भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
सिराजुद्दौला ७७
कमेटी के मेम्बरों के नाम जो पत्र लिखा उससे इस मामले के स्वरूप
का ख़ासा पता चल सकता है। क्लाइव ने लिखा :—
"महाशय ! ज़रा सोचिये कि हमारी इन हाल की काररवाइयों के विषय
में दुनियां क्या राय क़ायम करेगी। चन्दरनगर के (फ़्रांसीसी) गवरनर और
उसकी कौंसिल की तरफ़ से हमारे पास इस मज़मून का पत्र आया कि हम गङ्गा
प्रांत में आपके साथ सुलह से रहने के लिए राज़ी हैं। हमने इसके जवाब में
यह इच्छा प्रकट की कि आप अपने वकील भेजें और उन्हें लिख दिया कि हम
खुशी से आपके साथ समझौता करने को तैयार हैं। तो क्या हमने इस उत्तर
द्वारा एक प्रकार से सुलह स्वीकार नहीं कर ली ? इसके अलावा फ़्रांसीसी वकीलों
के आने के बाद क्या हमने सुलह की इस तरह की शर्तें तैयार नहीं कीं, जो
दोनों पक्षों के लिए सन्तोषजनक हैं और क्या हम इस बात को मंजूर नहीं कर
चुके हैं कि हर शर्त पर दोनों पक्षों के दस्तख़त हों, दोनों की मोहरें लगें और
दोनों उसके पालन की प्रतिज्ञा करें ? फिर अब नवाब क्या सोचेगा ? जब हम
अपनी ओर से नवाब से वादे कर चुके हैं और वह इस सन्धि को पालन कराने
की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेने की रज़ामन्दी तक ज़ाहिर कर चुका है तो
इसके बाद निस्सन्देह नवाब और सारी दुनियां यही समझेगी कि हम हलकी
और ओछी तबीयत के आदमी हैं या हमारा कोई भी सिद्धांत नहीं × × × ।”
वास्तव में क्लाइव वाट्सन की अपेक्षा कहीं अधिक पक्का धूर्त्त
था। वह उस समय चुपचाप वाट्स के ज़रिये,
क्लाइव की धूर्त्तता जो मुर्शिदाबाद के दरबार में एलची था, जाल-
साज़ी करवाकर नवाब की अनुमति का परवाना प्राप्त कर लेने की
कोशिश में लगा हुआ था।
७८ भारत में अंगरेज़ी राज
वाट्स ने १० मार्च को नवाब के मंत्रियों को रिश्वत देकर
नवाब की ओर से वाट्सन के नाम एक पत्र भिजवाया जिसके अंत
में यह वाक्य था :—
“आप समझदार और उदार हैं, यदि आपका शत्रु शुद्ध हृदय से
आपकी शरण चाहे तो आप उसकी जान बख़्श दें, किन्तु आपको उसके
इरादों की पवित्रता के विषय में पूरी तसल्ली होनी चाहिये, यदि ऐसा न हो
तो जो कुछ आप ठीक समझें करें।”
इस पत्र की मूल फ़ारसी प्रति कहीं नहीं मिलती और अंगरेज़ी
तरजुमा जिसका ऊपर हिन्दी तरजुमा दिया गया है वाट्स का
किया हुआ है।
वाट्स का दूसरा साथी स्क्रैफ़टन साफ़ लिखता है कि इस पत्र
को लिखाने के लिए अंगरेज़ों ने नवाब के मंत्रियों को रिश्वतें देने में
काफ़ी रुपया ख़र्च किया।* इतिहास लेखक जीन लॉ लिखता है
कि वाट्स ने मुर्शिदाबाद में रिश्वतों और झूठे वादों का बाज़ार
इतना गरम कर रक्खा था कि :—
“नवाब की सेना के सब मुख्य मुख्य अफ़सर मीर जाफ़रअली ख़ाँ,
ख़ुदादाद ख़ाँ लट्टी और कई और × × × पुराने दरबार के सब वज़ीर × × ×
क़रीब क़रीब सब मंत्री, दरबार के मुहर्रिर, यहाँ तक कि हरमसरा के ख़ोजे
तक अंगरेज़ों की ओर थे। × × ×”†
इस पत्र के सम्बन्ध में जीन लॉ को विश्वास है कि वाट्स ने
- Reflections, p. 70.
† Bengal Records, vol. iii, p. 191.
