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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 364

११४ भारत में अंगरेज़ी राज
दिखाए गए। उसे लाचार होकर झुकना पड़ा। इतिहास लेखक
मैलकम लिखता है कि इस अवसर पर :—
'एक रक़म सेना के गैरमामूली ख़र्च के लिए वसूल कर ली गई। जो
ज़मीनें कम्पनी को दी गई थीं उनके परवाने बाक़ायदा जारी कराए गए।
(दरबार से) हुकुम जारी कराए गए कि नवाब के पहले छै महीने के क़र्ज़ों
की तमाम बक़ाया तुरन्त चुका दी जावे। बाक़ी तमाम क़र्ज़ों को चुकाने के
लिए उस समय तक, जब तक कि क़र्ज़ा पूरा न हो जावे, वर्धमान, नदिया
और हुगली तीन ज़िलों की सरकारी मालगुज़ारी कम्पनी के नाम करा ली
गई। क्लाइव ने कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम ८ फ़रवरी सन् १७५८ के पत्र
में लिखा—'इससे अब हमारे क़र्ज़ का चुकाया जाना नवाब के हाथों से
बिलकुल स्वतन्त्र हो गया है x x x ।'"*
हमें याद रखना चाहिये कि इस क़र्ज़ में एक कौड़ी ऐसी न थी
जो कम्पनी ने या किसी अंगरेज़ ने कभी मीर जाफ़र को सचमुच
क़र्ज़ दी हो। यह वह धन था जो मीर जाफ़र ने मसनद के बदले
में अंगरेज़ों को देने का वादा कर लिया था।
क्लाइव और मीर जाफ़र अब ५०००० सेना के साथ पटने की

  • "A supply of money was procured for the extraordinary expenses of
    the army; the perwannah, or grant of lands yielded to the Company, was
    passed in all its forms; orders were issued for the immediate discharge of all
    arrears on the first six months of the Nawab's debt, and the revenues of
    Burdwan, Nuddea and Hugli assigned over for payment of the rest :—'So
    that,' says Clive, writing [ 8th February, 1758 ] to the Court of Directors,
    'the discharge of the debt is now become independent of the Nawab. ......' "
    —Malcolm's Life of Clive vol. i, 338