भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिराजुद्दौला ६६
२६ ता० का तीसरा पहर मीर जाफ़र के मसनद पर बैठाए
जाने के लिए नियत था । मालूम होता है उसकी
[हाशिया: मीर जाफ़र का] आत्मा भीतर से अशान्त थी । ऐन मौक़े पर
[हाशिया: मसनद पर बैठाया] उसने सिराजुद्दौला की मसनद पर बैठने से
[हाशिया: जाना] इनकार कर दिया । क्लाइव को उसका हाथ
पकड़ कर उसे मसनद पर बैठाना पड़ा । पहले क्लाइव नए नवाब के
सामने आकर आदाब बजा लाया और फिर बाक़ी दरबारियों ने
दरजा बदरजा सलामियाँ दीं ।*
कम्पनी और उसके मददगारों के लिए अब मुर्शिदाबाद के
[हाशिया: मुर्शिदाबाद की] ख़ज़ाने से अपनी अपनी जेबें भरने का समय
[हाशिया: लूट] आया । ख़ज़ाने की जाँच पड़ताल के लिए एक
दिन नियत किया गया । यह कार्य दोनों जैन
जगतसेठों के सुपुर्द किया गया। क्लाइव और उसके साथियों ने जब
देखा कि मुर्शिदाबाद के ख़ज़ाने की हालत, जो उन्होंने सुन रक्खी
थी वह अब न थी, तो वे इस बात पर राज़ी होगए कि मीरजाफ़र
ने जितना धन उन्हें देने का वादा किया था उसमें आधा फ़ौरन
अदा कर दे और आधा तीन साल के अन्दर तीन क़िस्तों में दे दे ।
क्लाइव का परम मित्र अंगरेज़ इतिहास लेखक और्म लिखता है :—
“ × × × ६ जुलाई सन् १७५७ ईसवी तक ( कलकत्ते की अंगरेज़ )
कमेटी के पास चाँदी के सिक्कों में ७२,७१,६६६ रुपये पहुँच गए । यह
ख़ज़ाना सात सौ सन्दूक़ों में भर कर सौ किश्तियों पर लादा गया । सैनिकों
- Clive's Letter to the Select Committee, dated 30th June 1757.