सिराजुद्दौला ७६
उसे लिखाने के लिए नवाब के मंत्री को रिशवत दी।* वह यह भी
लिखता है कि :-
“नवाब जिन पत्रों को अपने हुकुम से लिखवाता था उन्हें कभी पढ़ता
न था, इसके अलावा मुसलमान ( शासक ) कभी अपने हाथ से दस्तख़त
नहीं करते। जब लिफ़ाफ़ा बंद करके अच्छी तरह कस दिया जाता है तब
मंत्री नवाब से उसकी मोहर माँगता है और नवाब के सामने लिफ़ाफ़े पर
. मोहर लगाता है, कभी कभी एक नक़ली मोहर भी होती है।”†
इन सब कामों में मुर्शिदाबाद के दो जैन जगतसेठों का प्रभाव
और अर्मींचंद का धन, इन दोनों से अंगरेज़ों को काफ़ी मदद मिल
रही थी।
३ मार्च को क्लाइव ने सिराजुद्दौला को सहायता पहुँचाने के
बहाने अपनी सेना की बाग सँभाली। ७ मार्च को
चन्दरनगर पर उसने सिराजुद्दौला को लिख भेजा कि मैं सहायता
अंगरेज़ों का के लिए आता हूँ। अंगरेज़ों की तैयारी पूरी थी।
क़ब्ज़ा इस बीच बम्बई से भी कुछ सेना क्लाइव
८० भारत में अंग्रेज़ी राज
का वह जाली ख़त मुर्शिदाबाद से चला, जिसमें कहा जाता है कि
नवाब ने अंगरेज़ों को चन्दरनगर का मोहासरा करने की इजाज़त
दे दी। ११ को एक दूसरे पत्र द्वारा क्लाइव ने फ़्रांसीसियों पर यह
एक नया इलज़ाम लगाया कि आप लोगों ने अंगरेज़ी सेना से भागे
हुए कुछ बाग़ियों को अपने यहाँ छिपा रक्खा है। युद्ध के लिए
बस यह बहाना काफ़ी था। १२ को चन्दरनगर से दो मील की दूरी
पर क्लाइव की सेना आ पहुँची। इसी समय वाट्सन भी अपनी
सेना लेकर पहुँच गया। १४ मार्च को चन्दरनगर का मोहासरा
शुरू हुआ और २३ मार्च को चन्दरनगर अंगरेज़ों के हाथों में आ
गया। बंगाल के अंदर फ़्रांसीसियों की दूसरी कोठियों के विषय में
अंगरेज़ों और फ़्रांसीसियों के दरमियान एक सन्धि हो गई।
चन्दरनगर की इस सरल विजय में भी युद्ध कौशल या वीरता
[हाशिया: चन्दरनगर के दो] ने अंगरेज़ों का इतना साथ नहीं दिया जितना
[हाशिया: मुख्य विश्वास-] कूट नीति ने। दो बड़े विश्वासघातकों के
[हाशिया: घातक] नाम इस मोहासरे के इतिहास में मिलते हैं।
पहला एक फ़्रांसीसी अफ़सर लैफ़्टेनेन्ट दी तेरानो, जिसने रुपए
लेकर दरिया की ओर का मार्ग अंगरेज़ों के लिए खोल दिया और
दूसरा हुगली का हिन्दुस्तानी फ़ौजदार, महाराजा नन्दकुमार,
जिसे सिराजुद्दौला ने समाचार पाते ही एक बहुत बड़ी सेना सहित
फ़्रांसीसियों की सहायता और चन्दरनगर की भारतीय प्रजा की
रक्षा के लिए पहले से चन्दरनगर भेज दिया था, किन्तु जिसे ऐन
मौक़े पर अमींचंद के धन ने अंगरेज़ों की ओर खींच लिया।
सिराजुद्दौला ८१
फ्रांसीसी विश्वास घातक के विषय में एक यूरोपियन लेखक
ब्लौकमैन लिखता है :-
"तेरानो को, जोकि इस विश्वासघात के सबब बदनाम और 'रू-स्याह'
हो गया था, अपनी कृतघ्नता के बदले में अंगरेज़ों से बहुत बड़ी रक़म प्राप्त
हुई । उसने इस धन का एक भाग अपने घर फ्रांस में अपने बूढ़े कमज़ोर
बाप के पास भेजा, किन्तु बाप ने जब अपने बेटे के इस लज्जास्पद व्यवहार
का हाल सुना तो उसने धन वापस कर दिया । इस पर तेरानो को बड़ी ग़ैरत
आई । शर्म ने 'उसका पल्ला पकड़ लिया', उसने अपने तईं मकान के अंदर
बन्द कर लिया; चन्द रोज़ के बाद उसका शरीर मकान के दरवाज़े पर
एक तौलिए से लटका हुआ मिला । ज़ाहिर था कि उसने आत्महत्या कर
ली है ।"*
दूसरे यानी भारतीय विश्वासघातक के विषय में स्क्रैफ़टन और
थॉर्नटन दोनों ने अपने ग्रन्थों में साफ़ लिखा है कि अंगरेज़ों ने
अमींचन्द की मार्फ़त नन्दकुमार को रिश्वत दी और अंगरेज़ी
सेना के पहुँचने पर फ्रांसीसियों और भारतीय प्रजा दोनों को
अरक्षित छोड़ कर नन्दकुमार अपनी तमाम सेना सहित चन्दर-
नगर से हट गया । सिलेक्ट कमेटी की १० अप्रैल सन् १७५७ की
रिपोर्ट में अमींचन्द और नन्दकुमार दोनों को धन्यवाद देते हुए
यह भी साफ़ लिखा है कि—"यदि दीवान नन्दकुमार की सेना न
हटा ली गई होती तो हमारे लिए विजय प्राप्त कर सकना असम्भव
ही होता ।"
- Notes on Sirajuddowla, Journal of the Asiatic Society, 1867.
