भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 331, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिराजुद्दौला ८१
फ्रांसीसी विश्वास घातक के विषय में एक यूरोपियन लेखक
ब्लौकमैन लिखता है :-
"तेरानो को, जोकि इस विश्वासघात के सबब बदनाम और 'रू-स्याह'
हो गया था, अपनी कृतघ्नता के बदले में अंगरेज़ों से बहुत बड़ी रक़म प्राप्त
हुई । उसने इस धन का एक भाग अपने घर फ्रांस में अपने बूढ़े कमज़ोर
बाप के पास भेजा, किन्तु बाप ने जब अपने बेटे के इस लज्जास्पद व्यवहार
का हाल सुना तो उसने धन वापस कर दिया । इस पर तेरानो को बड़ी ग़ैरत
आई । शर्म ने 'उसका पल्ला पकड़ लिया', उसने अपने तईं मकान के अंदर
बन्द कर लिया; चन्द रोज़ के बाद उसका शरीर मकान के दरवाज़े पर
एक तौलिए से लटका हुआ मिला । ज़ाहिर था कि उसने आत्महत्या कर
ली है ।"*
दूसरे यानी भारतीय विश्वासघातक के विषय में स्क्रैफ़टन और
थॉर्नटन दोनों ने अपने ग्रन्थों में साफ़ लिखा है कि अंगरेज़ों ने
अमींचन्द की मार्फ़त नन्दकुमार को रिश्वत दी और अंगरेज़ी
सेना के पहुँचने पर फ्रांसीसियों और भारतीय प्रजा दोनों को
अरक्षित छोड़ कर नन्दकुमार अपनी तमाम सेना सहित चन्दर-
नगर से हट गया । सिलेक्ट कमेटी की १० अप्रैल सन् १७५७ की
रिपोर्ट में अमींचन्द और नन्दकुमार दोनों को धन्यवाद देते हुए
यह भी साफ़ लिखा है कि—"यदि दीवान नन्दकुमार की सेना न
हटा ली गई होती तो हमारे लिए विजय प्राप्त कर सकना असम्भव
ही होता ।"
- Notes on Sirajuddowla, Journal of the Asiatic Society, 1867.