भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश ६
भारत से पुर्तगालियों की सत्ता के इतनी जल्दी मिट जाने का
एक सबब यह भी बताया जाता है कि बहुत अधिक धनाढ्य हो
जाने से ये लोग भोग विलास में पड़ गए थे। एक पुर्तगाली लेखक
लिखता है:—
“पुर्तगालनिवासियों ने एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में सलीब
(क्रॉस) लेकर भारतवर्ष में प्रवेश किया, किन्तु जब उन्हें यहाँ बहुत अधिक
सोना नज़र आया तो उन्होंने सलीब को अलग रखकर उस हाथ से अपनी
जेबें भरनी शुरू कर दीं और जब उनकी जेबें इतनी भारी हो गईं कि वे उन्हें
एक हाथ से न सँभाल सके तो उन्होंने तलवार भी फेंक दी। इस हालत में
जो लोग उनके बाद आए वे आसानी से उन पर हावी हो सके।*”
पुर्तगालियों के क़रीब सौ साल पीछे १६ वीं सदी के अंत में,
एक दूसरे यूरोपियन देश हॉलैण्ड के रहने वाले, जिन्हें “डच” कहते
हैं भारत पहुँचे। इन लोगों ने आसानी से पुर्तगालियों के रहे सहे
जहाज़ आदि जलाकर उनकी बाक़ी सत्ता अपने हाथों में ले ली।
आज दिन पुर्तगालियों का राज हिन्दोस्तान के अंदर केवल गोआ
और दो एक छोटे छोटे टापुओं पर बाक़ी रह गया है।
यूरोप में डच लोगों ने भारत के धन वैभव का ज़िक्र पहले
पहल पुर्तगालियों से सुना। उनके दिल में भी
भारत में भारत पहुंच कर धन कमाने की अभिलाषा पैदा
डच जाति हुई। जल-मार्ग से भारत आने के उन्होंने अनेक
- Alfonzo-de-Souza, Governor of Portuguese India, 1545.
१० भारत में अंगरेज़ी राज
निष्फल प्रयत्न किये । अन्त में सन् १५६८ ईसवी तक इनके जहाज़
अफ़रीका के नीचे से जावा होकर भारत पहुंचने लगे ।
डच जाति के लिखे हुए इतिहास से मालूम होता है कि भारत
के नरेशों ने इनका वैसा ही अच्छा स्वागत किया, जैसा शुरू में
पुर्तगालियों का किया था। पुर्तगालियों से इनकी लाग डाट थी ।
जिस तरह पुर्तगालियों ने अरब सौदागरों की रोज़ी छीनी थी,
उसी तरह डच अब पुर्तगालियों की रोज़ी छीनने या कम से कम
उसमें हिस्सा बटाने के लिये उत्सुक थे। इन लोगों ने भारतवासियों
से पुर्तगालियों की ख़ूब बुराइयाँ कीं । मुग़ल सम्राट ने इन्हें अब
व्यापार के लिये कोठियाँ बनाने और अपनी रक्षा के लिये क़िले-
बंदी करने की इजाज़त दे दी ।
सब से पहले पुलीकट और सद्रास नामक स्थानों पर इन्होंने
अपनी कोठियाँ बनाईं और क़िले खड़े किये । पुलीकट मौजूदा
मद्रास के उत्तर में और सद्रास मद्रास के दक्खिन में है । बढ़ते बढ़ते
सन् १६६३ ईसवी में उनकी एक कोठी आगरे में थी, जिसमें जौ
सड़ाकर उससे शराब तैयार की जाती थी। इसी तरह की उनकी
कोठियाँ सूरत, अहमदाबाद और पटने में मौजूद थीं। धीरे धीरे
बंगाल में भी उनका व्यापार बढ़ने लगा और सन् १६७५ में
उन्होंने चुंचड़ा (चिनसुरा) में एक कोठी क़ायम की ।
जब तक डच लोगों की निगाह केवल व्यापार पर रही, उन्होंने
भारत से ख़ूब धन कमाया, किन्तु इसके बाद उनमें भारत के अंदर
अपना राज क़ायम करने की इच्छा उत्पन्न हुई । इसी बीच अंगरेज़
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश ११
जाति भी भारत पहुंच गई और इस देश को अपने अधीन करने के
लिये हर तरह के उपाय करने लगी। डच जाति को अधिक चतुर
अंगरेज़ों के साथ टक्कर लेनी पड़ी। प्लासी की लड़ाई के दो साल बाद
अगस्त सन् १७५६ ईसवी में डच लोगों के सात जंगी जहाज़ एका-
एक चुंचड़ा के नीचे आ धमके। अंगरेज़ों का प्रभाव उस समय
ख़ासा जम चुका था। अंगरेज़ों ने उन्हें चुंचड़ा तक पहुंचने भी न
दिया और बंगाल के नवाब की सहायता से पूरी तरह शिकस्त
देकर पीछे हटा दिया। उसी समय से डच लोगों का भारतीय
व्यापार घटने लगा। अंत में सन् १८०५ ईसवी में अंगरेज़ों ने
चुंचड़ा और मलाका के बदले में उन्हें सुमात्रा का टापू देकर डच