८२ भारत में अंग्रेज़ी राज
चन्दरनगर की विजय अंगरेज़ों के लिए अत्यन्त उपयोगी
साबित हुई। इससे बंगाल के अंदर फ़्रांसीसियों का बल टूट गया
और नवाब से अंतिम निबटारा करने के लिए अंगरेज़ों के सामने
का मार्ग अधिक साफ़ हो गया।
वाट्सन ने अपने २५ फ़रवरी के उस पत्र में जिसका ऊपर
[हाशिया: सिराज़ुद्दौला को] ज़िक्र आ चुका है, सिराज़ुद्दौला को लिखा था
[हाशिया: धमकी] कि—"आप ख़ातिरज़मा रखिए, मैं सदा अपना
धर्म समझ कर शान्ति क़ायम रक्खूँगा।" इसी
पत्र में उसने लिखा था कि यह अफ़वाह कि अंगरेज़ फ़्रांसीसियों
पर हमला करने वाले हैं बिलकुल झूठ है। किन्तु इसके चंद रोज़
बाद ही जब सिराज़ुद्दौला ने ६ फ़रवरी की सन्धि के अनुसार
वाट्सन से सेना की सहायता माँगी तो उत्तर में वाट्सन ने तैयारी
करके और मौक़ा देखकर सिराज़ुद्दौला को लिखा कि :—
“कुछ दिन हुए मैंने पिछले महीने की २० तारीख़ को आपके पत्र का
उत्तर दे दिया है। मैं समझता हूँ वह अब तक आपको मिल गया होगा।
उसे पढ़कर आपको पूरी तरह विश्वास हो गया होगा कि फ़्रांसीसी वकील का
यह कहना, कि मेरा इरादा शान्ति भंग करने का है झूठ है × × × ।
“× × × किन्तु अब साफ़ कहने का समय आगया है। यदि आप
वास्तव में अपने देश में शान्ति बनाए रखना चाहते हैं और अपनी प्रजा को
आपत्ति और बरबादी से बचाना चाहते हैं, तो आज से दस दिन के अंदर
अपनी ओर से सन्धि की हरेक शर्त को पूरा कर दीजिये, ताकि मुझे शिकायत
का ज़रा भी मौक़ा न मिल सके, नहीं तो याद रहे नतीजों के लिए आप
सिराजुद्दौला ८३
ज़िम्मेदार होंगे; x x x चंद रोज़ के अंदर मैं x x x और अधिक जहाज़
और सेना मँगा लूँगा और आपके मुल्क में ऐसी आग लगा दूँगा कि गंगा
का तमाम जल भी उसे बुझा न सकेगा। x x x"
वाट्सन ने अब अपना असली रूप धारण कर लिया।
९ फ़रवरी के सुलहनामे में सिराजुद्दौला ने यह
सिराजुद्दौला की वादा किया था कि अंगरेज़ों की तमाम कोठियाँ
सच्चाई और माल उन्हें वापस दे दिया जावेगा और
जिन अंगरेज़ों का नुक़सान हुआ है उनको सरकार की तरफ़
से हरजाना दे दिया जावेगा। ये वह 'शर्तें' थीं जिन्हें वाट्सन
ने 'दस दिन के अंदर' पूरा करने पर अब ज़ोर दिया। मामूली
अदालतों की डिगरियों की काररवाई होने में भी काफ़ी देर लगती
है। क्लाइव के नीचे लिखे पत्र से ज़ाहिर है कि सिराजुद्दौला पूरी
ईमानदारी और काफ़ी जल्दी के साथ अपने शाही वादों को पूरा कर
रहा था। ३० मार्च को चन्दरनगर से क्लाइव ने एक पत्र में लिखा:—
"सिराजुद्दौला ने जो सन्धि हमारे साथ की थी उसकी अधिकांश शर्तें
वह पूरी कर चुका है। तीन लाख रुपए वह हमें अदा कर चुका है और
बहुत सा माल और धन हमारी अनेक मातहत कोठियों में हमारे पास जमा
कराया जा चुका है और मुझे कोई संदेह नहीं कि नवाब के तमाम वादे
ठीक समय पर पूरे किए जावेंगे।"*
- " He (Sirajuddowlah) has fulfilled most of the articles of the treaty
made with us. The three lack of rupees are already paid and goods and
money to a considerable amount delivered up to us at our several subordi-
८४ भारत में अंगरेज़ी राज
इसके अलावा ६ फ़रवरी के सुलहनामे में कोई ऐसा वाक्य
न था कि इतने समय के अंदर हरेक शर्त पूरी हो जानी चाहिये।
इसलिए अब वाट्सन का सिराजुद्दौला को यह लिखना कि दस
दिन के अंदर सब शर्तें पूरी हो जानी चाहियें, केवल फिर से लड़ाई
शुरू करने का एक बहाना ढूंढना था। उधर सिराजुद्दौला ने सेना
की जो सहायता मांगी थी उसका जवाब तक नहीं दिया गया।
सिराजुद्दौला ने सच्ची गम्भीरता के साथ वाट्सन को उत्तर
दिया :—
“कुछ दिन हुए आपने मुझे जो पत्र लिखा था उसका उत्तर मैं दे चुका
हूं। जो कुछ मैंने (दिल्ली सम्राट के विषय में) लिखा है उस पर गौर
करके कृपा कर मुझे जल्दी जवाब भेजिये। मैं इस बात पर पक्का और जमा
हुआ हूं कि जो सन्धि हमने आपस में की है उसकी शर्तों पर क़ायम रहूँ,
किन्तु होली की छुट्टियों की वजह से, जिनमें मेरे बनिये (ख़ज़ांची आदि) और
मंत्री दरबार में नहीं आते, मुझे उन शर्तों पर काररवाई मुतलवी करनी पड़ी।
होली ख़तम होते ही जिन जिन बातों पर मैंने दस्तख़त किए हैं उन्हें ठीक
ठीक पूरा कर दूँगा। आप समझ सकते हैं कि इस देरी का कोई इलाज नहीं
× × × मैं जो सन्धि एक बार कर लेता हूँ उसे तोड़ना मेरे यहाँ का रिवाज
नहीं है, इसलिए आप तसल्ली रखिए कि जो सन्धि मैंने अंगरेज़ों के साथ की
है उसे टालने का मैं प्रयत्न न करूँगा × × × ।
nates, and I make little doubt but that all his engagements will be duly
executed."—Clive's letter to the Select Committee, dated 30th March 1757—
Bengal Records, vol. ii, p. 308.
