भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्लाइव समझ गया कि रामरमसिंह से भिड़ना अभी ठीक
नहीं। क्लाइव के कहने पर रामरमसिंह के दोनों रिश्तेदार तुरन्त
छोड़ दिए गए और उड़ीसा की गद्दी पर रामरमसिंह को बहाल
रक्खा गया।
तीसरा हिन्दू नरेश, जिसके बल को क्लाइव और मीर जाफ़र
[पार्श्व-शीर्षक: राजा युगलसिंह] ने तोड़ने का इरादा किया, पूर्णिया का राजा
[पार्श्व-शीर्षक: पर हमला] युगलसिंह था। सिराजुद्दौला ने अपने रिश्तेदार
शौकत जंग की मृत्यु पर युगलसिंह को उस
प्रान्त का शासक नियुक्त किया था। मीर जाफ़र युगलसिंह
को हटाकर उसकी जगह अपने एक आदमी खुद्दामहुसेन को वहाँ
का नवाब बनाना चाहता था। युगलसिंह मुक़ाबले के लिए तैयार
होगया। कम्पनी और सूबेदार की सेनाओं ने मिल कर पूर्णिया पर
चढ़ाई की। युगलसिंह गिरफ़्तार कर लिया गया और खुद्दामहुसेन
पूर्णिया की गद्दी पर बैठा दिया गया।
इसके बाद मीर जाफ़र ने अपने हाल के मददगार राजा
[पार्श्व-शीर्षक: राजा दुर्लभराम] दुर्लभराम को मिटाना चाहा। राजा दुर्लभराम
[पार्श्व-शीर्षक: पर हमला] मुर्शिदाबाद के दरबार में माल के महकमे का
हाकिम था। मीर जाफ़र के ऊपर उसके अनेक
अहसान थे। सिराजुद्दौला के ख़िलाफ़ साज़िश में उसने अंग्रेज़ों
और मीर जाफ़र को मदद दी थी। किन्तु उसका बल और प्रभाव
दोनों खूब बढ़े हुए थे। इसीलिए उसके नाश की तदबीरें सोची
गईं। वह कमर कस कर मुक़ाबले को तैयार हो गया। अंग्रेज़