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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश ११
जाति भी भारत पहुंच गई और इस देश को अपने अधीन करने के
लिये हर तरह के उपाय करने लगी। डच जाति को अधिक चतुर
अंगरेज़ों के साथ टक्कर लेनी पड़ी। प्लासी की लड़ाई के दो साल बाद
अगस्त सन् १७५६ ईसवी में डच लोगों के सात जंगी जहाज़ एका-
एक चुंचड़ा के नीचे आ धमके। अंगरेज़ों का प्रभाव उस समय
ख़ासा जम चुका था। अंगरेज़ों ने उन्हें चुंचड़ा तक पहुंचने भी न
दिया और बंगाल के नवाब की सहायता से पूरी तरह शिकस्त
देकर पीछे हटा दिया। उसी समय से डच लोगों का भारतीय
व्यापार घटने लगा। अंत में सन् १८०५ ईसवी में अंगरेज़ों ने
चुंचड़ा और मलाका के बदले में उन्हें सुमात्रा का टापू देकर डच
जाति के अंतिम चिन्ह को इस देश से मिटा दिया।
१६वीं सदी के शुरू में पुर्तगालियों की हिन्दोस्तानी तिजारत बढ़ने
भारत पर अंगरेज़ों से पुर्तगाल की राजधानी लिसबन का महत्व
की दृष्टि और उसका वैभव यूरोप में दिनों दिन बढ़ता जा
रहा था। इङ्गलिस्तान के रहने वालों को इससे
ईर्षा होना स्वाभाविक था। इङ्गलिस्तान में उस समय ब्रिस्टल का
बंदरगाह तिजारत की दृष्टि से सबसे आगे था। हर यूरोपियन
क़ौम के लोग उन दिनों दूसरी क़ौम के माल से लदे जहाज़ों को
पकड़ कर लूट लेना अपने लिये एक जायज़ व्यापार समझते थे।
भारत और एशियाई समुद्रों में भी इन लोगों ने इस तरह की लूट
का बाज़ार ख़ूब गरम कर रक्खा था। ब्रिस्टल के नाविक अनेक
पुश्तों से बड़े मशहूर समुद्री डाकू गिने जाते थे। सबसे पहले