जाति के अंतिम चिन्ह को इस देश से मिटा दिया।
१६वीं सदी के शुरू में पुर्तगालियों की हिन्दोस्तानी तिजारत बढ़ने
भारत पर अंगरेज़ों से पुर्तगाल की राजधानी लिसबन का महत्व
की दृष्टि और उसका वैभव यूरोप में दिनों दिन बढ़ता जा
रहा था। इङ्गलिस्तान के रहने वालों को इससे
ईर्षा होना स्वाभाविक था। इङ्गलिस्तान में उस समय ब्रिस्टल का
बंदरगाह तिजारत की दृष्टि से सबसे आगे था। हर यूरोपियन
क़ौम के लोग उन दिनों दूसरी क़ौम के माल से लदे जहाज़ों को
पकड़ कर लूट लेना अपने लिये एक जायज़ व्यापार समझते थे।
भारत और एशियाई समुद्रों में भी इन लोगों ने इस तरह की लूट
का बाज़ार ख़ूब गरम कर रक्खा था। ब्रिस्टल के नाविक अनेक
पुश्तों से बड़े मशहूर समुद्री डाकू गिने जाते थे। सबसे पहले
१२ भारत में अंगरेज़ी राज
ब्रिस्टल ही के एक सौदागर ने इङ्गलिस्तान के बादशाह आठवें
हेनरी को भारत के मार्ग की खोज कराने की सलाह दी।
पचास साल से कुछ ऊपर तक इङ्गलिस्तान के बड़े बड़े नाविक
उत्तर-पच्छिम से होकर भारत पहुँचने के निष्फल प्रयत्न करते रहे।
सन् १५७८ में जब किइङ्गलिस्तान का एक मशहूर नाविक सर फ़्रैंसिस
ड्रेक भारत से लिसबन जाने वाले एक पुर्तगाली जहाज़ को पकड़ कर
लूट रहा था, उस लूट में उसे कुछ नक़शे मिले जिनसे अंगरेज़ों को
पहली बार भारत के उस समय के जल-मार्ग का कुछ पता चला।
सन् १६०० ई० में इङ्गलिस्तान की रानी एलिज़ेबेथ ने सुप्रसिद्ध
“ईस्ट इण्डिया कम्पनी” की रचना की। यह
ईस्ट इण्डिया कम्पनी उन अंगरेज़ व्यापारियों की एक मंडली
कम्पनी थी, जो हिन्दोस्तान के साथ तिजारत करने की
इच्छा रखते थे। यह बात याद रखने योग्य है कि जो फ़रमान रानी
एलिज़ेबेथ ने इस मौक़े पर जारी किया, उसमें इस कम्पनी को इस
तरह के साहसी लोगों की मंडली (Society of Adventurers)
कहा गया है जो लूट, सट्टे आदि के लिये निकलते हैं और जो अपने
धन कमाने के उपायों में सच झूठ, ईमानदारी बेईमानी अथवा
न्याय अन्याय का अधिक ख़याल नहीं रखते। कम्पनी के डाइरेक्टरों
ने शुरू ही में इस बात का फ़ैसला कर लिया था कि हम “किसी
ज़िम्मेदारी की जगह किसी शरीफ़ आदमी को नियुक्त न करेंगे*।”
- “Not to employ any gentleman in any place of charge.”—Bruce's Annals
of the Hon'ble East India Company, vol. i, p. 128.
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश १३
और मलका के नाम अपनी दरख़्वास्त में लिख दिया था कि—"हमें
अपना व्यापार अपने ही जैसे आदमियों द्वारा चलाने की इजाज़त
होनी चाहिये, क्योंकि यदि लोगों को इस बात का संदेह भी हो
गया कि हम शरीफ़ आदमियों को अपने यहाँ नौकर रक्खेंगे, तो
मुमकिन है हमारे बहुत से साहसिक पत्तीदार अपनी पत्तियाँ वापस
ले लें *।” यही भारत के अंदर इस अंगरेज़ कम्पनी के ढाई सौ
साल के कारनामों और उसकी समस्त नीति की कुंजी है। इन ढाई
सौ साल के अंदर कम्पनी के मेम्बरों, मुलाज़िमों आदि में बिरले ही
ऐसे हुए होंगे, जिन्हें 'शरीफ़' कहा जा सके।
नक़्शे मिलने के तीस साल बाद यानी सन् १६०८ ईस्वी में
पहला अंगरेज़ी जहाज़ हिन्दोस्तान पहुँचा। इस
भारत में पहला जहाज़ का नाम 'हेक्टर' था। 'हेक्टर' प्राचीन
अंगरेज़ यूनान के एक वीर योद्धा का नाम था। अंगरेज़ी
में हेक्टर शब्द का अर्थ 'हेकड़ीबाज़' या 'झगड़ालू' है। यह
जहाज़ सूरत के बन्दरगाह में आकर लगा। सूरत उस समय
भारतीय व्यापार का एक विशेष केन्द्र था। जहाज़ का कप्तान
हॉकिन्स पहला अंगरेज़ था जिसने समुद्र के रास्ते आकर
भारत की भूमि पर क़दम रखा। इङ्गलिस्तान के बादशाह जेम्स
अव्वल की ओर से दिल्ली के मुग़ल सम्राट के नाम हॉकिन्स
अपने साथ एक पत्र लाया, जो उसने आगरे पहुँच कर सम्राट
जहाँगीर के सामने पेश किया। यह बात केवल तीन सौ साल पहले
- Ibid.