सिराजुद्दौला ८५
" x x x
"आप यक़ीन रखिये कि यदि कोई शख़्स या गिरोह आपसे लड़ने
की कोशिश करेगा या आपसे दुश्मनी का व्यवहार करेगा तो मैं ख़ुदा की
क़सम खा चुका हूँ कि मैं आपकी मदद करूँगा। फ्रांसीसियों को मैंने
कभी एक कौड़ी भी नहीं दी और जो सेना मैंने हुगली भेजी है वह वहाँ के
फ़ौजदार नन्दकुमार के पास भेजी गई है। फ्रांसीसी कभी आपसे लड़ाई
छेड़ने का साहस न करेंगे और मैं विश्वास करता हूँ कि पुराने रिवाज को
क़ायम रखते हुए गंगा प्रांत के अंदर या उन प्रांतों में जिनका मैं सूबेदार हूँ,
आप भी किसी तरह की लड़ाई न छेड़ेंगे।"*
इसके बाद ज्योंही सिराजुद्दौला को मालूम हुआ कि मुझे
[हाशिया: अंग्रेज़ी सेना के अत्याचार] मदद देने के बहाने अंग्रेज़ी सेना कलकत्ते से
चलकर वास्तव में चन्दरनगर पर हमला करने
जा रही है, उसने फ़ौरन अंग्रेज़ों को लिख
भेजा—"मुझे अब आपकी मदद की ज़रूरत नहीं है।" किन्तु
नवाब की इस आज्ञा और अलीनगर की सन्धि दोनों के ख़िलाफ़
अंग्रेज़ी सेना नवाब के मुल्क और उसकी रिआया दोनों को रौंदती
हुई चन्दरनगर की ओर बढ़ी। मार्ग में स्थान स्थान पर उन्होंने
सिराजुद्दौला की भारतीय प्रजा पर ख़ूब जी खोलकर अत्याचार
किए। उधर अंग्रेज़ एलची वाट्स मुर्शिदाबाद में बैठा हुआ नित्य
नई शर्तें सिराजुद्दौला के सामने पेश कर रहा था। जब अंग्रेज़ी
सेना के अत्याचारों की ख़बर सिराजुद्दौला के कानों तक पहुँची तो
- Ive's Voyages, pp. 124-125.
८६ भारत में अंगरेज़ी राज
उसने दुखी होकर २२ मार्च सन् १७५७ को ऐडमिरल वाट्सन के
नाम यह पत्र भेजा :—
"मैंने जो कुछ वादा किया है और दस्तख़त किए हैं उस पर मैं पक्का
[मार्जिन: सिराजुद्दौला की] रहूँगा और किसी तरह भी उससे न हटूंगा । वाट्स
[मार्जिन: सद्आशाएं] साहब की सब इच्छाएँ और जो कुछ उन्होंने मुझसे
कहा मैंने सब पूरा कर दिया और जो कुछ बाक़ी
है वह भी इस चाँद की पन्द्रह तारीख़ तक दे दिया जायगा । वाट्स
साहब ने ये सब बातें मुफ़स्सिल तौर पर आपको लिखी होंगी । किन्तु
बावजूद इस सब के मुझे अनेक बातों से मालूम होता है कि आप मेरे साथ
अपनी सन्धि को मिटा देना चाहते हैं । हुगली, इंगली, बर्धमान और नदिया
के इलाक़ों को आपकी सेना ने वीरान कर डाला है । यह क्यों ? इसके
अलावा गोविन्दराम मित्र ने रामदीन घोष के लड़के की मार्फ़त (हुगली के
फ़ौजदार) नन्दकुमार को लिख भेजा है कि कालीघाट का इलाक़ा कलकत्ते
के ज़िले में शामिल है इसलिए वह गोविन्दराम के हवाले कर दिया जाय ।
इसका क्या अर्थ है ? × × × आपके वादों पर विश्वास करके मैंने सुलह
की थी ताकि देश का भला हो और दोनों ओर की सेनाओं द्वारा शाही
इलाक़ों की बरबादी न हो, न कि इसलिए कि प्रजा को पाँव तले कुचला
जावे और सरकारी मालगुज़ारी में बाधा पड़े ।
“आपकी कोशिश यह होनी चाहिये कि जो मित्रता हमारे आपके बीच
जड़ पकड़ गई है वह दिन प्रतिदिन मज़बूत होती जावे × × × ।"
एक ओर भोला सिराजुद्दौला अभी तक इन विदेशियों के साथ,
अमन से रहने के स्वप्न देख रहा था, दूसरी ओर क्लाइव और
सिराजुद्दौला ८७
वाट्सन की सलाह से मुर्शिदाबाद के दरबार में बैठा हुआ वाट्स
