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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 363

मीर जाफ़र ११३
जिसमें से अधिकांश वह इस समय तक दे भी चुका था। दूसरे
इन्हीं रक़मों के कारण उसकी स्थिति इतनी ख़राब हो गई थी कि
फ़ौज की कई महीने को तनख़्वाहें उसके ज़िम्मे चढ़ गई थीं जिससे
फ़ौज में बदअमनी बढ़ती जा रही थी।
लाचार होकर मीर जाफ़र ने यह प्रार्थना की कि कम्पनी का जो
देना मेरे ज़िम्मे बाक़ी रह गया है, उसमें कुछ
• मीर जाफ़र से धन कमी कर दी जावे। मालूम होता है कि क्लाइव
की वसूली ने उसे इसकी आशा भी दिला रक्खी थी।
इसी उद्देश से मीर जाफ़र ने कई बार बड़ी बड़ी रक़में बतौर
रिशवत क्लाइव की भेंट कीं। इन रक़मों के सम्बन्ध में सन् १७७२
ई० में पार्लिमेण्ट की एक कमेटी के सामने गवाही देते हुए क्लाइव ने
कहा था कि—“नवाब की दरियादिली ने सहज ही में मुझे धनवान
बना दिया है।”*
किन्तु कमी करना तो दूर रहा, ऐन उस मौक़े पर जब कि
बिहार पर चढ़ाई करने की पूरी तैयारी हो गई, क्लाइव ने कम्पनी
की एक एक पाई चुकवाए बिना क़दम उठाने से इनकार कर दिया।
पिछली रक़मों के अलावा और भी नई नई रक़में इस अवसर पर
मीर जाफ़र से तलब की गईं। क्लाइव का बल इस समय तक खूब
बढ़ गया था। उसके पास पचास हज़ार सेना मीर जाफ़र को
कुचलने के लिए मौजूद थी। मीर जाफ़र को तरह तरह के डर

  • "The Nawab's generosity had made his fortune easy."—Clive before
    the Parliamentary Committee in 1777.
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