१४ भारत में अंगरेज़ी राज
की है। उस समय के इङ्गलिस्तान के बादशाह जेम्स अव्वल के राज
और भारत के मुग़ल साम्राज्य की—क्षेत्रफल, आबादी, धन, वैभव,
तिजारत, कला कौशल, दस्तकारी, खुशहाली, शासन-प्रबन्ध, विद्या,
बल—किसी बात में भी किसी प्रकार की तुलना नहीं की जा सकती।
जहाँगीर के दरबार में उस समय किसी को इस बात का गुमान
भी न हो सकता था कि दूरवर्ती पच्छिम की एक छोटी सी निर्बल,
असभ्य या अर्द्धसभ्य जाति का जो दूत उस समय दरबार में
दोज़ानू होकर ज़मीन चूम रहा था उसी के वंशज एक रोज़ मुग़ल
साम्राज्य के अङ्ग भङ्ग हो जाने पर हिन्दोस्तान के ऊपर शासन
करने लगेंगे। जहाँगीर ने हॉकिन्स की खूब ख़ातिर की। किन्तु
पुर्तगाली पहले से दरबार में मौजूद थे, उन्होंने जहाँगीर से अंगरेज़ों
की खूब बुराइयाँ कीं। सन् १६१२ ईसवी में अंगरेज़ों ने सूरत के
पास कुछ पुर्तगाली जहाज़ों पर हमला करके उन्हें गिरफ़्तार कर
लिया। उसी समय से सूरत में पुर्तगालियों का प्रभाव घटने और
अंगरेज़ों का प्रभाव बढ़ने लगा।
६ फ़रवरी सन् १६१३ को जहाँगीर ने एक शाही फ़रमान के
जहाँगीर और ज़रीये अंगरेज़ों को अपनी तिजारत के लिये सूरत
अंगरेज़ में एक कोठी बनाने की इजाज़त दे दी और यह
भी इजाज़त दे दी कि मुग़ल दरबार में इङ्गलिस्तान
का एक एलची रहा करे।
- इङ्गलिस्तान के बादशाह ने सर टॉमस रो को मुग़ल दरबार में
अपना पहला एलची नियुक्त करके भेजा। सर टॉमस रो सन् १६१५
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश १५
ईसवी में भारत पहुँचा और अपनी नम्रता और सौजन्य द्वारा उसने
अंगरेज़ी तिजारत के लिये सम्राट से अनेक नई रियायतें हासिल
कर लीं ।
मिसाल के तौर पर सन् १६१६ में अंगरेज़ों को कालीकट और
मछलीपट्टन में कोठियाँ बनाने की इजाज़त मिल गई । उस समय
भारत में रहने वाले अंगरेज़ चूंकि भारत सम्राट की प्रजा थे, इसलिये
यदि उनमें कोई झगड़ा होता था तो देशी अदालतों में ही उसकी
सुनाई होती थी और वहीं से उन्हें दंड आदि दिये जाते थे। सन्
१६२४ ईसवी में अंगरेज़ों की प्रार्थना पर जहाँगीर ने एक शाही
फ़रमान इस मज़मून का जारी कर दिया कि आइन्दा अपनी कोठी
के अंदर रहने वाले कम्पनी के किसी मुलाज़िम के क़सूर करने पर
अंगरेज़ उसे स्वयं दंड दे सकते हैं। इस घटना की आलोचना करते
हुए एक विद्वान अंगरेज़ इतिहास लेखक टोरेन्स लिखता है :—
“बादशाह न्यायशील और बुद्धिमान था । वह उनकी आवश्यकताओं को
समझता था। जो उन्होंने माँगा उसने मंज़ूर कर लिया। उसे यह स्वप्न में भी
नज़र न आ सकता था कि एक दिन अंगरेज़ इसी छोटी सी जड़ से बढ़ते बढ़ते
बादशाह की प्रजा और उसके उत्तराधिकारियों तक को दंड देने का दावा करने
लगेंगे और यदि उनका विरोध किया जायगा तो प्रजा का संहार कर डालेंगे
और बादशाह के उत्तराधिकारी को बाग़ी कह कर आजीवन क़ैद कर लेंगे* ।”
- "The Padishah, being a just man and wise, understood their needs, and
yielded what they asked, little dreaming that the time would come, when, from
such root of title, they would claim jurisdiction over his subjects and succes-
१६ भारत में अंग्रेज़ी राज
इसके बाद शाहजहाँ का समय आया । सन् १६३४ ई० में पुर्त-
शाहजहाँ और गालियों को बंगाल से निकालने के बाद शाहजहाँ
अंगरेज़ ने अंगरेज़ों को बंगाल में तिजारत करने की
इजाज़त दे दी। सन् १६३६ ई० में अंगरेज़ों ने
मद्रास में अपनी एक कोठी क़ायम की । उन दिनों बंगाल में
अंगरेज़ों को अन्य देशी व्यापारियों की तरह अपने माल पर चुंगी
देनी पड़ती थी और उनके जहाज़ शाही फ़रमान के अनुसार हुगली
के बहुत नीचे पिपली नामक स्थान पर रुक जाते थे । हुगली तक
जहाज़ लाने की उन्हें इजाज़त न थी ।
सन् १६४० ई० में शाहजहाँ की एक लड़की किसी तरह जल
गई । उसके इलाज करने वालों में एक अंगरेज़ डॉक्टर भी था ।
शाहज़ादी अच्छी हो गई । जब इलाज करने वालों को इनाम व
इकराम देने का समय आया, तो अंगरेज़ डॉक्टर की प्रार्थना पर
शाहजहाँ ने बंगाल भर के अंदर अंगरेज़ों के माल पर चुंगी माफ़ कर
दी और उन्हें उस प्रान्त में कोठियाँ बनाने तथा उनके जहाज़ों को
हुगली तक आने की इजाज़त दे दी । इसी फ़रमान के अनुसार
१६४० ई० में कलकत्ते की कोठी बनी । शाहशुजा उस समय बंगाल
का सूबेदार था, उसने सम्राट के फ़रमान के अनुसार 'परदेसी'
अंगरेज़ों को अपना कारबार जमाने में हर तरह की मदद दी ।
sons, and, as the penalty of resistance, decimate the one, and imprison the
other for life as guilty of rebellion. "-Torrens' Empire in Asia, pp. 10, 11.