[मुर्शिदाबाद में] सिराजुद्दौला को बंगाल की मसनद से उतार
[वाट्स की] कर किसी दूसरे को उसकी जगह बैठाने और देश
[साज़िशें] में ग़दर करा देने की साज़िशों में लगा हुआ था।
इतिहास लेखक एस० सी० हिल लिखता है :—
“अंगरेज़ एलची की थैली अधिक लम्बी थी, इसलिए वह न केवल
दरबार के ख़ास ख़ास आदमियों बल्कि नवाब के मंत्रियों पर भी प्रभाव जमा
सका। चतुर तथा दूरन्देश श्रमींचन्द से उसे खूब सहायता मिली।”*
किन्तु वाट्स कोई थैली अपने साथ यूरोप से न लाया था।
वास्तव में श्रमींचन्द की थैली ही इस समय अंगरेज़ों की थैली
थी। जिन भारतीय देशद्रोहियों ने इस साज़िश में अंगरेज़ों का साथ
दिया उनमें मुख्य राजा मानिकचन्द, राजा राजवल्लभ, राजा दुर्लभ-
राम, मीर जाफ़र और दो जैन सेठ थे। इनमें से हरएक अपना
अपना स्वार्थ पूरा करना चाहता था। जैन सेठ दो भाई थे जो शाही
ख़ज़ाञ्ची, तमाम सूबे के सरकारी साहूकार और शाही टकसालों के
ठेकेदार थे। ये लोग अपने किसी नीच स्वार्थ के लिए सिराजुद्दौला
के एक मुलाज़िम यारलुत्फ़ ख़ाँ को मसनद पर बैठाना चाहते थे।
किन्तु मीर जाफ़र सिराजुद्दौला के नाना अलीवर्दी ख़ाँ का बहनोई
था, उसका प्रभाव अधिक था, इसलिए अंगरेज़ उसे नवाब बनाना
- "The British agent, having the deeper purse, was able to influence not
only the leading men at court, but also the secretaries, and was much assisted
by the foresighted cunning of Aminchand. . . ."-Bengal Records, vol. i.
p. clxxvii.
८८ भारत में अंगरेज़ी राज
चाहते थे। २६ अप्रैल तक वाट्स ने मीर जाफ़र को राज़ी करके
क्लाइव को पत्र लिखा कि—"मीर जाफ़र और उसके साथी नवाब
को मसनद से उतारने में अंगरेज़ों को मदद देने के लिए तैयार हैं"
और यह भी लिखा :—
"यदि आप इस दूसरी तरकीब को पसन्द करें जो उस तरकीब की
निसबत जो मैं इससे पहले लिख चुका हूं ज़्यादा आसान है, तो मीर जाफ़र
चाहता है कि आप अपनी तजवीज़ें लिख भेजें कि आप कितना धन और
कितनी ज़मीन चाहते हैं और सन्धि की क्या शर्तें होंगी।" *
क्लाइव ने इस समय फिर दोरुख़ी चाल चली। एक ओर उसने
सिराजुद्दौला को धोखे में रखने के लिए उसे एक
[हाशिया: क्लाइव के दो रुख़े] अत्यन्त प्रेम भरा पत्र लिखा और दूसरी ओर
[हाशिया: पत्र] मीर जाफ़र के लिए वाट्स की असली बात का
जवाब दिया। प्रसिद्ध इतिहास लेखक मैकॉले लिखता है :—
"क्लाइव ने सिराजुद्दौला को इतने प्रेमभरे शब्दों में पत्र लिखा कि उन
शब्दों के धोखे में आकर वह निर्बल नरेश फिर कुछ समय के लिए अपने तईं
पूरी तरह सुरक्षित समझने लगा। क्लाइव अपने इस पत्र को 'सान्त्वना देने
वाला पत्र' कहता है। जो हरकारा इस पत्र को लेकर गया वही एक दूसरा पत्र
वाट्स साहब के नाम लेकर गया, जिसमें लिखा था—'मीर जाफ़र से कह
दो कि किसी बात से न डरे। मैं पाँच हज़ार ऐसे सिपाही लेकर जिन्होंने
- "If you approve of this scheme, which is more feasible than the other,
I wrote about, he (Mir Jaffir) requests you will write your proposals of what
money, what land you want or what treaties you will engage in."—Watts'
letter to Calcutta dated 26th April, 1757.
