध्याय
मीर जाफ़र
विश्वासघात करने वालों में किसी तरह की भी उच्च मानसिक
[हाशिया: हिन्दू-मुसलिम] या नैतिक ख़ूबियों का मिलना क़रीब क़रीब
[हाशिया: पक्षपात का] नामुमकिन है। इसलिए कोई अचरज नहीं कि
[हाशिया: प्रारम्भ] शासक की हैसियत से मीर जाफ़र अयोग्य,
कमज़ोर और अदूरदर्शी साबित हुआ। इसके
अलावा वह इस समय क्लाइव और उसके अंगरेज़ साथियों के हाथों
की कठपुतली था। क्लाइव की इच्छा के ख़िलाफ़ वह कोई काम न कर
सकता था। मुर्शिदाबाद के एक हाज़िर तबियत दरबारी ने मीर
जाफ़र का नाम “कर्नल क्लाइव का गधा” रख रक्खा था और मीर
जाफ़र की मृत्यु के समय तक यह उपाधि उसके साथ लगी रही।
दिल्ली सम्राट का दरबार इस समय तक काफ़ी निर्बल हो चुका

मीर जाफ़र १०७
था और मालूम होता है कि सिराजुद्दौला की मृत्यु के बाद
सूबेदारी की बाज़ाब्ता सनद मीर जाफ़र को दिल्ली दरबार से
अता हो गई।
सिराजुद्दौला का नाना अलीवर्दी ख़ाँ इस बात को समझता था
कि प्रजा के सुख और उनकी खुशहाली को बढ़ाना और बिना मज़हब
इत्यादि का ख़याल किए योग्य आदमियों को राज के उच्च से
उच्च और ज़िम्मेदार ओह्दों पर नियुक करना राजा का धर्म है;
और इस धर्म के पालन करने से ही राज की जड़ें चिरस्थाई हो
सकती हैं। इसलिए अपनी सूबेदारी में क़रीब क़रीब सब ऊँचे ओह्दों
पर उसने हिन्दुओं को नियुक्त कर रक्खा था। सिराजुद्दौला भी
अपने थोड़े से शासनकाल में और ऐसे कठिन समय में, जब कि
उसे रात दिन षड्यंत्रों और साज़िशों का मुक़ाबला करना पड़ता
था, अपने नाना की इस उदार नीति का ठीक ठीक पालन करता
रहा। अलीवर्दी ख़ाँ और सिराजुद्दौला दोनों अपनी हिन्दू और
[L16

१०८ भारत में अंग्रेज़ी राज
जाफ़र इस मामले में क्लाइव और उसके साथियों के इशारे पर चल
रहा था और उन्हीं की संगीनों के बल सब खेल खेल रहा था।
सब से पहले इन लोगों ने मुर्शिदाबाद की सूबेदारी के अधीन
बड़े बड़े प्रान्तों से हिन्दू नरेशों को हटाकर उनकी जगह मुसलमानों
को नियुक्त करने के प्रयत्न शुरू किए।
पहला हिन्दू नरेश, जिसे क्लाइव और मीर जाफ़र ने मिलकर
मिटाना चाहा, बिहार प्रान्त का शासक राजा
राजा रामनारायन रामनारायन था। रामनारायन अलीवर्दी ख़ाँ के
पर हमला ख़ास आदमियों में से था और अलीवर्दी ख़ाँ ने
ही उसे बढ़ाकर इस उच्च पद तक पहुँचाया था। अलीवर्दी ख़ाँ
और सिराजुद्दौला दोनों का रामनारायन सदा वफ़ादार रहा।
सिराजुद्दौला के विरुद्ध जो साज़िश की गई उसमें वह शामिल न था,
किन्तु जब उसने सिराजुद्दौला के मारे जाने और मीर जाफ़र के
मसनद पर बैठने की ख़बर सुन ली तो अपने प्रान्त में भी मीर जाफ़र
की सूबेदारी का बाज़ाब्ता एलान करा दिया।
राजा रामनारायन पर अब यह इलज़ाम लगाया गया कि तुमने
फ़्रान्सीसियों को अपने यहाँ पनाह दे रक्खी है और अवध के नवाब
वज़ीर के साथ मिलकर तुम मीर जाफ़र के ख़िलाफ़ साज़िश कर
रहे हो। निस्सन्देह यह सब क़िस्सा केवल उसे बिहार की गद्दी से
हटाने के लिए गढ़ा गया था।
६ जुलाई सन् १७५७ को क्लाइव के हुकुम से मेजर कूट २३०
गोरे और क़रीब ३०० हिन्दोस्तानी सिपाही लेकर मुर्शिदाबाद से