Allahabad.
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश १७
इसके बाद औरंगज़ेब का समय आया। बम्बई का टापू, जहाँ
पर उस समय केवल एक छोटी सी पुर्तगाली बस्ती
बम्बई का टापू थी, सन् १६६१ ई० में इङ्गलिस्तान के बादशाह
को पुर्तगालियों से दहेज़ में मिला और सन् १६८८ ईसवी में
ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने उसे अपने बादशाह से ख़रीद लिया। सन्
१६६४ ईसवी के निकट शिवाजी का बल बढ़ने लगा। सूरत के
अंगरेज़ कोठीवालों ने औरंगज़ेब से वादा किया कि हम शिवाजी
के ख़िलाफ़ आपको मदद देंगे और मुग़ल साम्राज्य की ओर से
सूरत की रक्षा करेंगे। इससे खुश होकर औरंगज़ेब ने उनके साथ
कई तरह की नई रिआयतें कर दीं।
किन्तु शुरू के इन अंगरेज़ व्यापारियों का सदाचार और व्यवहार
अत्यन्त गिरा हुआ था। किसी भी दूसरी क़ौम
अंगरेज़ व्यापारियों के माल से लदे जहाज़ को पकड़ कर लूट लेना
का चरित्र इनके लिये एक मामूली बात थी। स्वयं अपने
अंगरेज़ भाइयों और अन्य यूरोपियनों के साथ इनके सुलूक की
यह हालत थी कि जो मनुष्य इनसे सस्ता माल बेचता था या
किसी और तरह उससे इनके व्यापार में बाधा पड़ती थी, उसे ये
मौक़ा पाकर पकड़ लेते थे और या तो कोड़े मार मार कर मार
डालते थे और या अपनी कोठी में बंद करके भूखों मार देते थे ।*
- “ . . . they made it a rule to whip to death or starve to death those
of, whom they wished to get rid, . . . to murder private traders.”—Mill,
Wilson's note, vol. i., Chap. ii.
२
१८ भारत में अंगरेज़ी राज
भारतवासियों के साथ इनका व्यवहार हद दर्जे की ज़्यादती
और बेईमानी का था। सूरत की कोठी के अंगरेज़ों की बाबत एक
विद्वान् अंगरेज़ पादरी फ़िलिप एण्डरसन लिखता है :-
"ज्यों ज्यों इन साहसिक आगन्तुकों की तादाद बढ़ती गई, उनसे अंगरेज़
क़ौम की नेकनामी नहीं बढ़ी। इनमें से बहुत ज़्यादा लोग ज़बरदस्तियाँ और
बेईमानियाँ करते थे $\times$ $\times$ $\times$ हिन्दू और मुसलमान दोनों अंगरेज़ों को गाय
खाने वाले और आग पीने वाले नीच दरिन्दे समझते थे और कहते थे कि
ये लोग उन बड़े बड़े कुत्तों से भी ज़्यादा जंगली हैं जिन्हें ये अपने साथ लाते
हैं। ये शैतान की तरह लड़ते हैं और अपने बाप को भी दग़ा दे लेते हैं और
दूसरों से अपना काम निकालने या उनकी चीज़ ले लेने में गोलियों की
बौछार या भालों की मार और माल की गठरी या रुपयों की थैली चारों में से
किसी का भी उपयोग करने के लिये हरदम तय्यार रहते हैं।"*
अंगरेज़ों के इस व्यवहार को देख कर भारतवासियों का ख़याल
ईसाई धर्म के विषय में भी उन दिनों बहुत ख़राब हो गया था। वही
विद्वान आगे चल कर लिखता है :-
"किन्तु टेरी साहब का बयान है कि भारतवासी ईसाई धर्म को बहुत
- "As the number of adventurers increased the reputation of the English
was not improved. Too many committed deeds of violence and dishonesty.
. . . Hindus and Musalmans considered the English a set of cow-eaters and
fire-drinkers, vile brutes, fiercer than the mastiffs which they brought with
them, who would fight like Eblis, cheat their own fathers, and exchange with
the same readiness a broadside of shot and thrusts of boarding pikes, or a bale
of goods and a bag of rupees."—The English in Western India, by Rev.
Philip Anderson, p. 22.
