भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश १७
इसके बाद औरंगज़ेब का समय आया। बम्बई का टापू, जहाँ
पर उस समय केवल एक छोटी सी पुर्तगाली बस्ती
बम्बई का टापू थी, सन् १६६१ ई० में इङ्गलिस्तान के बादशाह
को पुर्तगालियों से दहेज़ में मिला और सन् १६८८ ईसवी में
ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने उसे अपने बादशाह से ख़रीद लिया। सन्
१६६४ ईसवी के निकट शिवाजी का बल बढ़ने लगा। सूरत के
अंगरेज़ कोठीवालों ने औरंगज़ेब से वादा किया कि हम शिवाजी
के ख़िलाफ़ आपको मदद देंगे और मुग़ल साम्राज्य की ओर से
सूरत की रक्षा करेंगे। इससे खुश होकर औरंगज़ेब ने उनके साथ
कई तरह की नई रिआयतें कर दीं।
किन्तु शुरू के इन अंगरेज़ व्यापारियों का सदाचार और व्यवहार
अत्यन्त गिरा हुआ था। किसी भी दूसरी क़ौम
अंगरेज़ व्यापारियों के माल से लदे जहाज़ को पकड़ कर लूट लेना
का चरित्र इनके लिये एक मामूली बात थी। स्वयं अपने
अंगरेज़ भाइयों और अन्य यूरोपियनों के साथ इनके सुलूक की
यह हालत थी कि जो मनुष्य इनसे सस्ता माल बेचता था या
किसी और तरह उससे इनके व्यापार में बाधा पड़ती थी, उसे ये
मौक़ा पाकर पकड़ लेते थे और या तो कोड़े मार मार कर मार
डालते थे और या अपनी कोठी में बंद करके भूखों मार देते थे ।*
- “ . . . they made it a rule to whip to death or starve to death those
of, whom they wished to get rid, . . . to murder private traders.”—Mill,
Wilson's note, vol. i., Chap. ii.
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