भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिराजुद्दौला ६५
मीर मदन की मृत्यु से सिराजुद्दौला लाचार हो गया। उसका
दिल टूट गया। आज तक प्लासी गाँव के लोग मीर जाफ़र की दग़ा
और मीर मदन की वफ़ादारी दोनों का अत्यन्त करुणा भरे शब्दों
में ज़िक्र करते हैं।
थोड़े से रक्तपात के बाद २३ तारीख़ की शाम तक असहाय
सिराजुद्दौला को अपने हाथी पर सवार होकर मुर्शिदाबाद की
ओर भागना पड़ा। मैदान क्लाइव और मीर जाफ़र के हाथों में रहा।
सुप्रसिद्ध अंग्रेज़ इतिहास लेखक कर्नल मालेसन उस दिन की
लड़ाई के विषय में लिखता है :—
"केवल उस समय जब कि विश्वासघातकता अपना काम कर चुकी,
जब कि विश्वासघातकता ने नवाब को मैदान से बाहर निकाल दिया, जबकि
विश्वासघातकता नवाब की सेना को ऊँचे और दुर्जेय स्थान से हटा चुकी,
केवल उस समय क्लाइव आगे बढ़ सका, इससे पहले क्लाइव के आगे बढ़ने
में उसका (और उसकी सेना का) नेस्त नाबूद हो जाना असन्दिग्ध था।"*
क्लाइव ने अपनी सेना सहित पास के गाँव दादपुर में रात
गुज़ारी। शुक्रवार २४ ता० को सवेरे क्लाइव ने
मीर जाफ़र मीर जाफ़र को अपने ख़ेमे में बुलाया। मीर
का पाप जाफ़र अपने बेटे मीरन को लेकर क्लाइव के
ख़ेमे में पहुँचा। मालूम होता है मीर जाफ़र का पाप इस समय
- "It was only when treason had done her work, when treason had
driven the Nawab from the field, when treason had removed his army from its
commanding position, that Clive was able to advance without the certainty
of being annihilated."—Colonel Malleson in Decisive Battles of India, p. 73.