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश १६
गिरी हुई चीज़ ख़याल करते थे। सूरत में लोगों के मुँह से इस प्रकार के
वाक्य प्रायः सुनने में आते थे—'ईसाई मज़हब शैतान का मज़हब है, ईसाई
बहुत शराब पीते हैं, ईसाई बहुत बदमाशी करते हैं, और बहुत मार पीट करते
हैं, दूसरों को बहुत गालियाँ देते हैं।' टेरी ने इस बात को स्वीकार किया है
कि भारतवासी स्वयं बड़े सच्चे और ईमानदार थे और अपने तमाम वादों को
पूरा करने में पक्के थे, किन्तु यदि कोई हिन्दोस्तानी सौदागर अपने माल की
कुछ क़ीमत बताता था और उस क़ीमत से बहुत कम ले लेने के लिए उससे
कहा जाता था तो वह प्रायः जवाब में कह पड़ता था—'क्या तुम मुझे
ईसाई समझे हो, जो मैं तुम्हें धोखा देता फिरूँगा ?'*
अंगरेज़ सब से पहले सूरत में पहुँचे और सब से अंत में
बंगाल पहुँचे, किन्तु वहाँ भी उनका व्यवहार वैसा ही रहा।
इतिहास लेखक सी० आर० विल्सन लिखता है :—
"बंगाल में भी अंगरेज़ अपने झगड़ालूपन के लिये उतने ही बदनाम
थे x x x वहाँ का बूढ़ा सूबेदार नवाब शाइस्ता ख़ाँ उन्हें 'नीच, झगड़ालू
लोगों और जुआचोरों की कम्पनी' कहा करता था और आजकल का कोई ज़बर-
दस्त प्रामाणिक इतिहासज्ञ इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि नवाब के
- " But, according to Terry, the natives had formed a mean estimate of
Christianity. It was not uncommon to hear them at Surat giving utterance to
such remarks as—Christian religion, devil religion, Christian much drunk,
Christian much do wrong, much beat, much abuse others. Terry admitted
that the natives themselves were 'very square' and exact to make good all
their engagements ; but if a dealer was offered much less for his articles than
the price which he had named, he would be apt to say, 'What ! dost thou
think me a Christian, that I would go about to deceive thee ? ' "—Ibid, p. 32
२० भारत में अंगरेज़ी राज
पास अपने इस कथन के लिये काफ़ी अच्छे प्रमाण थे। उस समय के तमाम
उल्लेखों की पूरी तरह छान बीन करने के बाद सर हेनरी यूल के दिल
पर यह असर पड़ा कि बंगाल की खाड़ी के अंदर कम्पनी के मुलाज़िमों की
नैतिक और सामाजिक अवस्था 'निस्सन्देह भयंकर' थी।'*
थोड़े ही दिनों में ख़ास कर बम्बई के अन्दर अंगरेज़ सौदागरों के
अत्याचार इतने बढ़ गए कि उनकी शिकायत
[पार्श्व-शीर्षक: औरंगज़ेब और] औरंगज़ेब के कानों तक पहुँची । फ़ौरन
[पार्श्व-शीर्षक: अंगरेज़] औरंगज़ेब ने हुकुम जारी कर दिया कि इन
लोगों की कोठियाँ ज़ब्त कर ली जायँ और इन्हें मार कर हिन्दो-
स्तान से बाहर निकाल दिया जाय। सूरत, विशाखपट्टन आदि
कई स्थानों की अंगरेज़ी कोठियाँ ज़ब्त कर ली गईं और वहाँ से
अंगरेज़ों को निकालकर बाहर कर दिया गया। बम्बई को घेर
लिया गया। किन्तु ये लोग काफ़ी चालाक थे, वे फ़ौरन औरंगज़ेब
के क़दमों पर गिर पड़े। उन्होंने कान पकड़ कर अपनी पिछली
ख़ताओं के लिये माफ़ी चाही। आइन्दा के लिये नेक चलनी का
वादा किया और मुग़ल सम्राट से जांबख़्शी की प्रार्थना की।†
- "The English in Bengal were equally notorious for their quarrels. . . .
The old Viceroy, Shayista Khan, called them 'a company of base, quarrelling
people and foul dealers,' and our great modern authority will not gainsay that
the noble had good grounds for his assertion. The impression of the moral
and social tone of the Company's servants in the Bay which has been left on
the mind of Sir Henry Yule by his exhaustive study of the records of the time is
'certainly a dismal one'"—Dr. C. R Wilson's Early Annals of the English
in Bengal, vol. i. p. 66.
† "Stooped to the most abject submission"—Mill, book i, chap v.
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश २१
औरंगज़ेब ने उदारता में आकर और उन पर विश्वास करके उन्हें बख्श
दिया और सूरत आदि की कोठियाँ उन्हें वापस दे दीं। सन् १६९०
में औरंगज़ेब ने उन्हें कई नई कोठियाँ क़ायम करने और वहाँ पर
अपनी हिफ़ाज़त के लिये क़िलेबंदी करने तक की इजाज़त दे दी।
औरंगज़ेब ही के समय में उसके पौत्र अज़ीमशाह ने बंगाल के
सूबेदार की हैसियत से हुगली नदी के ऊपर छूतानटी, कलकत्ता
और गोबिन्दपुर नाम के तीन गाँव बतौर जागीर कम्पनी को दे
दिये। उसी समय फ़ोर्ट विलियम क़िले की बुनियाद डाली गई।
जिस समय पहले पहल यह क़िलेबंदी की जा रही थी, औरंगज़ेब
के पास इसकी ख़बर पहुँची। औरंगज़ेब को सलाह दी गई कि इस
क़िलेबंदी को रोका जावे, किन्तु दिल्ली सम्राट की नज़रों में अंगरेज़
उस समय एक इतनी तुच्छ चीज़ थे कि उनकी इन कार्रवाइयों में
दख़ल देना उसे ग़ैर ज़रूरी मालूम हुआ। इन ग़रीब परदेसियों के
साथ वह हर तरह दया और उदारता का ही व्यवहार करना
चाहता था। औरंगज़ेब ने उत्तर दिया :—
"मैं इन चीज़ों में क्यों दखल दूं ? बहुत मुमकिन है कि आसपास की
मेरी देशी रिआया उनसे ईर्षा रखती हो और झगड़े करती हो, फिरंगी लोग
अपनी शक्ति भर अपनी हिफ़ाज़त का इन्तज़ाम क्यों न करें ? ये ग़रीब लोग
इतनी दूर से आये हैं और अपनी रोज़ी के लिये इतनी मेहनत करते हैं। मैं
उन्हें क्यों रोकूं ?"*
- "If he (The Mogul) was told of their planting stockade and putting
a sort of fortification there, why should he trouble himself regarding it?
