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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 334

८४ भारत में अंगरेज़ी राज
इसके अलावा ६ फ़रवरी के सुलहनामे में कोई ऐसा वाक्य
न था कि इतने समय के अंदर हरेक शर्त पूरी हो जानी चाहिये।
इसलिए अब वाट्सन का सिराजुद्दौला को यह लिखना कि दस
दिन के अंदर सब शर्तें पूरी हो जानी चाहियें, केवल फिर से लड़ाई
शुरू करने का एक बहाना ढूंढना था। उधर सिराजुद्दौला ने सेना
की जो सहायता मांगी थी उसका जवाब तक नहीं दिया गया।
सिराजुद्दौला ने सच्ची गम्भीरता के साथ वाट्सन को उत्तर
दिया :—
“कुछ दिन हुए आपने मुझे जो पत्र लिखा था उसका उत्तर मैं दे चुका
हूं। जो कुछ मैंने (दिल्ली सम्राट के विषय में) लिखा है उस पर गौर
करके कृपा कर मुझे जल्दी जवाब भेजिये। मैं इस बात पर पक्का और जमा
हुआ हूं कि जो सन्धि हमने आपस में की है उसकी शर्तों पर क़ायम रहूँ,
किन्तु होली की छुट्टियों की वजह से, जिनमें मेरे बनिये (ख़ज़ांची आदि) और
मंत्री दरबार में नहीं आते, मुझे उन शर्तों पर काररवाई मुतलवी करनी पड़ी।
होली ख़तम होते ही जिन जिन बातों पर मैंने दस्तख़त किए हैं उन्हें ठीक
ठीक पूरा कर दूँगा। आप समझ सकते हैं कि इस देरी का कोई इलाज नहीं
× × × मैं जो सन्धि एक बार कर लेता हूँ उसे तोड़ना मेरे यहाँ का रिवाज
नहीं है, इसलिए आप तसल्ली रखिए कि जो सन्धि मैंने अंगरेज़ों के साथ की
है उसे टालने का मैं प्रयत्न न करूँगा × × × ।
nates, and I make little doubt but that all his engagements will be duly
executed."—Clive's letter to the Select Committee, dated 30th March 1757—
Bengal Records, vol. ii, p. 308.