भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिराजुद्दौला १०१
अपनी आत्मा के साथ, अपने राजा और मालिक के साथ और
अपनी क़ौम के साथ दग़ा की, किन्तु अंगरेज़ों के साथ उसका
व्यवहार बराबर सच्चा रहा। कहते हैं कि चोर चोर आपस में एक
दूसरे के साथ बड़ा सच्चा व्यवहार करते हैं; किन्तु क्लाइव, वाट्सन
इत्यादि का व्यवहार अमींचन्द के साथ इसके विपरीत रहा।
जो सन्धि अंगरेज़ों ने मीर जाफ़र के साथ की उसमें १३ शर्तें
थीं। अमींचन्द का उनमें कहीं ज़िक्र न था। यह सन्धि सफ़ेद
काग़ज़ पर लिखी हुई थी। उसी के साथ एक दूसरी जाली सन्धि
१४ शर्तों की लाल काग़ज़ पर लिख कर अमींचन्द को दिखाई गई थी,
जिसमें एक १४ वीं शर्त यह भी थी कि मीर जाफ़र को गद्दी दिए
जाने के समय अमींचन्द को ३० लाख नक़द और उसके अलावा
नवाब के तमाम ख़ज़ाने का पाँच फ़ी सैकड़ा दिया जायगा। वाट्सन
ने इस जाली सन्धि पर दस्तख़त करने से इनकार कर दिया था,
किन्तु क्लाइव ने लुशिङ्गटन नामक एक शख़्स के हाथ से वाट्सन के
जाली दस्तख़त उस पर बनवा दिए थे।
मीर जाफ़र के नवाब बन जाने के बाद एक दिन जगतसेठ के
मकान पर जब पहली बार सन्धिपत्र पढ़कर सुनाया गया तो अमीं-
चन्द चकित होकर चिल्ला पड़ा—"यह वह सन्धि नहीं हो सकती,
जो मैंने देखी थी—वह लाल काग़ज़ पर थी।" इस पर क्लाइव ने
शान्ति के साथ उत्तर दिया—"ठीक है अमींचन्द, किन्तु यह सन्धि
सफ़ेद काग़ज़ पर लिखी हुई है।""*
- Clive's evidence before the Parliamentary Committee.