२२ भारत में अंगरेज़ी राज
औरंगज़ेब के बाद मुग़ल साम्राज्य की निर्बलता का समय
आया। अंगरेज़ों को मौक़ा मिला, उनके अत्याचारों ने और अधिक
गम्भीर तथा भयंकर रूप धारण किया। इस बीच धीरे धीरे भारत
के पूर्वी तथा पश्चिमी तटों पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी की अनेक
नई कोठियाँ बन गईं। अंगरेज़ी व्यापार भारत में बढ़ता गया।
कम्पनी के पत्तीदार और छोटे बड़े मुलाज़िम सभी भारत के धन
से मालामाल हो गए। औरंगज़ेब की मृत्यु के ठीक पचास साल
बाद बंगाल में अंगरेज़ी राज की नींव रक्खी गई, जिसकी कहानी
एक दूसरे स्थान पर बयान की जायगी।
अन्तिम यूरोपियन क़ौम, जो इस सिलसिले में भारत आई,
फ़्रांसीसी थी। फ्रांसीसी या फ्रेंच फ्रांस देश के
फ़्रांसीसियों का रहने वालों को कहते हैं। ईस्ट इण्डिया कंपनी
प्रवेश के मुक़ाबले की एक फ़्रांसीसी कंपनी ठीक उसी
उद्देश से सन् १६६४ ईसवी में क़ायम हुई। फ़्रांसीसियों ने सन्
१६६८ में सूरत, सन् १६६६ में मछलीपट्टन और सन् १६७४ में
पुद्दुचरी (पाण्डिचेरी) में अपनी कोठियाँ बनाईं।
फ़्रांसीसियों की नीति आरम्भ से यह थी कि वे भारतीय
शासकों की खुशामद करके जिस तरह हो उन्हें अपने पक्ष में रखने
की कोशिश करते थे। पुद्दुचरी का नगर उस समय कर्नाटक
Likely enough his native subjects around them were jealous and disposed
to be quarrelsome. Why should not Firanghees defend themselves as best
they might? Poor people! they had come a long way, and seemed to
work hard—he would not interfere. "—Torrens' Empire in Asia, pp. 4, 5.
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश २३
के राज में था। दिल्ली सम्राट का एक सूबेदार दक्खिन में रहता
था। करनाटक का नवाब और कई अन्य राजा व नवाब, इस
सूबेदार के मातहत थे। पुद्दुचरी के फ़्रांसीसी मुखिया डूमास ने
करनाटक के नवाब दोस्तअली खाँ को ख़ूब खुश कर रक्खा था।
यह समय १८ वीं सदी के शुरू का समय था, जब कि औरंगज़ेब
की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य का बल घटना शुरू हो गया था।
इस बीच मराठों ने करनाटक पर हमला किया। डूमास ने मौक़ा
पाकर नवाब को सहायता देने का वादा किया। नवाब से इजाज़त
लेकर उसने पुद्दुचरी में क़िलेबंदी कर ली और १२०० यूरोपियन
तथा ५००० हिन्दोस्तानियों की सेना उसमें जमा करली। यूरोप
निवासियों के हाथों में यह पहली हिन्दोस्तानी सेना थी। डूमास
की सहायता काम कर गई। मराठों का करनाटक विजय करने का
प्रयत्न निष्फल गया। करनाटक का नवाब और दिल्ली का सम्राट
दोनों डूमास से खुश हो गए। सम्राट ने प्रसन्न होकर डूमास को
'नवाब' की उपाधि प्रदान की और मुग़ल साम्राज्य के अधीन उसे
दो हज़ार सवारों का सेनापति नियुक कर दिया। पुद्दुचरी के
इलाक़े पर अब फ़्रांसीसियों का पूरा क़ब्ज़ा हो गया।
सन् १७४१ में डूमास की जगह दूप्ले फ़्रांसीसी कंपनी की ओर
से पुद्दुचरी का हाकिम नियुक्त हुआ। दूप्ले एक अत्यंत योग्य और
चतुर सेनापति था, उसके पूर्वाधिकारी डूमास को दिल्ली से नवाब
