भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० भारत में अंग्रेज़ी राज
का वह जाली ख़त मुर्शिदाबाद से चला, जिसमें कहा जाता है कि
नवाब ने अंगरेज़ों को चन्दरनगर का मोहासरा करने की इजाज़त
दे दी। ११ को एक दूसरे पत्र द्वारा क्लाइव ने फ़्रांसीसियों पर यह
एक नया इलज़ाम लगाया कि आप लोगों ने अंगरेज़ी सेना से भागे
हुए कुछ बाग़ियों को अपने यहाँ छिपा रक्खा है। युद्ध के लिए
बस यह बहाना काफ़ी था। १२ को चन्दरनगर से दो मील की दूरी
पर क्लाइव की सेना आ पहुँची। इसी समय वाट्सन भी अपनी
सेना लेकर पहुँच गया। १४ मार्च को चन्दरनगर का मोहासरा
शुरू हुआ और २३ मार्च को चन्दरनगर अंगरेज़ों के हाथों में आ
गया। बंगाल के अंदर फ़्रांसीसियों की दूसरी कोठियों के विषय में
अंगरेज़ों और फ़्रांसीसियों के दरमियान एक सन्धि हो गई।
चन्दरनगर की इस सरल विजय में भी युद्ध कौशल या वीरता
[हाशिया: चन्दरनगर के दो] ने अंगरेज़ों का इतना साथ नहीं दिया जितना
[हाशिया: मुख्य विश्वास-] कूट नीति ने। दो बड़े विश्वासघातकों के
[हाशिया: घातक] नाम इस मोहासरे के इतिहास में मिलते हैं।
पहला एक फ़्रांसीसी अफ़सर लैफ़्टेनेन्ट दी तेरानो, जिसने रुपए
लेकर दरिया की ओर का मार्ग अंगरेज़ों के लिए खोल दिया और
दूसरा हुगली का हिन्दुस्तानी फ़ौजदार, महाराजा नन्दकुमार,
जिसे सिराजुद्दौला ने समाचार पाते ही एक बहुत बड़ी सेना सहित
फ़्रांसीसियों की सहायता और चन्दरनगर की भारतीय प्रजा की
रक्षा के लिए पहले से चन्दरनगर भेज दिया था, किन्तु जिसे ऐन
मौक़े पर अमींचंद के धन ने अंगरेज़ों की ओर खींच लिया।