सिराजुद्दौला =६
कभी पीठ नही दिखाई उससे जा मिलूँगा। उसे विश्वास दिला दो कि मैं
दिन दिन भर और रात रात भर चल कर उसकी मदद के लिए पहुँचूँगा और
जब तक मेरे पास एक आदमी भी बचेगा तब तक उसका साथ न छोडूंगा' ।"†
किन्तु चन्दरनगर अंगरेज़ों के हाथों में जाने के समय से
[हाशिया: फ्रांसीसियों के साथ] सिराजुद्दौला का हृदय बहुत कुछ सशंक हो गया
[हाशिया: . सन्धि का उल्लंघन] था। चन्दरनगर की विजय के बाद अंगरेज़ों
और फ्रांसीसियों के दरमियान जो सन्धि हुई
थी उसके विरुद्ध अंगरेज़ों ने सिराजुद्दौला के सामने अब यह एक
और नई माँग पेश की कि क़ासिमबाज़ार, ढाका, पटना, जूदा,
बालेश्वर इत्यादि में फ्रांसीसियों की जितनी कोठियाँ हैं और जितने
फ्रांसीसी आपके राज में हैं उन सबको आप हमारे सुपुर्द कर दें ।
फ्रांसीसियों को बंगाल के अंदर कोठियाँ बनाने और व्यापार करने
की इजाज़त ठीक उसी तरह दिल्ली सम्राट से मिली हुई थी जिस
तरह अंगरेज़ों को । अभी तक फ्रांसीसियों ने न कभी सम्राट या
उसके सूबेदार की किसी आज्ञा को भंग किया था और न उन्हें किसी
तरह का कष्ट पहुँचाया था। इसलिए अंगरेज़ों की इस बेजा माँग के
उत्तर में सिराजुद्दौला ने १४ अप्रैल को वाटसन को लिख दिया :—
† "He (Clive) wrote to Sirajuddowla in terms so affectionate that they
for a time lulled that weak prince into perfect security. The same courier
who carried this 'Soothing letter,' as Clive calls it, carried to Mr. Watts a
letter in the following terms : 'Tell Mir Jaffir to fear nothing. I will join him
with five thousand men who never turned their backs. Assure him, I will
march night and day to his assistance, and stand by him as long as I have a
man left.' "—Macaulay's Essay on Clive.
६० \qquad\qquad\qquad\qquad भारत में अंगरेज़ी राज
"मैं पहले भी लिख चुका हूँ और फिर लिखता हूँ कि यदि अंगरेज़
कम्पनी अपना व्यापार क़ायम करना चाहती है तो मुझे कोई ऐसी बात न
लिखी जावे जो हमारी सन्धि के अनुकूल न हो, × × × अगर आप मुझसे
लड़ाई करना नहीं चाहते तो मेरी मोहर लगी हुई और मेरी दस्तख़ती सन्धि
आप के पास है, जब कभी पत्र लिखना हो तो उसे देख कर उसके अनुसार
लिखिए × × × ।
"यदि आप शान्ति क़ायम रखना चाहते हैं तो सन्धिपत्र के विरुद्ध
कोई बात न लिखिए।"*
किन्तु इस दरमियान वाट्सन, क्लाइव, वाट्स और मीर जाफ़र
के बीच साज़िश क़रीब क़रीब पक चुकी थी।
[हाशिया: मीरजाफ़र के साथ] ४ जून सन् १७५७ ई० को आधी रात के बाद एक
[हाशिया: गुप्त सन्धि] ज़नानी पालकी में बैठ कर चोरी चोरी वाट्स ने
मीर जाफ़र के महल में प्रवेश किया। उसी रात को मीर जाफ़र ने
अंगरेज़ों के साथ एक गुप्त सन्धिपत्र पर दस्तख़त कर दिए।
इस सन्धिपत्र की १३ शर्तों का सार इस प्रकार है :—
जितने अधिकार सिराजुद्दौला ने अंगरेज़ों को दे रक्खे थे, मीर
जाफ़र सूबेदार बनने पर उन सबको क़ायम रक्खे। अंगरेज़ और
मीर जाफ़र दोनों में से किसी की जब कभी किसी तीसरे के साथ
लड़ाई हो तो दूसरा उसकी मदद करे। तमाम फ़्रांसीसी और
उनकी कोठियाँ अंगरेज़ों के हवाले कर दी जायँ और फ़्रांसीसियों
को बंगाल में न रहने दिया जाय। कलकत्ते की तबाही के हरजाने
- Ive's Voyages, p. 142.
सिराजुद्दौला ६१
में और लड़ाई के ख़र्च के लिए मीर जाफ़र कम्पनी को एक करोड़
रुपए दे। इसके अलावा अलग अलग लोगों के नुक़सानों के लिए
कलकत्ते के अंगरेज़ बाशिंदों को ५० लाख, हिन्दू बाशिंदों को २०
लाख और आरमीनियन बाशिंदों को ७ लाख रुपए दिए जायँ।
कलकत्ते की खंदक़ के अंदर और बाहर चारों ओर ६०० गज़ तक
की ज़मीन अंगरेज़ों को दे दी जाय, साथ ही कलकत्ते के दक्खिन में
हुगली नदी और नमक की झीलों के दरमियान कालपी (बंगाल)
तक तमाम इलाक़े की ज़मींदारी अंगरेज़ों को दे दी जाय। जब कभी
अपनी रक्षा के लिए नवाब को अंगरेज़ी सेना की ज़रूरत हो, नवाब
उसका ख़र्च अदा करे। हुगली के नीचे दरिया के ऊपर नवाब
किसी तरह की क़िले बंदी न करे। मसनद पर बैठने के तीस दिन के
अंदर मीर जाफ़र इन शर्तों को पूरा कर दे और जब तक वह इस
सन्धि के अनुसार चलता रहेगा, कम्पनी उसे उसके शत्रुओं को
दमन करने में मदद देती रहेगी।
साज़िश अब पूरी तरह पक चुकी थी, किन्तु वाट्स और कई
[पार्श्व टिप्पणी: दोनों ओर से सेनाओ का कूच] अंगरेज़ अभी तक मुर्शिदाबाद में मौजूद थे।
लड़ाई का खुला एलान करने से पहले उन्हें वहाँ
से हटा लेना ज़रूरी था।
१२ जून की शाम को 'बाग़ों में हवा ख़ोरी
करने'* के लिए वाट्स और उसके अंगरेज़ साथियों ने नवाब से
इजाज़त ली और इस बहाने रातों रात वे मुर्शिदाबाद से भाग
- Ive's Voyages, p. 145.
