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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 360

११० भारत में अंगरेज़ी राज
बल को तोड़ना था। इसलिए रामनारायन पर अभी और मुसीबतों
का आना बाक़ी था।
दूसरा हिन्दू नरेश, जिस पर मीर जाफ़र और क्लाइव की नज़र
[हाशिया: राजा रामरमसिंह] गई, उड़ीसा का राजा रामरमसिंह था ।
[हाशिया: पर हमला] उड़ीसा भी बिहार के समान बंगाल के
सूबेदार के अधीन था। क्लाइव जिस समय
मुर्शिदाबाद में था, मीर जाफ़र ने राजा रामरमसिंह को अपने
प्रान्त की मालगुज़ारी का हिसाब समझाने के बहाने मुर्शिदाबाद
बुलवा भेजा। रामरमसिंह को सन्देह हुआ, उसने खुद न
आकर अपने एक भाई और एक भतीजे को हिसाब की किताबों
सहित मुर्शिदाबाद भेज दिया। ये दोनों मुर्शिदाबाद पहुँचते ही
क़ैद कर लिए गए। राजा रामरमसिंह का सन्देह सच्चा साबित
हुआ। रामरमसिंह साहसी था, वह यह भी समझता था कि
मुर्शिदाबाद के दरबार की असली बाग क्लाइव के हाथों में है।
उसने फ़ौरन मीर जाफ़र के इस व्यवहार की शिकायत करते हुए
क्लाइव को लिखा—"मैंने एक ज़बरदस्त सेना जमा कर ली है,
जिसमें २,००० सवार और ५००० पैदल हैं और यदि नया नवाब
मुझे गिरफ़्तार करने या दबाने के लिए सेना भेजने की ग़लती
करेगा, तो मैं उसके मुक़ाबले के लिए काफ़ी हूँ, किन्तु यदि आप
मध्यस्थ होकर मेरी सलामती का ज़िम्मा लें तो मैं खुद आकर
मीर जाफ़र से मिलने और एक लाख रुपए नज़राना पेश करने के
लिए तैयार हूँ।"