पटने की तरफ़ रवाना हुआ। पहले बहाना यह लिया गया कि
यह सेना फ्रांसीसियों का पीछे करने के लिए भेजी जा रही है।
किन्तु १२ अगस्त को मेजर कूट के पास क्लाइव का एक पत्र
पहुँचा जिसमें क्लाइव ने उसे यह हिदायत की कि तुम पटने पहुँच
कर मीर जाफ़र के एक भाई महमूद अमीन ख़ाँ के साथ मिलकर
रामनारायन को गद्दी से हटाने का प्रयत्न करो।
कूट पटने पहुँचा, किन्तु उस थोड़ी सी सेना से रामनारायन
को परास्त कर सकना नामुमकिन था। राजा रामनारायन को भी
मेजर कूट के नाम क्लाइब के पत्र की कुछ ख़बर मिल गई थी।
उसने धीरज से काम लिया। समझौते की बातचीत शुरू हुई। २२
अगस्त को रामनारायन के महल में सभा हुई। जितने इलज़ाम
रामनारायन पर लगाए गए थे, उन सब को उसने शान्ति के साथ
झूठा साबित किया। कूट और महमूद अमीन के साथ मीर जाफ़र
का दामाद मीर क़ासिम भी मौजूद था। अन्त में एक ब्राह्मण को
बुलाकर सब की मौजूदगी में राजा रामनारायन ने मीर जाफ़र को
सूबेदार स्वीकार किया और उसकी वफ़ादारी की क़सम खाई।
मीर क़ासिम और महमूद अमीन ने कुरान उठाकर अपने दिलों की
सफ़ाई का एलान किया और फिर वे तीनों तथा मेजर कूट सब
एक दूसरे से गले मिले। मेजर कूट अपनी सेना सहित ७ सितम्बर
को पटने से चल कर सात दिन में मुर्शिदाबाद वापस पहुँच गया।
किन्तु क्लाइव की इच्छा अभी पूरी न हुई थी। राजा रामनारायन
एक ख़ासा ज़बरदस्त नरेश था। क्लाइव का असली उद्देश उसके

११० भारत में अंगरेज़ी राज
बल को तोड़ना था। इसलिए रामनारायन पर अभी और मुसीबतों
का आना बाक़ी था।
दूसरा हिन्दू नरेश, जिस पर मीर जाफ़र और क्लाइव की नज़र
[हाशिया: राजा रामरमसिंह] गई, उड़ीसा का राजा रामरमसिंह था ।
[हाशिया: पर हमला] उड़ीसा भी बिहार के समान बंगाल के
सूबेदार के अधीन था। क्लाइव जिस समय
मुर्शिदाबाद में था, मीर जाफ़र ने राजा रामरमसिंह को अपने
प्रान्त की मालगुज़ारी का हिसाब समझाने के बहाने मुर्शिदाबाद
बुलवा भेजा। रामरमसिंह को सन्देह हुआ, उसने खुद न
आकर अपने एक भाई और एक भतीजे को हिसाब की किताबों
सहित मुर्शिदाबाद भेज दिया। ये दोनों मुर्शिदाबाद पहुँचते ही
क़ैद कर लिए गए। राजा रामरमसिंह का सन्देह सच्चा साबित
हुआ। रामरमसिंह साहसी था, वह यह भी समझता था कि
मुर्शिदाबाद के दरबार की असली बाग क्लाइव के हाथों में है।
उसने फ़ौरन मीर जाफ़र के इस व्यवहार की शिकायत करते हुए
क्लाइव को लिखा—"मैंने एक ज़बरदस्त सेना जमा कर ली है,
जिसमें २,००० सवार और ५००० पैदल हैं और यदि नया नवाब
मुझे गिरफ़्तार करने या दबाने के लिए सेना भेजने की ग़लती
करेगा, तो मैं उसके मुक़ाबले के लिए काफ़ी हूँ, किन्तु यदि आप
मध्यस्थ होकर मेरी सलामती का ज़िम्मा लें तो मैं खुद आकर
मीर जाफ़र से मिलने और एक लाख रुपए नज़राना पेश करने के
लिए तैयार हूँ।"