६२ भारत में अंगरेज़ी राज
निकले। अगले दिन जब सिराजुद्दौला को इस छल का पता चला,
तो उसने क्लाइव और वाट्सन को इस घटना की सूचना देते हुए
दुख के साथ लिखा :-
" x x x इससे साफ़ धोखा साबित होता है और सन्धि तोड़ने का
इरादा ज़ाहिर होता है x x x ।
"खुदा का शुक्र है कि सन्धि मेरी ओर से भंग नहीं की गई, ख़ुदा
और रसूल के सामने हमने आपस में सुलह की थी और जो कोई पहले
उसका उल्लङ्घन करेगा अपने किए की सज़ा पावेगा।"
निस्सन्देह सिराजुद्दौला और उसके विपक्षियों के चरित्र में
आकाश पाताल का अंतर था। भोले सिराजुद्दौला ने क्लाइव के
'प्रेम भरे पत्रों' पर विश्वास करके हाल ही में अपनी आधी सेना
तक बरखास्त कर दी थी।
१२ जून को मीर जाफ़र की ओर से कलकत्ते पत्र पहुँचा, जिसमें
लिखा था कि "यहाँ सब काम तैयार है"। अगले दिन १३ जून
को अंगरेज़ी सेना ने कलकत्ते से कूच किया।
सिराजुद्दौला को भी अब मजबूर होकर अपनी सेना मैदान
में निकालनी पड़ी। सिराजुद्दौला की इतनी बेपरवाही और
उसका आत्मविश्वास झूठा न था। सिराजुद्दौला की सेना अब
भी क्लाइव और उसकी समस्त सेना को थोड़े से समय के अंदर
निर्मूल कर देने के लिए काफ़ी थी। किन्तु वही मीर जाफ़र इस
समय सिराजुद्दौला का प्रधान सेनापति था। पुराने हिन्दोस्तानी
रिवाज के अनुसार सिराजुद्दौला स्वयं मीर जाफ़र के महल में
सिराजुद्दौला ६३
पहुँचा और उससे अपनी पिछली तमाम भूलों के लिए क्षमा माँग
कर प्रेम की प्रार्थना की। मीर जाफ़र ने कुरान हाथ में लेकर सिरा-
जुद्दौला के सामने वफ़ादारी की क़सम खाई। सिराजुद्दौला को
अविश्वास का कोई सबब न हो सकता था।
मुर्शिदाबाद से २० मील दूर पलाश वृक्षों का एक बन था, जिसे
पलाशी बाग़ भी कहते थे। उसी बन के पास (हाशिया: प्लासी की लड़ाई)
प्लासी नामक गाँव में बृहस्पतिवार २३ जून
सन् १७५७ ईसवी को दोनों सेनाओं का
आमना सामना हुआ। प्रधान सेनापति मीर जाफ़र के अलावा
सिराजुद्दौला की सेना में तीन और मुख्य सेनापति थे यारलुत्फ़
ख़ाँ, राजा दुर्लभराम और मीर मुउद्दीन जिसे मीर मदन भी
कहते थे। ४५००० सेना मीर जाफ़र, यारलुत्फ़ ख़ाँ और राजा
दुर्लभराम के अधीन थी। १२००० मीर मदन के अधीन थी।
सिराजुद्दौला का एक ख़ास प्रेमपात्र मोहनलाल भी मीर मदन के
साथ था। थोड़ी ही देर के युद्ध में क्लाइव की कायरता और
अकुशलता दोनों साफ़ चमकने लगीं। विजय साफ़ सिराजुद्दौला
की ओर नज़र आती थी। ऐन मौक़े पर मीर जाफ़र का रुख़
बदलता हुआ दिखाई दिया। कर्नल मालेसन लिखता है कि
ख़बर पाते ही सिराजुद्दौला ने अपना सन्देह दूर करने के लिए
मीर जाफ़र को अपने पास बुलवाया। उसने मीर जाफ़र को अपने
और मीर जाफ़र के सम्बन्ध और अपने नाना अलीवर्दी ख़ाँ की
याद दिलाई। इसके बाद अपनी पगड़ी सर से उतार कर सिरा-
६४ भारत में अंगरेजी राज
जुद्दौला ने मीरजाफ़र के सामने ज़मीन पर फेंक दी और कहा—
“मीर जाफ़र इस पगड़ी की लाज तुम्हारे हाथों में है !” मीर
जाफ़र ने बड़े आदर के साथ पगड़ी उठाकर सिराजुद्दौला के हाथों
में दी और अपने दोनों हाथ छाती पर रख कर बड़ी गम्भीरता के
साथ फिर एक बार झुक कर सिराजुद्दौला की वफ़ादारी की क़सम
खाई। निस्सन्देह मीर जाफ़र उस समय अपनी आत्मा और
सिराजुद्दौला दोनों को जान बूझकर धोखा दे रहा था। वह
विश्वासघात पर कमर कस चुका था। सिराजुद्दौला के सामने से
हटते ही उसने फ़ौरन एक पत्र द्वारा क्लाइव को इस तमाम घटना
की सूचना दी।
सिराजुद्दौला की सेना में मीर जाफ़र ही अकेला विश्वास-
घातक न था। वास्तव में उसकी अधिकांश सेना विश्वासघातकों
से छलनी छलनी हो चुकी थी। राजा दुर्लभराम और यारलुत्फ़ ख़ाँ
