भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ भारत में अंगरेज़ी राज
भारतवासियों के साथ इनका व्यवहार हद दर्जे की ज़्यादती
और बेईमानी का था। सूरत की कोठी के अंगरेज़ों की बाबत एक
विद्वान् अंगरेज़ पादरी फ़िलिप एण्डरसन लिखता है :-
"ज्यों ज्यों इन साहसिक आगन्तुकों की तादाद बढ़ती गई, उनसे अंगरेज़
क़ौम की नेकनामी नहीं बढ़ी। इनमें से बहुत ज़्यादा लोग ज़बरदस्तियाँ और
बेईमानियाँ करते थे $\times$ $\times$ $\times$ हिन्दू और मुसलमान दोनों अंगरेज़ों को गाय
खाने वाले और आग पीने वाले नीच दरिन्दे समझते थे और कहते थे कि
ये लोग उन बड़े बड़े कुत्तों से भी ज़्यादा जंगली हैं जिन्हें ये अपने साथ लाते
हैं। ये शैतान की तरह लड़ते हैं और अपने बाप को भी दग़ा दे लेते हैं और
दूसरों से अपना काम निकालने या उनकी चीज़ ले लेने में गोलियों की
बौछार या भालों की मार और माल की गठरी या रुपयों की थैली चारों में से
किसी का भी उपयोग करने के लिये हरदम तय्यार रहते हैं।"*
अंगरेज़ों के इस व्यवहार को देख कर भारतवासियों का ख़याल
ईसाई धर्म के विषय में भी उन दिनों बहुत ख़राब हो गया था। वही
विद्वान आगे चल कर लिखता है :-
"किन्तु टेरी साहब का बयान है कि भारतवासी ईसाई धर्म को बहुत
- "As the number of adventurers increased the reputation of the English
was not improved. Too many committed deeds of violence and dishonesty.
. . . Hindus and Musalmans considered the English a set of cow-eaters and
fire-drinkers, vile brutes, fiercer than the mastiffs which they brought with
them, who would fight like Eblis, cheat their own fathers, and exchange with
the same readiness a broadside of shot and thrusts of boarding pikes, or a bale
of goods and a bag of rupees."—The English in Western India, by Rev.
Philip Anderson, p. 22.