क्लाइव समझ गया कि रामरमसिंह से भिड़ना अभी ठीक
नहीं। क्लाइव के कहने पर रामरमसिंह के दोनों रिश्तेदार तुरन्त
छोड़ दिए गए और उड़ीसा की गद्दी पर रामरमसिंह को बहाल
रक्खा गया।
तीसरा हिन्दू नरेश, जिसके बल को क्लाइव और मीर जाफ़र
[पार्श्व-शीर्षक: राजा युगलसिंह] ने तोड़ने का इरादा किया, पूर्णिया का राजा
[पार्श्व-शीर्षक: पर हमला] युगलसिंह था। सिराजुद्दौला ने अपने रिश्तेदार
शौकत जंग की मृत्यु पर युगलसिंह को उस
प्रान्त का शासक नियुक्त किया था। मीर जाफ़र युगलसिंह
को हटाकर उसकी जगह अपने एक आदमी खुद्दामहुसेन को वहाँ
का नवाब बनाना चाहता था। युगलसिंह मुक़ाबले के लिए तैयार
होगया। कम्पनी और सूबेदार की सेनाओं ने मिल कर पूर्णिया पर
चढ़ाई की। युगलसिंह गिरफ़्तार कर लिया गया और खुद्दामहुसेन
पूर्णिया की गद्दी पर बैठा दिया गया।
इसके बाद मीर जाफ़र ने अपने हाल के मददगार राजा
[पार्श्व-शीर्षक: राजा दुर्लभराम] दुर्लभराम को मिटाना चाहा। राजा दुर्लभराम
[पार्श्व-शीर्षक: पर हमला] मुर्शिदाबाद के दरबार में माल के महकमे का
हाकिम था। मीर जाफ़र के ऊपर उसके अनेक
अहसान थे। सिराजुद्दौला के ख़िलाफ़ साज़िश में उसने अंग्रेज़ों
और मीर जाफ़र को मदद दी थी। किन्तु उसका बल और प्रभाव
दोनों खूब बढ़े हुए थे। इसीलिए उसके नाश की तदबीरें सोची
गईं। वह कमर कस कर मुक़ाबले को तैयार हो गया। अंग्रेज़

११२ भारत में अंगरेज़ी राज
उसके असर को देख कर डर गए। तुरन्त स्वयं वाट्स ने बीच में
पड़कर मीर जाफ़र और दुर्लभराम दोनों में सुलह करवा दी।
इस तमाम छेड़ छाड़ से क्लाइव का मुख्य उद्देश बंगाल के
तमाम पुराने और बड़े बड़े घरानों के बल को तोड़ना, मीर जाफ़र
को समस्त प्रजा में अप्रिय बना देना और सूबेदारी भर में अंगरेज़ों
के बल और उनके प्रभाव की धाक जमा देना था।
राजा रामनारायन पर एक विशाल सेना लेकर दोबारा चढ़ाई
करने की तजवीज़ की गई। अफ़वाह उड़ी या
राजा रामनारायन उड़ाई गई कि अलवर्दी ख़ाँ की बूढ़ी बेवा ने अवध
पर चढ़ाई के नवाब वज़ीर को पत्र लिखा है कि आप आकर
मीर जाफ़र के विरुद्ध रामनारायन को मदद दीजे। क्लाइव और
मीर जाफ़र के लिए केवल चन्द महीने पहले की सन्धि और दोनों
ओर की क़समों को मिट्टी में मिलाकर अब फिर बिहार प्रान्त पर
चढ़ाई करना और रामनारायन को ज़ेर करना ज़रूरी हो गया।
क्लाइव ने इस बहाने से ५०,००० सेना जमा कर ली। मीर जाफ़र
को डर दिखलाकर उससे धन खींचने का भी क्लाइव को यह अपूर्व
अवसर दिखाई दिया। किन्तु मीर जाफ़र की माली हालत इस
समय बहुत ख़राब थी। अव्वल तो मुर्शिदाबाद के ख़ज़ाने की जो
दशा उसने प्लासी से पहले समझ रक्खी थी वह प्लासी के बाद न
निकली। इस ख़ज़ाने की आशा पर ही उसने अंगरेज़ कम्पनी को
अलग और क्लाइव और उसके अनेक साथियों को व्यक्तिगत
हैसियत से अलग बड़ी बड़ी रक़में देने के वादे कर रक्खे थे।