का ख़िताब मिल चुका था। दूप्ले ने खुद अपने तईं 'नवाब दूप्ले'
कहना शुरू कर दिया। दूप्ले पहला यूरोपनिवासी था जिसके मन
२४ भारत में अंगरेज़ी राज
में भारत के अंदर यूरोपियन साम्राज्य क़ायम करने की आकांक्षा
उत्पन्न हुई । डूपले को भारतवासियों में दो ख़ास कमज़ोरियां नज़र
आईं, जिनसे उसने पूरा पूरा फ़ायदा उठाया । एक यह कि भारत के
विविध नरेशों की उस समय की आपस की ईर्षा और प्रतिस्पर्धा के
दिनों में विदेशियों के लिये कभी एक और कभी दूसरे का पक्ष लेकर
धीरे धीरे अपना बल बढ़ा लेना कुछ कठिन न था, और दूसरे यह
कि इस कार्य के लिये यूरोप से सेनाएं लाने की आवश्यकता न थी।
बल, वीरता अथवा सहनशक्ति में भारतवासी यूरोपनिवासियों
से कहीं बढ़ कर थे । अपने सामयिक अफ़सरों की वफ़ादारी का
भाव भी भारतीय सिपाहियों में ज़बरदस्त था । किन्तु राष्ट्रीयता
के भाव या 'स्वदेश' के विचार तक का उनमें अभाव था ।
उन्हें बहुत आसानी से यूरोपियन ढंग की सैनिक शिक्षा दी जा
सकती थी और यूरोपियन अफ़सरों के अधीन रक्खा जा सकता
था । इसलिये विदेशियों का यह सारा कार्य बड़ी सुन्दरता के साथ
हिन्दोस्तानी सिपाहियों से चल सकता था । डूपले को अपनी इस
महत्वाकांक्षा की पूर्ति में केवल एक बाधा नज़र आती थी, और
वह थी अंगरेज़ों की प्रतिस्पर्धा ।
यूरोप के अंदर भी उन दिनों फ़्रांस और इंगलिस्तान एक दूसरे
के शत्रु थे। थोड़े दिनों के बाद वहाँ फ़्रांस और
[हाशिया: फ़्रांसीसी और] इंगलिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया । कर्नाटक
[हाशिया: अंगरेज़] में क़रीब सौ साल से मद्रास की बस्ती अंगरेज़ों के
अधिकार में थी और यही उस समय उनके भारतीय व्यापार का मुख्य
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश २५
केन्द्र था। डूप्ले ने मद्रास अंगरेज़ों से छीन लेने का विचार किया।
दोस्तअली ख़ाँ का उत्तराधिकारी अनवरुद्दीन इस समय करनाटक
का नवाब था। डूप्ले ने अंगरेज़ों के विरुद्ध नवाब के ख़ूब कान भरे।
लाबूरदौने नामक एक फ्रांसीसी के अधीन उसने कुछ जल सेना मद्रास
विजय करने के लिये भेजी और नवाब से यह वादा किया कि अंग-
रेज़ों को मद्रास से निकाल कर मैं नगर आपके हवाले कर दूँगा।
लाबूरदौने ने मद्रास विजय कर लिया, किन्तु इसके साथ ही अंग-
रेज़ों से चालीस हज़ार पाउण्ड नक़द लेकर मद्रास फिर उनके
हवाले कर देने का वादा कर लिया। इसके बाद डूप्ले ने अपने वादे
के अनुसार मद्रास नवाब के हवाले कर देने की कोई कोशिश न की
और न लाबूरदौने के वादे के अनुसार उसे अंगरेज़ों ही को वापस
किया। नवाब को जब इस छल का पता चला, वह फ़ौरन सेना
लेकर मद्रास की ओर रवाना हुआ। डूप्ले भी अपनी सेना सहित
नवाब को रोकने के लिये बढ़ा। ४ नवम्बर सन् १७४६ को मद्रास
के निकट डूप्ले की सेना और नवाब करनाटक की सेना में संग्राम
हुआ। डूप्ले की सेना में भी अधिकतर भारतीय सिपाही ही थे। इस
भारतीय सेना और अपने तोपख़ाने के बल डूप्ले ने विजय प्राप्त की।
इतिहास में यह पहली विजय थी जो किसी यूरोपियन ने किसी
भारतीय शासक के विरुद्ध प्राप्त की। विदेशियों के हौसले और
अधिक बढ़ गये !
