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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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सिराजुद्दौला ६१
में और लड़ाई के ख़र्च के लिए मीर जाफ़र कम्पनी को एक करोड़
रुपए दे। इसके अलावा अलग अलग लोगों के नुक़सानों के लिए
कलकत्ते के अंगरेज़ बाशिंदों को ५० लाख, हिन्दू बाशिंदों को २०
लाख और आरमीनियन बाशिंदों को ७ लाख रुपए दिए जायँ।
कलकत्ते की खंदक़ के अंदर और बाहर चारों ओर ६०० गज़ तक
की ज़मीन अंगरेज़ों को दे दी जाय, साथ ही कलकत्ते के दक्खिन में
हुगली नदी और नमक की झीलों के दरमियान कालपी (बंगाल)
तक तमाम इलाक़े की ज़मींदारी अंगरेज़ों को दे दी जाय। जब कभी
अपनी रक्षा के लिए नवाब को अंगरेज़ी सेना की ज़रूरत हो, नवाब
उसका ख़र्च अदा करे। हुगली के नीचे दरिया के ऊपर नवाब
किसी तरह की क़िले बंदी न करे। मसनद पर बैठने के तीस दिन के
अंदर मीर जाफ़र इन शर्तों को पूरा कर दे और जब तक वह इस
सन्धि के अनुसार चलता रहेगा, कम्पनी उसे उसके शत्रुओं को
दमन करने में मदद देती रहेगी।
साज़िश अब पूरी तरह पक चुकी थी, किन्तु वाट्स और कई
[पार्श्व टिप्पणी: दोनों ओर से सेनाओ का कूच] अंगरेज़ अभी तक मुर्शिदाबाद में मौजूद थे।
लड़ाई का खुला एलान करने से पहले उन्हें वहाँ
से हटा लेना ज़रूरी था।
१२ जून की शाम को 'बाग़ों में हवा ख़ोरी
करने'* के लिए वाट्स और उसके अंगरेज़ साथियों ने नवाब से
इजाज़त ली और इस बहाने रातों रात वे मुर्शिदाबाद से भाग


  • Ive's Voyages, p. 145.