मीर जाफ़र ११३
जिसमें से अधिकांश वह इस समय तक दे भी चुका था। दूसरे
इन्हीं रक़मों के कारण उसकी स्थिति इतनी ख़राब हो गई थी कि
फ़ौज की कई महीने को तनख़्वाहें उसके ज़िम्मे चढ़ गई थीं जिससे
फ़ौज में बदअमनी बढ़ती जा रही थी।
लाचार होकर मीर जाफ़र ने यह प्रार्थना की कि कम्पनी का जो
देना मेरे ज़िम्मे बाक़ी रह गया है, उसमें कुछ
• मीर जाफ़र से धन कमी कर दी जावे। मालूम होता है कि क्लाइव
की वसूली ने उसे इसकी आशा भी दिला रक्खी थी।
इसी उद्देश से मीर जाफ़र ने कई बार बड़ी बड़ी रक़में बतौर
रिशवत क्लाइव की भेंट कीं। इन रक़मों के सम्बन्ध में सन् १७७२
ई० में पार्लिमेण्ट की एक कमेटी के सामने गवाही देते हुए क्लाइव ने
कहा था कि—“नवाब की दरियादिली ने सहज ही में मुझे धनवान
बना दिया है।”*
किन्तु कमी करना तो दूर रहा, ऐन उस मौक़े पर जब कि
बिहार पर चढ़ाई करने की पूरी तैयारी हो गई, क्लाइव ने कम्पनी
की एक एक पाई चुकवाए बिना क़दम उठाने से इनकार कर दिया।
पिछली रक़मों के अलावा और भी नई नई रक़में इस अवसर पर
मीर जाफ़र से तलब की गईं। क्लाइव का बल इस समय तक खूब
बढ़ गया था। उसके पास पचास हज़ार सेना मीर जाफ़र को
कुचलने के लिए मौजूद थी। मीर जाफ़र को तरह तरह के डर

  • "The Nawab's generosity had made his fortune easy."—Clive before
    the Parliamentary Committee in 1777.
    ८

११४ भारत में अंगरेज़ी राज
दिखाए गए। उसे लाचार होकर झुकना पड़ा। इतिहास लेखक
मैलकम लिखता है कि इस अवसर पर :—
'एक रक़म सेना के गैरमामूली ख़र्च के लिए वसूल कर ली गई। जो
ज़मीनें कम्पनी को दी गई थीं उनके परवाने बाक़ायदा जारी कराए गए।
(दरबार से) हुकुम जारी कराए गए कि नवाब के पहले छै महीने के क़र्ज़ों
की तमाम बक़ाया तुरन्त चुका दी जावे। बाक़ी तमाम क़र्ज़ों को चुकाने के
लिए उस समय तक, जब तक कि क़र्ज़ा पूरा न हो जावे, वर्धमान, नदिया
और हुगली तीन ज़िलों की सरकारी मालगुज़ारी कम्पनी के नाम करा ली
गई। क्लाइव ने कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम ८ फ़रवरी सन् १७५८ के पत्र
में लिखा—'इससे अब हमारे क़र्ज़ का चुकाया जाना नवाब के हाथों से
बिलकुल स्वतन्त्र हो गया है x x x ।'"*
हमें याद रखना चाहिये कि इस क़र्ज़ में एक कौड़ी ऐसी न थी
जो कम्पनी ने या किसी अंगरेज़ ने कभी मीर जाफ़र को सचमुच
क़र्ज़ दी हो। यह वह धन था जो मीर जाफ़र ने मसनद के बदले
में अंगरेज़ों को देने का वादा कर लिया था।
क्लाइव और मीर जाफ़र अब ५०००० सेना के साथ पटने की

  • "A supply of money was procured for the extraordinary expenses of
    the army; the perwannah, or grant of lands yielded to the Company, was
    passed in all its forms; orders were issued for the immediate discharge of all
    arrears on the first six months of the Nawab's debt, and the revenues of
    Burdwan, Nuddea and Hugli assigned over for payment of the rest :—'So
    that,' says Clive, writing [ 8th February, 1758 ] to the Court of Directors,
    'the discharge of the debt is now become independent of the Nawab. ......' "
    —Malcolm's Life of Clive vol. i, 338

