सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

पृष्ठ 344, कुल 727 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 344

६४ भारत में अंगरेजी राज
जुद्दौला ने मीरजाफ़र के सामने ज़मीन पर फेंक दी और कहा—
“मीर जाफ़र इस पगड़ी की लाज तुम्हारे हाथों में है !” मीर
जाफ़र ने बड़े आदर के साथ पगड़ी उठाकर सिराजुद्दौला के हाथों
में दी और अपने दोनों हाथ छाती पर रख कर बड़ी गम्भीरता के
साथ फिर एक बार झुक कर सिराजुद्दौला की वफ़ादारी की क़सम
खाई। निस्सन्देह मीर जाफ़र उस समय अपनी आत्मा और
सिराजुद्दौला दोनों को जान बूझकर धोखा दे रहा था। वह
विश्वासघात पर कमर कस चुका था। सिराजुद्दौला के सामने से
हटते ही उसने फ़ौरन एक पत्र द्वारा क्लाइव को इस तमाम घटना
की सूचना दी।
सिराजुद्दौला की सेना में मीर जाफ़र ही अकेला विश्वास-
घातक न था। वास्तव में उसकी अधिकांश सेना विश्वासघातकों
से छलनी छलनी हो चुकी थी। राजा दुर्लभराम और यारलुत्फ़ ख़ाँ
भी अपने तईं शत्रु के हाथ बेच चुके थे। ऐन मौक़े पर जब कि
विजय सिराजुद्दौला के पैरों के पास खेलती दिखाई देती थी। मीर
जाफ़र, राजा दुर्लभराम और यारलुत्फ़ ख़ाँ तीनों अपनी ४५०००
सेना सहित मुड़ कर अंगरेज़ों की ओर जा मिले। थोड़ी देर बाद
सिराजुद्दौला का एक मात्र वफ़ादार सेनापति मीर मदन भी मैदान
में काम आया। करनल मालेसन लिखता है कि जब तक वीर मीर
मदन ज़िन्दा रहा वह अपनी केवल १२००० सेना से तीनों विश्वास-
घातकों के प्रयत्नों को निष्फल करता रहा। उसके जीते जी अंगरेज़ी
सेना के लिए अपने पैर जमा सकना सर्वथा असम्भव था। किन्तु