अंगरेज़ों और नवाब करनाटक दोनों को फ्रांसीसी धोखा दे
चुके थे, इसलिए ये दोनों अब फ्रांसीसियों के विरुद्ध मिल गए।
२६ भारत में अंगरेज़ी राज
सन् १७४८ ईस्वी में अंगरेज़ी सेना ने पुदुदुच्चरी पर हमला किया,
किन्तु दूपले की सेना ने इस बार भी अंगरेज़ों को हरा दिया। इसी
समय यूरोप के अन्दर फ्रांस और इंगलिस्तान के बीच संधि हो
गई, जिसमें एक शर्त यह तय हुई कि मद्रास फिर से अंगरेज़ों के
सुपुर्द कर दिया जाय। इस प्रकार करनाटक से अंगरेज़ों को निकाल
देने के विषय में दूपले की आशा को एक ज़बरदस्त धक्का पहुंचा
और फ्रांसीसियों की बरसों की मेहनत पर पानी फिर गया।
किन्तु दूपले का हौसला इतनी जल्दी टूटने वाला न था।
फ्रांसीसी और अंगरेज़ी कंपनियों में प्रतिस्पर्द्धा बराबर जारी रही।
ये दोनों कंपनियां इस देश में अपनी अपनी सेनाएं रखती थीं और
जहाँ कहीं किसी दो भारतीय नरेशों में लड़ाई होती थी तो एक
एक का और दूसरी दूसरे का पक्ष लेकर लड़ाई में शामिल हो
जाती थी। भारतीय नरेशों की सहायता के बहाने इनका उद्देश
अपने यूरोपियन दुशमन को समाप्त करना होता था।
दक्खिन भारत की राजनैतिक अवस्था इस समय बहुत
[हाशिया: दक्खिन भारत में मोरचे] बिगड़ी हुई थी। मुग़ल सम्राट की ओर से
नाज़िरजंग वहां का सूबेदार था। नाज़िरजंग
का एक भतीजा मुज़फ़्फ़रजंग अपने चचा
को मसनद से उतारकर खुद सूबेदार बनना चाहता था।
इसीलिये नाज़िरजंग ने मुज़फ़्फ़रजंग को क़ैद कर रक्खा था।
उधर अनवरुद्दीन करनाटक का नवाब था। किन्तु उससे पहले
नवाब दोस्तअली ख़ाँ का दामाद चंदासाहब अनवरुद्दीन को गद्दी
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश २७
से उतार कर खुद करनाटक का नवाब बनना चाहता था।
साहूजी तञ्जोर का राजा था, और एक दूसरा हक़दार प्रतापसिंह
साहूजी को हटाकर तञ्जोर का राज लेना चाहता था। इनमें
करनाटक का नवाब सूबेदार के अधीन था और तञ्जोर का राजा
करनाटक के नवाब का बाजगुज़ार था। इन तीनों शाही घरानों
की इस आपसी फूट से अंगरेज़, फ्रांसीसी और मराठे तीनों
फ़ायदा उठाने की कोशिशें कर रहे थे। दिल्ली के मुग़ल दरबार
में इतना बल न रह गया था कि साम्राज्य के एक कोने में इस
तरह के झगड़ों को दबाकर सच्चे हक़दारों के हक़ की हिफ़ाज़त
कर सके। इस सम्बन्ध में अनेक साज़िशें और लड़ाइयाँ हुईं,
जिनमें अंगरेज़ों ने नाज़िरजंग और अनवरुद्दीन का पक्ष लिया
और फ्रांसीसियों ने मुज़फ़्फ़रजंग तथा चंदासाहब का, किन्तु
इन झगड़ों का सूत्रपात तञ्जोर से हुआ।
सबसे पहले चंदासाहब ने तञ्जोर के राजा साहूजी को गद्दी से
उतार कर उस पर अपना क़ब्ज़ा कर लिया। मराठों ने तञ्जोर पर
चढ़ाई करके चंदासाहब को क़ैद कर लिया और प्रतापसिंह को
वहाँ की गद्दी पर बैठा दिया। कहते हैं कि तञ्जोर की प्रजा साहूजी
की अपेक्षा प्रतापसिंह से खुश थी। अंगरेज़ों ने अब साहूजी का
पक्ष लिया और साहूजी को फिर से गद्दी पर बैठाने के बहाने
कंपनी की सेना फ़ौरन मौक़े पर पहुंच गई। वहाँ पहुँच कर
अंगरेज़ों ने देखा कि प्रतापसिंह का पक्ष अधिक मज़बूत है, इसलिये
ऐन मौके पर साहूजी के साथ दग़ा कर वे प्रतापसिंह से मिल
२८ भारत में अंगरेज़ी राज
गए। देवीकोट का नगर और क़िला प्रतापसिंह ने इस कृपा के
बदले में अंगरेज़ों को दे दिया। साहूजी को सदा के लिये पेन्शन
देकर अलग कर दिया गया और प्रतापसिंह तंजोर का राजा
बना रहा। करनाटक में नवाब अनवरुद्दीन अंगरेज़ों पर मेहरबान
था ही, इसीलिये फ्रांसीसी अनवरुद्दीन की जगह चंदासाहब
को नवाब बनाना चाहते थे। डूप्ले ने मराठों को नक़द धन देकर
चंदासाहब को क़ैद से छुड़वा लिया और फिर उसे करनाटक की
गद्दी पर बैठाने का प्रयत्न किया। ३ अगस्त सन् १७४९ को
आम्बूर की लड़ाई में फ्रांसीसियों की सहायता से अनवरुद्दीन
का काम तमाम कर चंदासाहब करनाटक का नवाब बन गया।
यहाँ तक डूप्ले को ख़ासी सफलता हुई।
किन्तु तंजोर अभी तक प्रतापसिंह के अधिकार में था और
प्रतापसिंह अंगरेज़ों के पक्ष में था। डूप्ले ने इसके लिए दक्खिन के
सूबेदार ही को बदलना चाहा। उसने नाज़िरजंग के विरुद्ध मुज़फ़्फ़र-
जंग के साथ साज़िश की। चाचा की क़ैद से भागकर मुज़फ़्फ़रजंग
ने फ्रांसीसियों की सहायता से अपने तईं दक्खिन का सूबेदार एलान
कर दिया और चंदासाहब के साथ मिलकर सबसे पहले तंजोर
पर चढ़ाई की। सूबेदार नाज़िरजंग ने तंजोर के राजा प्रतापसिंह की
सहायता के लिए सेना भेजी। दोनों पक्षों के बीच एक गहरा संग्राम
हुआ जिसमें मुज़फ़्फ़रजंग फिर से क़ैद कर लिया गया। चंदा-
साहब की जगह अनवरुद्दीन का बेटा मोहम्मद अली करनाटक का
नवाब बना दिया गया और नाज़िरजंग सूबेदारी की मसनद पर