मीर जाफ़र ११५
[ओर बढ़े।] चार महीने से ऊपर यह भारी सेना मैदान में रही,
[राजा रामनारायन] इसका सारा ख़र्च मीर जाफ़र पर पड़ा, किन्तु
[से समझौता] गोली एक भी न चलने पाई। क्लाइव इस समय
मीर जाफ़र को ख़ासा चकमा दे रहा था।
रामनारायन जैसे आदमी को सदा के लिए अपना शत्रु बना लेना
अंगरेज़ों के लिए हितकर न था। क्लाइव का उद्देश इस समय राम-
नारायन पर कम्पनी के बल का सिक्का जमाना, उसे मोर जाफ़र
की ओर से सशंक कर देना, उससे धन वसूल करना और अंत
में स्वयं मध्यस्थ बनकर रामनारायन के हक़ में फ़ैसला करा देना
मालूम होता था।
२३ फ़रवरी सन् १७५८ को पटने में दरबार हुआ। क्लाइव ने
मध्यस्थ का आसन लिया। मीर जाफ़र का बेटा मीरन नाम के
लिए बिहार का नवाब बनाया गया और शासन का तमाम अधि-
कार मीरन के नायब की हैसियत से ज्यों का त्यों राजा रामनारायन
के हाथों में छोड़ दिया गया। इस अनुग्रह के बदले में रामनारायन
से ७ लाख रुपए नक़द वसूल किए गए। इतिहास लेखक और्म
लिखता है कि—"क्लाइव की जो मुराद थी, वह सब पूरी हो
गई।”* कुछ दिनों बाद के एक पत्र में क्लाइव ने रामनारायन को
“अंगरेज़ों का पक्का हितसाधक” लिखा है।
क्लाइव अपने मालिकों को भो नहीं भूला। उन दिनों जितना
शोरा बंगाल में बिकता था, सब पटने से ऊपर के प्रदेश में तैयार

  • Orme, vol. ii, p. 283.

११६ भारत में अंगरेज़ी राज
होता था। क्लाइव ने अब नवाब पर ज़ोर देकर शोरा तैयार कराने
का ठेका कम्पनी के नाम हासिल कर लिया, जिससे कम्पनी का
व्यापार और बढ़ गया।
मई सन् १७५८ ई० में क्लाइव मुर्शिदाबाद लौटा। कुछ दिनों
बाद मीर जाफ़र भी अपनी राजधानी वापस पहुँच गया।
थोड़े दिनों बाद मीर जाफ़र और रामनारायण दोनों पर एक
[हाशिया: शाहज़ादे अली-] और नई आफ़त टूटी। जिस तरह मीरन केवल
[हाशिया: गौहर की बिहार] नाम के लिए बिहार का नवाब बना दिया गया
[हाशिया: यात्रा] था उसी तरह एक अरसे से दिल्ली सम्राट् के
ज्येष्ठ पुत्र को नाम मात्र के लिए बंगाल, बिहार
और उड़ीसा का सूबेदार कहा जाता था। वास्तव में शहज़ादे का
यह खिताब केवल एक मान सूचक खिताब था और मुर्शिदाबाद के
क्रियात्मक सूबेदार सम्राट् के अधीन सूबेदारी के सब फ़र्ज़ अदा
करते थे। इस समय शहज़ादा अलीगोहर अपने खिताब को सार्थक
करने के लिए सेना सहित बंगाल की ओर बढ़ा। इसमें सन्देह
नहीं, बंगाल को हाल को बग़ावत, अंगरेज़ों और मीर जाफ़र के
अन्याय और प्रजा को शोकजनक हालत इन सब की ख़बर सम्राट्
के दरबार तक पहुँच चुकी थी, और शहज़ादे के आने का इन बातों
के साथ अवश्य कुछ न कुछ सम्बन्ध था। जो हो, मीर जाफ़र
शहज़ादे के आने का समाचार पाते हो डर गया, उसने क्लाइव से
मदद चाही। क्लाइव फ़ौरन एक ज़बरदस्त फ़ौज और मीरन को
साथ लेकर मुर्शिदाबाद से पटने की ओर बढ़ा। शहज़ादा उस