भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिराजुद्दौला ६३
पहुँचा और उससे अपनी पिछली तमाम भूलों के लिए क्षमा माँग
कर प्रेम की प्रार्थना की। मीर जाफ़र ने कुरान हाथ में लेकर सिरा-
जुद्दौला के सामने वफ़ादारी की क़सम खाई। सिराजुद्दौला को
अविश्वास का कोई सबब न हो सकता था।
मुर्शिदाबाद से २० मील दूर पलाश वृक्षों का एक बन था, जिसे
पलाशी बाग़ भी कहते थे। उसी बन के पास (हाशिया: प्लासी की लड़ाई)
प्लासी नामक गाँव में बृहस्पतिवार २३ जून
सन् १७५७ ईसवी को दोनों सेनाओं का
आमना सामना हुआ। प्रधान सेनापति मीर जाफ़र के अलावा
सिराजुद्दौला की सेना में तीन और मुख्य सेनापति थे यारलुत्फ़
ख़ाँ, राजा दुर्लभराम और मीर मुउद्दीन जिसे मीर मदन भी
कहते थे। ४५००० सेना मीर जाफ़र, यारलुत्फ़ ख़ाँ और राजा
दुर्लभराम के अधीन थी। १२००० मीर मदन के अधीन थी।
सिराजुद्दौला का एक ख़ास प्रेमपात्र मोहनलाल भी मीर मदन के
साथ था। थोड़ी ही देर के युद्ध में क्लाइव की कायरता और
अकुशलता दोनों साफ़ चमकने लगीं। विजय साफ़ सिराजुद्दौला
की ओर नज़र आती थी। ऐन मौक़े पर मीर जाफ़र का रुख़
बदलता हुआ दिखाई दिया। कर्नल मालेसन लिखता है कि
ख़बर पाते ही सिराजुद्दौला ने अपना सन्देह दूर करने के लिए
मीर जाफ़र को अपने पास बुलवाया। उसने मीर जाफ़र को अपने
और मीर जाफ़र के सम्बन्ध और अपने नाना अलीवर्दी ख़ाँ की
याद दिलाई। इसके बाद अपनी पगड़ी सर से उतार कर सिरा-