भी अपने तईं शत्रु के हाथ बेच चुके थे। ऐन मौक़े पर जब कि
विजय सिराजुद्दौला के पैरों के पास खेलती दिखाई देती थी। मीर
जाफ़र, राजा दुर्लभराम और यारलुत्फ़ ख़ाँ तीनों अपनी ४५०००
सेना सहित मुड़ कर अंगरेज़ों की ओर जा मिले। थोड़ी देर बाद
सिराजुद्दौला का एक मात्र वफ़ादार सेनापति मीर मदन भी मैदान
में काम आया। करनल मालेसन लिखता है कि जब तक वीर मीर
मदन ज़िन्दा रहा वह अपनी केवल १२००० सेना से तीनों विश्वास-
घातकों के प्रयत्नों को निष्फल करता रहा। उसके जीते जी अंगरेज़ी
सेना के लिए अपने पैर जमा सकना सर्वथा असम्भव था। किन्तु
सिराजुद्दौला ६५
मीर मदन की मृत्यु से सिराजुद्दौला लाचार हो गया। उसका
दिल टूट गया। आज तक प्लासी गाँव के लोग मीर जाफ़र की दग़ा
और मीर मदन की वफ़ादारी दोनों का अत्यन्त करुणा भरे शब्दों
में ज़िक्र करते हैं।
थोड़े से रक्तपात के बाद २३ तारीख़ की शाम तक असहाय
सिराजुद्दौला को अपने हाथी पर सवार होकर मुर्शिदाबाद की
ओर भागना पड़ा। मैदान क्लाइव और मीर जाफ़र के हाथों में रहा।
सुप्रसिद्ध अंग्रेज़ इतिहास लेखक कर्नल मालेसन उस दिन की
लड़ाई के विषय में लिखता है :—
"केवल उस समय जब कि विश्वासघातकता अपना काम कर चुकी,
जब कि विश्वासघातकता ने नवाब को मैदान से बाहर निकाल दिया, जबकि
विश्वासघातकता नवाब की सेना को ऊँचे और दुर्जेय स्थान से हटा चुकी,
केवल उस समय क्लाइव आगे बढ़ सका, इससे पहले क्लाइव के आगे बढ़ने
में उसका (और उसकी सेना का) नेस्त नाबूद हो जाना असन्दिग्ध था।"*
क्लाइव ने अपनी सेना सहित पास के गाँव दादपुर में रात
गुज़ारी। शुक्रवार २४ ता० को सवेरे क्लाइव ने
मीर जाफ़र मीर जाफ़र को अपने ख़ेमे में बुलाया। मीर
का पाप जाफ़र अपने बेटे मीरन को लेकर क्लाइव के
ख़ेमे में पहुँचा। मालूम होता है मीर जाफ़र का पाप इस समय
- "It was only when treason had done her work, when treason had
driven the Nawab from the field, when treason had removed his army from its
commanding position, that Clive was able to advance without the certainty
of being annihilated."—Colonel Malleson in Decisive Battles of India, p. 73.
६६ भारत में अंगरेजी राज
उसकी छाती पर सवार था। सम्भव है क्लाइव की ओर से भी
मीर जाफ़र के दिल में दग़ा का डर रहा हो। क्लाइव के सामने
पहुँचते ही ठीक उस समय जब कि गारद उसकी पेशवाई के लिए
आगे बढ़ी, मीर जाफ़र घबराकर चौंक पड़ा। उसका चेहरा एक
दम स्याह पड़ गया। क्लाइव ने फ़ौरन उसे गले लगाकर 'तीनों
प्रान्तों का सूबा' कह कर सलाम किया। मीर जाफ़र सँभला।
क्लाइव ने उसे विश्वास दिलाया कि अंगरेज़ धर्म्म समझ कर अपने
वादों को पूरा करेंगे। इसके बाद क्लाइव ने उसे सिराजुद्दौला का
पीछा करने की सलाह दी। फ़ौरन वहाँ से कूच कर २५ तारीख़
को सबेरे मीर जाफ़र मुर्शिदाबाद पहुँचा।
एक दिन पहले यानी २४ को सबेरे सिराजुद्दौला मुर्शिदाबाद
[सिराजुद्दौला फ़क़ीरी] पहुँचा चुका था। सिराजुद्दौला का ख़ज़ाना
[भेष में] लबालब भरा हुआ था। धन को पानी की तरह
बहाकर उसने फिर एक बार फ़ौज खड़ी करने
और अपनी क़िस्मत आज़माने का प्रयत्न किया। किन्तु प्लासी
की पराजय की ख़बर सारे देश में बिजली की तरह फैल चुकी थी।
सिराजुद्दौला के इक़बाल का सूर्य्य अब अस्त हो रहा था और अस्त
होने वाले सूर्य्य की पूजा कोई नहीं करता। सिराजुद्दौला ने देख लिया
कि अब कोई मेरा साथ देने के लिए तैयार नहीं है। उसके कुछ
दरबारियों ने उसे सलाह दी कि आप हार मानकर विदेशियों के
साथ सन्धि कर लें, किन्तु उस वीर ने अत्यन्त तिरस्कार के साथ
इस सलाह को ठुकरा दिया। अंत में देशद्रोही मीर जाफ़र के आने